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आनंद की सीमा
श्री श्री रविशंकर
First Published:07-08-12 08:26 PM
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छोटे बच्चों को टॉफियां दी जाती हैं, लेकिन जब वे कुछ बड़े हो जाते हैं, तब कोई भी टॉफी या कैंडी नहीं चाहता। वे थोड़ी बड़ी खुशी चाहते हैं, कुछ और बेहतर अनुभव। हमारी इंद्रियों के अनुभव करने की क्षमता सीमित है, लेकिन जब इच्छाएं असीमित होती हैं, तो असंतुलन होता है। उदाहरण के लिए, बुलीमिया को ही ले लीजिए, आप कितना भोजन खा सकते हैं? बुलीमिया उसे कहते हैं, जब आप खाते हैं, लेकिन आपको तृप्ति नहीं मिलती। तब फिर आप कहते हैं, ‘अरे चलिए, थोड़ा इंद्रियों पर काबू करिए’, क्योंकि ऐसा न करने पर आपके शरीर को हानि होगी।

ऐसा हमारी सभी इंद्रियों के साथ होता है, क्योंकि उनका अनुभव करना हमें थकाता है। यदि आप थोड़ा खाना खाते हैं, तो वह आपको ऊर्जा देता है, लेकिन अगर आप जरा भी ज्यादा खा लेते हैं, तो वह आपको थका देता है। इसीलिए कहते हैं, ‘तेन त्यक्तेन भुन्जिथा।’ अर्थात, उसका अनुभव करिए, मगर उसके परे भी जाइए। आप सांस अंदर ले सकते हैं, लेकिन आप केवल उसे अंदर ही नहीं लेते, आपको उसे बाहर भी निकालना होता है, नहीं तो आप मर जाएंगे। इसलिए जब आप अंतर्मुखी होते हैं, जब आप योग में जाते हैं, तब आप कहीं ज्यादा आनंद का अनुभव कर पाएंगे। योग से ऊर्जा का संरक्षण होता है। बच्चे खर्च करते हैं, तो कोई परवाह नहीं करता। माता-पिता कहते हैं, ‘ठीक है, खर्च करो।’ लेकिन अगर कोई किशोर खर्च करता है या कोई ऐसा, जो किशोरावस्था को पार कर गया है, तब माता-पिता कहते हैं, ‘थोड़ा ध्यान से खर्च करना।’ अगर आप वयस्क हो गए हैं, तब वे कहेंगे कि आपको कमाना भी चाहिए।

इसी तरह से, अपनी इंद्रियों से हम अच्छा स्वाद, अच्छे दृश्य, अच्छी ध्वनि, सबका आनंद लेते हैं, लेकिन उसके बाद? अत: आइए और अपनी ऊर्जा का संरक्षण कीजिए, गहरे ध्यान में बैठिए। ध्यान में सबसे अधिक आनंद है, उसका सुख भी लीजिए।

 
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