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बेड़ा गर्क, धरती पर नया नरक
गोपाल चतुर्वेदी
First Published:15-07-12 08:48 PM
नेक कर्मो का इनाम स्वर्ग की सीट है, वरना नरक का खौलता कड़ाहा। हमें लगता है कि अपने जैसों को नैतिकता की नाक की सीध में चलाने में नरक के डर की अनिवार्य भूमिका है। ताउम्र जियो तो कानून का, और मरो तो नरक का खौफ। इसके बावजूद, देश में हत्या, अपहरण, बलात्कार, दुराचार की ऐसी इफरात है कि अगर कोई डर न होता, तो न जाने क्या हालात होते? कौन जाने चट मंगनी, पट ब्याह की कहावत, चट विवाह, तट तलाक में बदलती। सात फेरों के चलते-चलते दूल्हे भाई का दिल किसी खूबसूरत-हसीन मेहमान पर आ गया और वह उसे ले उड़ा। इंसान पर दौरा पड़ता ही रहता है, कभी दिल का, कभी आशिकी का।
सरकारी व्यवस्था में भय का अदृश्य भूत भी एक उपयोगी शै है। जैसे हम वर्दीवालों से डरते हैं, वे भी तो किसी से डरें। छोटा हो या बड़ा, जिसके पास अधिकार हैं, वह पूरी तरह स्वच्छंद, निर्भीक और निरापद है उनके दुरुपयोग में। सिर्फ निहायत कायर ही करप्शन से दूर हैं। साहसी तो इसमें माहिर हैं। चोर-भ्रष्टाचारी और पुलिस-सिपाही के आधुनिक खेल में जांच एजेंसियों की क्या मजाल कि भ्रष्टाचार के दूध-धुले आका को पकड़ने की जुर्रत भी करें। ऐसी सियासत और प्रशासन के सांड़ मुंह और सींग मारते हुए मस्त घूमते हैं और बेकसूर बकरी-मेमने राज्य की संपत्ति चरने की सजा पाते हैं। कहते हैं कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। अब, भैया, देर और अंधेर, दोनो हैं।
समझदार सरकार ने पतित स्थिति पर काबू के नए-नए तरीके ईजाद किए हैं। इनमें सबसे कारगर नुस्खा सरकारी अस्पताल में सामान्य का इलाज है। किसी वाहन चालक ने सड़क के नियमों, गति और सुरक्षा की अनदेखी की। दुर्घटना घटी। जानें गईं। ड्राइवर भागता हुआ पकड़ा गया। चौकस पुलिस तत्काल उसे सरकारी अस्पताल में भरती करने की घातक सजा देती है। उसे राज की बात पता है। सरकारी अस्पतालों का इकलौता मिशन मुल्क की आबादी घटाना है। वयोवृद्ध से छुटकारा पाना है, तो स्नेही परिजन भी यही जुगत आजमाते हैं। शोध के परिणाम भले उपलब्ध न हों, पर जानकार बताते हैं कि किसी बुजुर्ग का अस्पताल-गमन उसके महाप्रयाण के लक्ष्य का अंतिम चरण है।
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