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सिर्फ बजट से ही नहीं मिलेगा स्वास्थ्य लाभ
भारत डोगरा सामाजिक कार्यकर्ता
First Published:26-07-12 08:42 PM
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अच्छी खबर यह है कि केंद्र सरकार स्वास्थ्य का बजट बढ़ाने जा रही है। साथ ही राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की तर्ज पर राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन भी आरंभ होने वाला है। खबर यह है कि शहरी स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत 22,500 करोड़ रुपये के निवेश से सात मेट्रो शहरों व 772 अन्य शहरों में स्वास्थ्य सुविधाएं सुधारने का प्रयास किया जाएगा।
योजना आयोग के एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ ग्रुप ने सब लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें कई सराहनीय बातें हैं। स्वास्थ्य बजट बढ़ाने की जो मांग काफी समय से हो रही थी, वह अब कुछ हद तक पूरी हो जाएगी, पर आगे सवाल यह है कि इस बढ़े हुए बजट का उपयोग कहां तक संभव हो पाएगा? जिस तरह 11वीं योजना में शिक्षा क्षेत्र का बजट तेजी से बढ़ा, उसी तरह 12वीं योजना में स्वास्थ्य का बजट तेजी से बढ़ने जा रहा है। पर 11वीं योजना में शिक्षा का बजट तेजी से बढ़ने के बावजूद क्या शिक्षा क्षेत्र की उपलब्धियां उसके अनुपात में प्राप्त हो पाईं? क्या बढ़े हुए बजट को खर्च करने की प्राथमिकताएं ठीक से तय की गई हैं? इतना तो साफ हो गया है कि पब्लिक स्कूलों में निर्धन छात्रों को आरक्षण देने का जो कदम सबसे चर्चित हुआ, वह यदि सफल रहा, तो भी जरूरतमंद छात्रों के एक छोटे-से हिस्से को ही इसका लाभ मिल सकेगा।

यही चिंता स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बनी हुई है। ऐसा न हो कि बजट तो बढ़ जाए, लेकिन जरूरतमंदों तक समुचित लाभ न पहुंच पाए। एक चिंता तो भ्रष्टाचार से जुड़ी है। जिस तरह का भ्रष्टाचार उत्तर प्रदेश में ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में सामने आया, वह डर का सबसे बड़ा कारण है। पर मुद्दा केवल भ्रष्टाचार का नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र में इस समय निजीकरण, मुनाफाखोरी और कमीशन की प्रवृत्तियां हावी हैं। चिकित्सा-शिक्षा एक बड़े व्यवसाय का रूप ले चुकी है। एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए बहुत मोटी रकम शिक्षा हासिल करने से पहले ही भेंट करनी पड़ती है। जिस व्यक्ति ने शिक्षा के लिए इतना खर्च किया है, वह डॉक्टर बनने के बाद इसे शीघ्र से शीघ्र वसूलना भी चाहता है। उचित नियमन के अभाव में हानिकारक, गैर-जरूरी और अनावश्यक दवाओं की बिक्री धड़ल्ले से हो रही है, मरीजों के दनादन अनावश्यक टेस्ट किए जा रहे हैं। सस्ते और असरदार विकल्प उपलब्ध होने पर भी महंगी दवाओं और उपचारों को ही बढ़ाया जा रहा है।

जब तक स्वास्थ्य क्षेत्र का विभिन्न स्तरों पर नियमन या रेगुलेशन को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक केवल बजट बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। इस बढ़ते बजट को निगलने के लिए कई बड़े मगरमच्छ तैयार बैठे हैं। इसलिए बहुत सावधानी से बढ़ना होगा, ताकि जिन करोड़ों लोगों को वास्तव में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का इंतजार है, उनको राहत मिल सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
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