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बाढ़ का अंदेशा और सूखे की मार
उर्मिल कुमार थपलियाल
First Published:27-07-12 08:39 PM
भाई साहब, सूखा और बाढ़ स्वभाव में एक-दूसरे के विरोधाभासी ऐसे लगते हैं, जैसे कांग्रेस और भाजपा एक साथ खड़े हों। ये दोनों कभी गले मिलें भी तो ऐसा लगेगा, जैसे अन्ना हजारे कपिल सिब्बल के गले मिल रहे हों। यह एक असंभव भरत मिलाप होगा। किसी को समकालीन शाप देना हो, तो यह कहा जाता है कि जा तू सूखे से मरे और तेरी लाश बाढ़ में बह जाए। व्याकरण के अनुसार सूखा पुल्लिंग है और बाढ़ स्त्रीलिंग। सूखा तो मारता है, बाढ़ लील जाती है।
बाढ़ और सूखा पीड़ितों को इनकम टैक्स में छूट से क्या वास्ता? कांग्रेस और भाजपा तक अपने भीतरी सूखे और भारी बाढ़ से इतने पीड़ित हैं कि न तीन में, न तेरह में। इनमें जो बड़े बाप के बेटे हैं, वे जब से पैदा हुए, तब से लेटे हैं, बाकी बाढ़ के कारण घुटने समेटे हैं। सूखे और बाढ़ के बीच खड़ा गरीब आदमी अर्धनारीश्वर की तरह लगता है। गरीब के पास तो केवल माथा बचा रहता है पीटने के लिए। देवता गरीब नहीं होते, क्योंकि वे आसमान में धान बोते हैं। आसमान को बाढ़ या सूखे से क्या मतलब। ये सीन तो बस धरती का है कि बाढ़ में बहते छप्पर में सांप-चूहे के बीच उनका भय एक रूप हो जाता है। चूहे का भाग्य और सांप की भूख, दोनो आतंक में। कभी कवि दुष्यंत कुमार ने चेताया था कि, नालायकों जब बाढ़ की संभावनाएं सामने हों तो नदियों के किनारे तुम अपने घर बनाते क्यूं हो, तो पीड़ितों ने जवाब दिया था कि घर नदी में बनाएं क्या। मगरमच्छों को अतिक्रमण अच्छा नहीं लगता।
मानसून के मिजाज का ठेका तो अब मौसम विभाग भी नहीं लेता। पुरानी मसल है कि सावन की बरसात और औरत की जात का कोई भरोसा नहीं। जाने कब बरस जाएं। मूसलाधार वर्षा तो यूं भी टाइमपास प्रेमियों की बिचौलिया सखी होती हैं। प्रेमियों को दो-चार घंटे बिछुड़ने नहीं देती। सिंगल छाते में दोनों एडजस्ट करते हैं। मन में ताक-धिना-धिन होने लगती है। दूसरी तरफ सड़क के किनारे टोकरी से सर ढके गरीब मजदूर आसमान देखता हुआ नरेश सक्सेना का कहा याद कर रहा होता है कि- ‘उन खेतों में भी हो रही होगी बारिश जो खेत कभी मेरे थे।’
मानसून के मिजाज का ठेका तो अब मौसम विभाग भी नहीं लेता। पुरानी मसल है कि सावन की बरसात और औरत की जात का कोई भरोसा नहीं। जाने कब बरस जाएं। मूसलाधार वर्षा तो यूं भी टाइमपास प्रेमियों की बिचौलिया सखी होती हैं। प्रेमियों को दो-चार घंटे बिछुड़ने नहीं देती। सिंगल छाते में दोनों एडजस्ट करते हैं। मन में ताक-धिना-धिन होने लगती है। दूसरी तरफ सड़क के किनारे टोकरी से सर ढके गरीब मजदूर आसमान देखता हुआ नरेश सक्सेना का कहा याद कर रहा होता है कि- ‘उन खेतों में भी हो रही होगी बारिश जो खेत कभी मेरे थे।’
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