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सुखमय जीवन की ओर
ब्रह्मकुमार निकुंज First Published:27-11-2012 07:24:53 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

आसक्ति और अनासक्ति मनुष्य जीवन की दो मुख्य वृत्तियां मानी जाती हैं। इस हिसाब से आज हम जो हैं, उसका कारण भूतकाल में किए हमारे ही कर्म हैं, और भविष्य में जो हम बनेंगे, उसका आधार हमारे वर्तमान में किए जाने वाले कर्मो पर निर्भर है। पर एक हकीकत यह है कि अपने जीवन के निर्माता हम खुद हैं न कि कोई और। आसक्तिवश कई बार हम जाने-अनजाने ही मिथ्या बातों के लगाव में अपने आप को और दूसरों को समस्याओं व चिंता की खाई में धकेल देते हैं, जिससे हम अपना मार्ग खोकर दिशाविहीन हो जाते हैं। इसलिए सुखमय जीवन जीने के लिए अनासक्त वृत्ति को अपने जीवन में धारण करना अति आवश्यक हो जाता है। पर क्या इस मोह-माया की दुनिया में रहते हुए अनासक्त होना संभव है? क्यों नहीं, यदि यथार्थपरक विधि अपनाई जाए, तो अवश्य संभव है। अनासक्त बनने का अर्थ यह नहीं है कि हम संसार का त्याग कर कहीं दूर जंगल में जाकर बैठ जाएं। हमें सभी के बीच रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपना जीवन व्यतीत करना है। सबको छोड़ अलग हो जाने से हम अपने आसपास होने वाली अच्छी या बुरी बातों से परे  हो जाते हैं। अपने बदलते मूड व मन पर नियंत्रण पाकर हम आंतरिक सुख-शांति प्राप्त कर पाते हैं।

इस तरह से नियंत्रण हासिल करने वाला कभी किसी बाह्य परिस्थिति के प्रभाव से विचलित नहीं होता, बल्कि वह नई दिशाओं और सुअवसरों की खोज में सदैव आगे रहता है। वास्तव में, अनासक्त वृत्ति की कमी को ही आसक्ति कहा जाता है। आसक्ति-वश भयभीत होकर हम जीवन में आने वाली हर चुनौती से मुंह मोड़कर भागने लगते हैं, जबकि अनासक्त होकर हम निडरता व धैर्य से हर चुनौती का अपनी सकारात्मक सूझ-बूझ से सामना करते हुए आगे बढ़ सकते हैं। अत: तनावमुक्त और सुखमय जीवन जीने का सरल मार्ग यदि कोई है, तो वह है अनासक्त वृत्ति को धारण करना।       

 
 
 
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