शुक्रवार, 21 नवम्बर, 2014 | 21:58 | IST
  RSS |    Site Image Loading Image Loading
ब्रेकिंग
गणतंत्र दिवस पर बराक ओबामा होंगे मुख्य अतिथि
बस इक मशीन चाहिए, मूर्खता के लिए
राजेंद्र धोड़पकर First Published:28-11-12 10:04 PM

मैं मानता हूं कि मशीनें इंसान की बराबरी नहीं कर सकतीं, क्योंकि आप इंसान जितनी या उससे भी ज्यादा अक्लमंद मशीनें बना सकते हैं, लेकिन इंसान सरीखी मूर्खता करने वाली मशीनें नहीं बना सकते। मनुष्य जिस स्तर की और जितनी मौलिक मूर्खता कर सकता है, उतनी कोई मशीन नहीं कर सकती। यह बात मुझे दिल्ली की सड़कों पर कार चलाते हुए याद आती है, हालांकि यह किसी भी शहर के बारे में सच हो सकती है। सड़कों पर जो लोग वाहन चलाते हैं, उन्हें देखकर यह यकीन हो जाता है कि इनकी कार में इनसे ज्यादा अक्ल है। जैसे किसी बारात में यह लगता है कि घोड़ी दूल्हे और बारातियों से ज्यादा समझदार है। वैसे बारातियों में अगर थोड़ी बहुत-अक्ल हो, तो भी उसे वे घर पर छोड़कर आते हैं। इसलिए अगर मशीन को अक्लमंद बनाने की कोशिश की जाए, तो वह इंसान से ज्यादा अक्लमंद हो ही जाएगी।

मशीनों के अक्लमंद होने का एक साइड इफेक्ट यह हुआ कि इंसानों ने सोचा कि मशीनों में अक्ल आ गई है, अब हमें अक्लमंद होने की क्या जरूरत? हमारी मौलिकता मूर्खता में हो सकती है, सो उसी को विकसित करने की कोशिश की जाए। वैसे भी सफलता और मूर्खता का आनुपातिक संबंध है, मूर्खता के साथ-साथ इंसान की सफलता, अमीरी और आत्मविश्वास सब बढ़ता जाता है। यानी मूर्ख होने में मौलिकता के अलावा फायदे का तत्व भी शामिल हो जाता है। क्या आपने अपने आप ट्रैफिक के नियम तोड़ने वाली या खतरनाक ढंग से चलने वाली या संकरी गली में बच्चों के बीच 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली कार देखी है? शर्तिया तौर पर ऐसा नहीं हो सकता, ट्रैफिक के नियम तोड़ने के लिए, खतरनाक ढंग से कार चलाने के लिए कोई इंसान ही चाहिए। क्या आपने ऐसी कार देखी है, जो दुर्घटना के बाद लड़ने पर उतारू हो जाए? यह भी इंसान ही कर सकते हैं। खुद खतरनाक ढंग से कार चलाकर खुद ही लड़ने के लिए ऊंचे दर्जे की मूर्खता चाहिए, वह किसी मशीन में नहीं हो सकती। माफ कीजिए, मैं संसद में एफडीआई बवाल पर लिखने बैठा था। पता नहीं अक्लमंदी और मूर्खता पर क्यों लिख बैठा? आखिर इंसान हूं।

 

 
 
|
 
 
टिप्पणियाँ