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बाधाओं का जोर
प्रवीण कुमार First Published:29-11-2012 10:41:15 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

सोचा कि कोई अच्छा-सा बिजनेस शुरू किया जाए, फिर कल्पना में एक-एक कर कई बाधाएं खड़ी हो गईं और वह उनके भार तले दबते गए। उनके सामने जो आभासी बाधाएं थीं, उसने मजबूर कर दिया कि वह बैकफुट पर आएं।

मनोवैज्ञानिक पियरे विल्सन कहते हैं कि आभासी बाधाओं के आगे घुटने टेक देना आश्चर्यजनक नहीं। ऐसा हर दिन लाखों लोग करते हैं। देखना उन्हें चाहिए, जो इसके उलट करते हैं। वह आभासी तौर पर एक-एक कर बाधाओं को लांघते हैं और फिर फंट्रफुट पर आ जाते हैं। विल्सन कहते हैं कि कल्पनाओं में बाधाओं को जैसे ही आप हावी नहीं होने देते, आपका आधा काम आसान हो जाता है। दरअसल, सपनों के खिलाफ नकारात्मक सोच होने में कुछ भी बुरा नहीं। दुनिया के हर सफल व्यक्ति में अपने काम को लेकर बाधाएं आती हैं, कल्पना के स्तर पर भी और धरातल के स्तर पर भी। सवाल यह है कि आप उसे परे हटाते हैं या नहीं। एक बार रवींद्रनाथ ठाकुर ने विवेकानंद के बारे में कहा कि भारत को जानना है, तो उनसे बेहतर कोई नहीं। क्यों? क्योंकि उनके यहां सब कुछ सकारात्मक है। विवेकानंद के समय देश का सारा परिवेश नकारात्मक था, लेकिन उन्होंने पहले खुद में और फिर पूरे देश में आशा का संचार किया।

यह सच है कि हम अपने लिए या औरों के लिए कुछ भी अच्छा करने जाएं कल्पनाओं में बाधाएं खड़ी होंगी, लेकिन आपका काम है कि उन्हें पिचका गुब्बारा बना दें। डरकर विचारों से उन्हें फुलाएं नहीं। आप बाधाओं का विश्लेषण कर सकते हैं, अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन हर हाल में आप उन्हें हराने के लिए बने हैं। विचारक इमर्सन कहते हैं कि जब भी बाधाएं सामने खड़ी हों, आप विश्वास और आस्था का प्रयोग करें, आप पाएंगे कि बाधाएं भूसे भरे शेरों से अधिक नहीं। विचारक मिशेल रे तो कहते हैं कि आप आदतन डरते हैं, आगे से ऐसा करें कि आदतन साहसी बन जाएं।

 
 
 
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