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सब धुल जाता है सावन के जादू-टोने में
गोपाल चतुर्वेदी
First Published:29-07-12 08:22 PM
बरसात में कुदरत से लेकर शोहरत तक धुलती है। इसीलिए राष्ट्रपति चुनाव की ‘टाइमिंग’ सही कही जाएगी। वोटिंग की नौबत के पहले ही सियासी हस्तियों की वास्तविकता वैसे ही उजागर हुई, जैसे किसी प्रौढ़ा का बारिश में मेकअप धुल जाना। शक होने लगा कि शक्ल है या आधुनिक कलाकृति का कैनवास। नेता कौन-से बेहतर हैं? एक ने तो शुरुआती दौर में ही अपने साथी प्रस्तावक को ऐसी धोबीपाट लगाया है कि वह अभी तक चित है। अब यह विवाद का विषय है कि इसे चाणक्य की नीति कहें या आदर्शो के मुखौटे के पीछे छिपी वर्तमान राजनीति की अवसरवादी मानसिकता? नसीहत है कि भैया, सत्ता के साथ रहो तो फायदे ही फायदे हैं।
योजना आयोग की उदार बख्शीश भी अपनी है और सीबीआई भी। कौन जाने काजल की कोठरी में रहते-रहते किस दिन खुद को उजला साबित करने की जरूरत आ जाए। ऐसे मुश्किल वक्त में केवल सीबीआई ही काम आती है। वैसे आज की राजनीति का महारथी वही है, जो दोस्त-दुश्मन, अपने-पराए से ऊपर उठ सिर्फ निजी स्वार्थ का सिद्ध सपूत है। इसके उलट एक दल दावा करता है कि वक्त की बारिश क्या कर लेगी? उसकी तो शक्ल ही उसूलों वाली है। वह सबसे अलग है चाल, चरित्र और चेहरे की चमक में। मौसम का ही असर है कि कुर्सी की कपट-प्रतिस्पर्धा में अनुशासन की पोल खुलती है, जब उसके प्रस्तावित प्रत्याशी को कुनबे की ताकत से कम वोट मिलते हैं।
चुनाव में आदिवासी प्रत्याशी भी थे। वह जाने किस मुगालते में थे? गीता पढ़कर उन्हें भ्रम हो गया कि आत्मा हर प्राणी में मौजूद है। उन्हें क्या पता कि आत्मा जैसी शै अपराधी में तो संभव है, पर नेता इसके अपवाद हैं। नहीं तो वह आत्मा की आवाज पर वोट की उम्मीद ही क्यों करते? वह तो खुद अनुभवी हैं। क्या वह जानते नहीं थे कि नेता चमड़े की जुबान के धनी होते हैं? यह जुबान, जो अवसर के अनुरूप, बोलती, बात बदलती और फिसलती रहती है। सावन का जादू-टोना ही कुछ ऐसा है। इससे सियासत के दिखाऊ सैद्धांतिक चादर ही नहीं, सड़क का डामर भी अक्सर उतर जाता है।
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