रविवार, 19 मई, 2013 | 03:06 | IST
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अपने सच तक पहुंचना
राजीव कटारा
First Published:14-09-12 07:58 PM
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नींद ही नहीं आ रही थी। करवटें ही बदलते रहे वह। आज उन्होंने अपनी टीम के एक साथी को डपट दिया था। वह शायद ठीक ही कर रहा था। लेकिन उनका मन उसे मानने को तैयार ही नहीं था। ‘हमारे दिमाग को सच की भूख नहीं होती। वह तो पहले से तय सोच के लिए तर्क ढूंढ़ता है।’ यह मानना है डॉ. केन ईसोल्ड का। वह विलियम एलनसन व्हाइट इंस्टीटय़ूट में ऑरगेनाइजेशन प्रोग्राम के संस्थापक रहे हैं। उनकी मशहूर किताब है, व्हाट यू डॉन्ट नो यू नो।
हम अक्सर किसी चीज पर खुलकर सोच ही नहीं पाते। एक बंद दिमाग से सोचते हैं। हमारा दिमाग एक तय दिशा में काम करता है। अपनी जिंदगी जीते हुए उसे हम एक अलग दिशा में ले जाते हैं।

हम अपने दिमाग का एक सांचा और ढांचा बना लेते हैं। और फिर उसे तोड़ना नहीं चाहते। सांचा तोड़ने में हमेशा परेशानी आती है। अब जब कोई उसके उलट या अलग बात करता है, तो दिमाग को दिक्कत होती ही है।
 दरअसल, हम दिमाग को कतई परेशान नहीं करना चाहते। अब उसमें हमने जो-जो फीड कर दिया है, उसके बाहर का उसे बर्दाश्त ही नहीं होता। जरा से बाहरी तत्व ने घुसपैठ की और हमारे सिर में दर्द हुआ। और सिरदर्द कौन चाहता है? लेकिन जब हम सिरदर्द को दरकिनार कर सोचना शुरू करते हैं, तो हकीकत में कदम रखते हैं। वहीं से हम सच को तरजीह देना शुरू करते हैं। हमारा सच का सफर यहीं से शुरू होता है।

यह शुरुआत बहुत जरूरी है। उसके बिना हम सच तक पहुंच ही नहीं सकते। सच तक पहुंचे बिना हमारी जिंदगी क्या होगी? उसकी हम कल्पना ही कर सकते हैं। आखिर वह कितनी ठोस हो सकती है? हमें अपने सच तक पहुंचने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। वही हमें कुछ अलग करने की ओर ले जाएगी।

 
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