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अन्ना: सपनों से सच का सफर
शशि शेखर shashi.shekhar@livehindustan.com
First Published:28-07-12 10:48 PM
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अन्ना हजारे का आंदोलन न हुआ, टेलीविजन चैनल की टीआरपी हो गई- पल में तोला, पल में माशा। जिस तरह चैनल को चर्चा में बनाए रखने के लिए तमाम रसायनों को मिलाने की जरूरत होती है, वैसे ही हजारे साहब के आंदोलन को चलाने के लिए कई किस्म के लोगों की जरूरत पड़ रही है। इस बार उन्हें बाबा रामदेव का सहारा लेना पड़ा है।

यह वही रामदेव हैं, जिन्हें अन्ना और उनकी टीम कभी हिकारत से देखती थी और उनसे मंच साझा करने से गुरेज रखती थी। याद करें, अन्ना की लोकप्रियता का वह स्वर्णकाल था। अन्ना अचानक राजघाट जा पहुंचे थे और बिना किसी बुलावे के भीड़ जुटने लगी थी। बापू की समाधि के सामने शांत बैठे इस बुजुर्ग में बहुतों को गांधी का अवतार नजर आ रहा था। उन भले-भोले लोगों को मालूम नहीं था कि बहुत जल्दी उनका सपना धूल में मिलने वाला है।

यह तो गए 27 दिसंबर, 2011 को ही तय हो गया था कि अन्ना हजारे की लोकप्रियता ढलान पर है। उस दिन वह मुंबई में अनशन पर बैठे थे। तमाम तामझाम के बावजूद मुंबइकर इस बहुप्रचारित अनशन से दूर रहे। अन्ना के समर्थकों को इज्जत बचाने के लिए लोगों से ‘सिर्फ एक बार’ वहां आने की अपील करनी पड़ी। आखिरी कुछ घंटों में अचानक लोग उमड़ पड़े और किसी तरह इस बुजुर्ग आंदोलनकारी की लाज बच सकी।

तब कई आरोप उछले थे। कुछ लोगों का मानना था कि थोड़ी देर के लिए उमड़ी वह भीड़ प्रायोजित थी और उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग थे। इसी के साथ यह सवाल भी उभरा था कि क्या संघ की ताकत अब इतनी भी नहीं बची है कि वह लंबे समय तक किसी आंदोलन को हवा दे सके? आप याद कर सकते हैं। राम जन्मभूमि का आंदोलन संघ ने सुचारु तरीके से बरसों तक चलाया था। वे जब चाहते थे, अयोध्या में लोगों का रेला पहुंच जाता था। उस भीड़ में भारत के सभी प्रांतों का प्रतिनिधित्व हुआ करता था। अयोध्या की ध्वंसलीला के बाद क्या इस संगठन की शक्ति छीजने लगी? लगता तो यही है। अगर यह सच है कि अन्ना हजारे को संघ की सरपरस्ती हासिल है, तो यकीनन नागपुर में बैठे लोगों के लिए चिंता का विषय है। अन्ना के साथ उन्हें भी आत्ममंथन करना होगा कि लोग उनसे दूर क्यों हो रहे हैं?

मुंबई के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद यह तय था कि दिल्ली का अनशन भी कोई बड़ी सफलता नहीं हासिल करने जा रहा, फिर भी देश की निगाहें आधे-अधूरे मन से ही सही, जंतर-मंतर की ओर लगी हुई थीं। पहले ही दिन निराशा हाथ लगी। बाद में, जिस दिन बाबा रामदेव आने को थे, अचानक भीड़ इकट्ठा होने लगी। बाबा के जाते ही लोग भी छू-मंतर हो गए, जिससे लोगों की इस शंका को एक बार फिर बल मिला कि अन्ना अब बिना सहारे के इस आंदोलन को लंबा नहीं खींच सकते। अनशन स्थल की ओर रवाना होते हुए बाबा रामदेव ने भी अपनी अनोखी मुस्कान के साथ एक टीवी पत्रकार से इशारों-इशारों में कहा कि बिना संगठन के कोई आंदोलन नहीं खड़ा हो सकता। उनका संकेत अन्ना और उनकी टीम के लिए था। बाबा गलत नहीं कह रहे थे। अन्ना ने अपनी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए संगठन नहीं, हुजूम का सहारा लिया। ऐसा करते वक्त वह और उनके आसपास के लोग भूल गए कि भीड़ सिर्फ लोकप्रियता का मानक नहीं होती। वह तमाशाई भी होती है और अस्थायी भी।

