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डर की हार
नीरज कुमार तिवारी
First Published:11-09-12 07:45 PM
मंच पर जाते ही उसके हाथ-पांव कांपने लगे। उसने जो कहा, उनमें तारतम्यता नहीं थी। कहां बेलौस, बेलाग और सारगर्भित बातें करनी थीं, कहां जो कहा, उनसे अभिव्यक्ति के मूल तत्व ही गायब थे। आखिर वह मनोविश्लेषकों के शरणागत हुए। पता चला, सबके पीछे एक सामान्य-सी मानवीय भावना डर है। वह डर ही था, जिसने सभी इंद्रियों को तोड़कर रख दिया और विचार से लेकर बोल तक सभी गड्ड-मड्ड हो गए। डर किसी न किसी रूप में जीवन भर साथ रहता है, लेकिन जो इसे नियंत्रित करना सीख जाते हैं, जीत उन्हीं की होती है। महान दार्शनिक और कवि राल्फ वाल्डो इमर्सन कहते हैं कि आप जिस काम से डरते हैं, उसे कर दें, डर की मौत तय है। इमर्सन ने जो कहा, उसके मनोवैज्ञानिक पहलू हैं।
अवचेतन मन का एक प्रमुख नियम है कि वही विचार साकार होते हैं, जिन पर हमारा सबसे अधिक ध्यान होता है। जब हम असफलता पर ज्यादा फोकस करते हैं, तो अवचेतन उसे साकार कर देता है। हमारे ज्यादातर डर असामान्य होते हैं। ऐसा तब होता है, जब हम अपनी कल्पनाओं को बेकाबू होने देते हैं। वारेन बफेट ने कहा है कि बड़े डर भी वैसे ही होते हैं, जैसे छोटे डर। कारोबार में नुकसान का डर भी वैसा ही है, जैसा बच्चों का भूत से डरना।
दोनों चीजें महज आभासी हैं और इनका कोई अस्तित्व नहीं। द पावर ऑफ योर सबकॉन्शस माइंड के लेखक जोसेफ मर्फी कहते हैं कि डर को जीतना है, तो उसे तर्क की रोशनी में देखें। उस पर हंसना सीखें, क्योंकि यह सबसे अच्छी दवा है। उन्होंने कहा कि आपके विचार के सिवा कोई भी चीज आपको विचलित नहीं कर सकती। विचार कैसे हों, इस बारे में उन्होंने बताया कि इसे रचनात्मक होना चाहिए और हमेशा अच्छाई पर केंद्रित। आइए, डर से न डरें और स्टीव जॉब्स की बात याद रखें- जिस चीज का मुझे डर था, वह हो गई है। यह नहीं होता, अगर मुझे इसका डर नहीं होता।
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