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बारिश का अहसास
नीरज कुमार तिवारी
First Published:16-07-12 08:26 PM
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चीजों को महसूस करना एक अज्ञात क्रिया होती जा रही है। ऐसी ही एक चीज है बारिश। बारिश जब नहीं होती, तो हम दुआ मांगते हैं। होती है, तो उसे लानत भेजते हैं, तब लगता है कि वह हमारे काम में रोड़ा बन गई है। क्या वह सचमुच बाधा है? गौर से देखें, तो उसमें जादुई आकर्षण है, बशर्ते हम ठहरकर उसकी ओर निहारें। ब्रिटेन के मशहूर यात्रा वृत्तांतकार अलेक्जेंडर फ्रे टर कहते हैं कि भारत को समझना है, उसे महसूस करना है, तो मानसून को जाने-समझे बगैर ऐसा हो नहीं सकता। उन्होंने मानसून के समय केरल से लेकर चेरापूंजी तक की यात्रा की और एक किताब लिखी- चेजिंग द मानसून ।

वह कहते थे कि बारिश को बस देखें, हो सके तो उसमें भीगें, वह टिप-टिप बरस रही हो या फिर मूसलाधार, आप उसमें जीवन का आनंद महसूस करेंगे। हो सकता है कि आप पल भर में जीवन का दर्शन समझ जाएं।’ फ्रे टर की बातों के मर्म से हम कोसों दूर हैं। झमाझम बारिश, झूमते हुए पेड़, भरे हुए नदी-नाले और बादलों से भरा आकाश, इन नजारों को अब हम शायद ही महसूस करते हों। बारिश को हमने बस पानी का गिरना भर मान लिया है। कभी महसूस नहीं किया कि वह पानी हमारे भीतर भी गिरता है। बारिश न होती, तो शायद कालिदास भी नहीं होते।

कालिदास की सारी कृतियां बारिश में डूबी हैं। लैटिन अमेरिकी साहित्यकार ग्रैबियल गार्सिया मॉर्केज की कहानियों में ऐसे शहर मिलते हैं, जहां बारिश रुकने का नाम ही नहीं लेती। इसी तरह, केरल की साहित्यकार कमला दास ने लिखा है- ‘सदियों से कलाकारों ने मानसून के चित्र बनाए, कवियों ने कविताएं लिखीं, मैं तो बस उसी परंपरा का हिस्सा भर हूं।’ कमला दास के मुताबिक, मानसून का आगाज ऑर्केस्ट्रा की तरह होता है, पहले धीमा और फिर एकाएक तेज। फिर यह सबको अपनी गिरफ्त में ले लेता है।   

 
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