अन्ना की सबसे बड़ी गलती यही थी कि उन्होंने फेसबुक, मीडिया, सोशल मीडिया के नए अवतारों और अनोखी आभिजात्य नकारात्मकता से ग्रस्त लोगों को ही अंतिम सत्य मान लिया। अपने लोगों पर उनकी पकड़ नहीं थी और वह इधर-उधर कुछ भी बोलकर उनके आंदोलन की आग पर पानी डाल देते थे। पिछले अगस्त में दिल्ली के रामलीला मैदान में जब पहली बार पानी बरसा, तो उनके एक सहयोगी ने यहां तक कह दिया था कि जो इस समय मैदान को छोड़कर जाएगा, वह अपने पिता की औलाद नहीं। समझने वाले तभी समझ गए थे कि यह आंदोलन आनेवाले दिनों में असंयत और अमर्यादित भाषा का शिकार होने जा रहा है।

अन्ना के अलंबरदार पिछले एक साल से विवादास्पद बातें कह-कहकर लोगों के यकीन को ठेस पहुंचाते रहे। इससे उन लोगों के विश्वास की भी हत्या हुई, जो गांधी समाधि पर बैठे अन्ना में बापू को देखने लगे थे। बापू को अच्छी तरह से पता था कि अपने कार्यकर्ताओं पर कब और कैसे लगाम लगानी है? उन्हें जब लगता था कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही, तो वह अपने पैर वापस खींच लेते थे। यही वजह है कि गांधी ने अपने ऊपर कई बार एकांतवास थोपा और जब भी अपनी खामोशी से बाहर निकले, तो पहले से कहीं ज्यादा कद्दावर साबित हुए। अन्ना के सलाहकारों ने उनकी भी ऐसी छवि गढ़ने की कोशिश की, पर वे भूल गए कि अन्ना को गांधी नहीं बनाया जा सकता। मोहनदास करमचंद गांधी जैसी शख्सियतें सदियों में एक बार पैदा होती हैं। उनकी नकल करके कुछ देर का तमाशा तो रचा जा सकता है, पर किसी स्थायी करिश्मे की रचना नामुमकिन है। अन्ना हजारे इसका जीवंत उदाहरण हैं। तमिलनाडु के एक प्रमुख पत्रकार की टिप्पणी याद आती है। उन्होंने दिल्ली अनशन के शुरुआती दिन मुझसे बात करते हुए कहा था कि हीरो, जीरो में तब्दील हो गया है।

खुद अन्ना ने भी पिछले कुछ महीनों में अपने नजरिये में बदलाव किए हैं। एक समय था, जब वह कहते थे कि हमारे लोग राजनीति में नहीं आएंगे। पर गुजरे शुक्रवार को वह अपने इस वचन से हिले हुए नजर आए। लगभग सवा सौ करोड़ आबादी वाले इस देश में आधी से अधिक आबादी नौजवान है। जिन देशों में सबसे ज्यादा ग्रेजुएट हैं, उनमें भारत भी एक है। इन पढ़े-लिखे नौजवानों को सपने देखने की आदत है, पर वे मरीचिका में फंसकर अपना समय नहीं गंवाना चाहते। हजारे साहब के आंदोलन की हिलती चूलें इस सच्चई की एक और गवाह हैं।

फिर वह और उनके कार्यकर्ता जिस तरह कुछ बड़ी राजनीतिक हस्तियों और पार्टियों के प्रति दुर्भावना दिखाते हैं, उससे भी उनके प्रति सम्मान भाव में कमी आई। अन्ना और उनके समर्थक यदि आजादी के बाद भारतीय समाज में उपजी प्रवृत्तियों का आकलन करते, तो उनकी समझ में आ जाता कि सामाजिक आंदोलन अपनी जगह होते हैं और राजनीतिक अभियान अपनी। दोनों एक दूसरे का सहयोग तो कर सकते हैं, पर एक दूसरे की जगह नहीं ले सकते। मसलन, महेंद्र सिंह टिकैत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खासा सामाजिक असर रखते थे। उनकी एक आवाज पर पांच से दस हजार लोग इकट्ठा हो जाते थे, लेकिन जब उन्होंने राजनीति में दखल देना शुरू किया, तो उन्हें सफलता नहीं मिली। लोग उनमें महात्मा देखते थे, राजनेता नहीं। अन्ना हजारे को यह समझ लेना चाहिए था कि वह महात्मा तो बन सकते हैं, नियामक नहीं। हालांकि, यह भी सच है कि ऐसी समझ कायम करने के लिए अनुभवों की एक यात्रा तय करनी पड़ती है। अन्ना शायद यही कर रहे हैं।

 
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टिप्पणियाँ
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टिप्पणियॉ पढ़े(1)
गलतफहमी मई मत रहिये आप चे जो भी कह लें पर सचाई थो यही दिल से आप भी अन्ना को मानते हो आज जंतर मंतर पर लाख से ऊपर की भीर और यहाँ बंगलोरे मई भी हजारों की भी और हमारी भीर खरीदी हुई भी नहीं है जबकि वो भी है जो अपने पैसे खर्च करके सुप्पोर्ट करने आती
By rajnish (29th-July-2012 11:23:PM)
 
 
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