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युद्ध के लिए अभिशप्त है अफगानिस्तान?
गौरीशंकर राजहंस पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत
First Published:29-07-12 08:23 PM
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नाटो के एक आकलन के मुताबिक, नशीले पदार्थो और खतरनाक हथियारों की तस्करी से अफगानिस्तान सरकार को हर साल 12 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल संस्था का कहना है कि वर्ष 2007 से 2009 के बीच अफगानिस्तान में भ्रष्टाचार इतना अधिक बढ़ गया, जितना संसार के किसी अन्य देश में नहीं बढ़ा। सर्वे में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और नाटो की फौजें जान-बूझकर मक्खी निगल रही हैं। यह सोचकर कि थोड़ा-बहुत भ्रष्टाचार हो भी रहा हो, तो कम से कम देश में शांति तो बनी रहेगी। उधर अफगानिस्तान सरकार के बार-बार विज्ञापन देने के बाद भी कोई अफगानी युवक फौज में भर्ती नहीं होना चाहता है।

उन्हें यह आशंका सताती रहती है कि तालिबानी उग्रपंथी उसे कभी भी गोली से उड़ा देंगे। दूसरी ओर तालिबान के बढ़ते हुए आतंक से राष्ट्रपति हामिद करजई भी डरे हुए हैं। उन्होंने खुलेआम कह दिया है कि वह राष्ट्रपति का अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे। अमेरिका इस बात को लेकर काफी चिंतित है कि हामिद करजई की बराबरी का कोई दूसरा नेता अफगानिस्तान में नहीं है। उधर अफगान जनता भी यह अच्छी तरह समझ गई है कि अमेरिका व नाटो फौजें उन्हें कोई सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती हैं और जब 2014 में वे अफगानिस्तान से निकल जाएंगी, तो पूरे देश में देर-सवेर तालिबान का बोलबाला हो जाएगा।

अफगानिस्तान के भविष्य पर विचार करते समय वहां के इतिहास को भी देखना होगा। अफगान स्वभाव से लड़ाकू होते हैं और मरने-मारने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता। इसके अलावा अफगानिस्तान के दुर्गम पहाड़ों में कोई आतंकी आसानी से महीनों छिपकर रह सकता है। किसी विदेशी के लिए पहाड़ों की गुफाओं से आतंकवादियों को मार भगाना संभव नहीं है। 19वीं और 20वीं सदी के आरंभ में जब अंग्रेज सर्वशक्तिमान थे, तब वे भी अफगानिस्तान पर कब्जा नहीं कर सके। फिर सोवियत रूस ने 1979 और 1989 के बीच पूरे अफगानिस्तान पर बम बरसाए, परंतु वह भी अफगान वारलार्ड को अपने कब्जे में नहीं कर सका और अंतत: उसे साल 1989 में अफगानिस्तान से निकलना पड़ा। आज अमेरिका की भी कमोबेश यही स्थिति है। अमेरिका चाहता है कि उसके अफगानिस्तान से निकल जाने के बाद भारत वहां महत्वपूर्ण भूमिका अदा करे। साथ ही अमेरिका पाकिस्तान का साथ भी नहीं छोड़ना चाहता है। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए पिछले कई वर्षो से भारत वहां सक्रिय है। भारत के कई इंजीनियर और अन्य कर्मचारी तालिबानी आतंकवादियों के हाथों मारे भी गए हैं। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि जब अमेरिकी फौज अफगानिस्तान से निकल जाएगी, तो वहां क्या हालात बनेंगे। इसीलिए भारत भी हिचक रहा है। लगता है फिलहाल अफगानिस्तान की किस्मत में उथल-पुथल ही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
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