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दस्तखत क्यों कर दूं?
सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार
First Published:21-07-12 10:31 PM
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बहुत दिन बाद एक लेखिका और दो लेखकों ने बायकॉट की अपील की है कि मध्य प्रदेश की साहित्यिक-सांस्कृतिक इल्लत भारत भवन का बायकॉट करें। वह एक हिंदुत्ववादी सरकार की संस्था बन गई है। इसका विरोध करें!

ऐसा कहते हुए एक इंदौरी पत्रकार ने पूछा- सर, इस मामले में कुछ लेखक विरोध कर रहे हैं। आप करने वाले हैं कि नहीं? मेरी दुष्टात्मा सच बोल उठी-अबे क्यों करें? कौन हैं ये? पत्रकार को स्टोरी करनी थी। कहने लगा, ये जाने-माने लेखक हैं जी! मैंने कहा, हे साहित्य के नकली फ्लैश बल्ब की चकाचौंध से चकियाए चिरौटे सुन, इन्हें ‘जाने-माने’ कहना इन अनजानों का भाव बढ़ाना है। दो लाइनें लिखते हैं और रिरियाकर कहते फिरते हैं कि भाई साब, जरा पढ़ लेना। कुछ लिख देना। बड़ी कृपा होगी। हम लोगों की समीक्षाओं से जाने-माने बने हैं।

इंदौरी पत्रकार के इलाके में देर तक चुप्पी रही। मेरे जैसे गलत बंदे को फोन कर बैठा था। किसी तरह दो लाइनें बुलवाना चाहता था, ताकि कहानी बन सके। यहां कहानी की बुनियाद पर ही सवाल उठ गया था। वह क्या जबाव देता? तब भी हिम्मत करके बोला, सर, विरोध करना तो उनका डेमोक्रेटिक राइट है। मैंने कहा, बिल्कुल है। लेकिन भैये हमारा भी तो कुछ डेमोक्रेटिक राइट है। पत्रकार ने पूछा, क्या आप विरोध के विरोध में हैं? मैंने पूछा, तुम अखबार में हो या उनकी पार्टी में? ऐसा है तो भी सुनो, हिंदी के हजारों लेखकों के बीच ये तीन रणबांकुरे ही निकले? बाकी वीर कहां मर गए? अब जरा इनकी कथा सुनो। एक-एक धंधई आचार्य की चिरौरी-मिन्नत कर एक ने एक ‘अकादमी’ को झटक लिया, तो समझता है कि वह पाब्लो नरुदा है। एक लेखिका ने कुछ लिखा और उनके रिव्यू करा लिए, तो  समझने लगीं कि वह वर्जीनिया वुल्फ हैं। एक कुकवि थर्डरेटी अखबारों की लाइनें चुराकर कुकविता करता रहता है! बताओ मित्र, अब ये हमारे नायक होंगे?
लेकिन सर, वे विरोध तो कर रहे हैं?
मैंने कहा, वे ‘विरोध’ कर रहे हैं। तुम ‘रिपोर्ट’ कर रहे हो। करते रहो। साहित्य से तुम्हारा नया टांका भिड़ा है। हिंदी साहित्य आइटम नंबर है। एक सप्ताह बाद सब भूल जाते हैं। वह कहने लगा, साहित्यिक बिरादरी की बात है। वे फासिज्म से लड़ रहे हैं। मैंने कहा, लड़ें, लेकिन हमारे ऊपर अपना फासिज्म क्यों थोप रहे हैं? और प्यारे फासिज्म से लड़ने के नाम पर ‘हस्ताक्षर नौटंकी’ नहीं चलती। इतिहास पढ़ लो। फासिज्म से लड़ते हुए क्रिस्टोफर कड़वेल ने तोप के गोले के आगे आकर जान दे दी थी। ये तीन खद्योत दूसरों को उकसाकर नेता बनने के चक्कर में हैं? वह बोला,आप जो कह रहे हैं, छाप दूं। मैंने कहा, श्रगालों से डराते हो? उसकी आवाज बंद हो गई!
हे साथी! हमारी वाणी को आपका शाप लगे, लेकिन आगे जो कहेंगे, दिल की बात कहेंगे। जब से हमारे प्रिय ‘नव्य-समाजोद्धारक’ आमिर भाई ने कहा है, ‘दिल पे लगेगी, तो बात बनेगी’ तबसे हम भी दिल पर लगने वाली बात करने लगे हैं। आमिर भाई रिस्क ले सकते हैं, तो हम पीछे कैसे रहें? इसलिए हे साथी सुन। मुमताज के इश्क की खातिर शाहजहां ने ताजमहल बनवाया था, उसी तरह सम्राट अजरुन सिंह जू ने कलाप्रेम की खातिर भारत भवन बनवाया। एक समय वहां ‘गिलगिली हैं गिलमें गलीचा हैं गुनीजन हैं’ के अलावा ‘सुराही, बाला’ और तरह-तरह के ‘मसाला-कसाला’ होते थे। आजकल वहां भक्तिकाल अवतरित हो रहा है। रीतिकाल के बचे-खुचे रसिक विरोध कर रहे हैं। अब आप ही बताइए इनकी सतसई पर दस्तखत क्यों कर दूं?

 

 
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