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क्रिकेट और कूटनीति के बीच हमारे रिश्ते
ललित मानसिंह
पूर्व राजनयिक
First Published:17-07-12 08:07 PM
करीब पांच साल बाद भारत-पाकिस्तान के बीच ‘क्रिकेट कूटनीति’ फिर बहाल होने जा रही है। इस साल दिसंबर में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आएगी, बीसीसीआई ने इसकी मंजूरी दे दी है। इससे पहले नवंबर-दिसंबर, 2007 में पाकिस्तानी टीम भारत दौरे पर आई थी। परंतु 2008 में 26/11 के मुंबई हमले के बाद हमारी तरफ से कूटनीतिक बातचीत बंद कर दी गई। उस वक्त पाकिस्तान ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। इसकी एक वजह तो यह थी कि क्रिकेट एक अंतरराष्ट्रीय खेल है, इसलिए इसे खेलने वाले मुल्क की ज्यादा दिनों तक उपेक्षा संभव नहीं। पाकिस्तान की यह सोच सही साबित हो गई होती, अगर मार्च, 2009 में लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम के बाहर श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर आतंकी हमले न होते। यहीं से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की जमीन पाकिस्तान से खिसक गई।
कई देशों ने अपने तय पाकिस्तान दौरे रद्द कर दिए। इससे पाक क्रिकेट को जबर्दस्त झटका लगा। उसका यह दुख और बड़ा हो जाता है, जब वह देखता है कि पड़ोसी मुल्क भारत में ‘क्रिकेट कारोबार’ अरबों में है। इसलिए दोनों देशों के संबंधों को पुनर्जीवित करने के प्रयासों के दौरान पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का जोर रहा कि भारत-पाक ‘क्रिकेट कूटनीति’ बहाल हो।
27 अक्तूबर, 2011 को मोहम्मद जाका अशरफ पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन बने, तो उन्होंने भारत के सामने तीन प्रस्ताव रखे- पहला, या तो टीम इंडिया पाकिस्तान दौरे पर आए, या फिर किसी तटस्थ जगह पर मैच हो। और तीसरा, अगर इन दोनों में से कोई मुमकिन नहीं, तो पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को यह अनुमति दी जाए कि वह भारत में क्रिकेट की मेजबानी कर सके। इन प्रस्तावों से ही पाकिस्तान की बेसब्री का पता चलता है। हालांकि, इस बीच भारत और पाकिस्तान के बीच दूसरी जगहों पर मैच हुए। यहां तक कि पिछले साल पाक टीम भारत में आईसीसी वल्र्ड कप का सेमीफाइनल खेलने आई थी। उस मैच को देखने पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम गिलानी भारत आए थे और हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मोहाली पहुंचे। कुछ खास फर्क तो नहीं आया, पर मोहाली में एक बेहतर माहौल जरूर बना। यही यूएसपी है भारत-पाकिस्तान क्रिकेट श्रृंखला की। हर बार इसका सकारात्मक असर पड़ा है। लेकिन कूटनीति में कहा जाता है- ऐटमॉस्फेयरिक रिजल्ट इज नॉट ए रिजल्ट। पाकिस्तान के साथ यह बात सौ फीसदी सच हो सकती है, क्योंकि इस मुल्क के साथ हम सांस्कृतिक और सामाजिक रिश्ते साझा करते रहे हैं, पर पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार ने तमाम दावों के बावजूद 26/11 के गुनहगारों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की, क्योंकि फौज व आईएसआई ऐसा नहीं चाहती। पाकिस्तान की कथनी व करनी के फर्क से अमेरिका भी परेशान है और हम भी।
प्रस्तुति: प्रवीण प्रभाकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
27 अक्तूबर, 2011 को मोहम्मद जाका अशरफ पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन बने, तो उन्होंने भारत के सामने तीन प्रस्ताव रखे- पहला, या तो टीम इंडिया पाकिस्तान दौरे पर आए, या फिर किसी तटस्थ जगह पर मैच हो। और तीसरा, अगर इन दोनों में से कोई मुमकिन नहीं, तो पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को यह अनुमति दी जाए कि वह भारत में क्रिकेट की मेजबानी कर सके। इन प्रस्तावों से ही पाकिस्तान की बेसब्री का पता चलता है। हालांकि, इस बीच भारत और पाकिस्तान के बीच दूसरी जगहों पर मैच हुए। यहां तक कि पिछले साल पाक टीम भारत में आईसीसी वल्र्ड कप का सेमीफाइनल खेलने आई थी। उस मैच को देखने पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम गिलानी भारत आए थे और हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मोहाली पहुंचे। कुछ खास फर्क तो नहीं आया, पर मोहाली में एक बेहतर माहौल जरूर बना। यही यूएसपी है भारत-पाकिस्तान क्रिकेट श्रृंखला की। हर बार इसका सकारात्मक असर पड़ा है। लेकिन कूटनीति में कहा जाता है- ऐटमॉस्फेयरिक रिजल्ट इज नॉट ए रिजल्ट। पाकिस्तान के साथ यह बात सौ फीसदी सच हो सकती है, क्योंकि इस मुल्क के साथ हम सांस्कृतिक और सामाजिक रिश्ते साझा करते रहे हैं, पर पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार ने तमाम दावों के बावजूद 26/11 के गुनहगारों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की, क्योंकि फौज व आईएसआई ऐसा नहीं चाहती। पाकिस्तान की कथनी व करनी के फर्क से अमेरिका भी परेशान है और हम भी।
प्रस्तुति: प्रवीण प्रभाकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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