मयप्पन CSK के CEO नहीं: इंडिया सीमेंट्स
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मोदी बोले, संप्रग का प्याला भ्रष्टाचार से भरा हुआ
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क्रिकेट जब कारोबार बनता है..
कीर्ति आजाद, सांसद व पूर्व क्रिकेटर
First Published:18-06-12 11:35 PM
जब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के मुखिया एन श्रीनिवासन जेल में बंद सांसद जगन मोहन रेड्डी के साथ कारोबारी रिश्ता रखने के मामले में सीबीआई के समक्ष पेश होते हैं, तो क्रिकेटप्रेमी लोगों के जेहन में एक सवाल कौंधता है। क्या क्रिकेट राजनीति के गलियारों और ग्लैमर की चकाचौंध गलियों से निकलते हुए भ्रष्टाचार के दलदल में धंस चुका है? इसका जवाब आपको आगे मिल जाएगा। परंतु इससे पहले यह समझने की जरूरत है कि बीसीसीआई जैसी बड़ी और अमीर संस्था का अध्यक्ष कौन नहीं बनना चाहता, बल्कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिक भी इसकी ओर टकटकी लगाए रहते हैं। हिन्दुस्तान में क्रिकेट को खेल नहीं, धर्म का दर्जा दिया जाता रहा है। इसलिए राजनेता से लेकर सिने अभिनेता-अभिनेत्री व मॉडल तक इससे जुड़ने को लालायित रहते हैं। जाहिर है, अब इसमें ग्लैमर है, बड़े-रसूखदार लोग इससे जुड़े हैं, तो बड़ी राजनीति भी होती है। और कई बार इसका दुरुपयोग भी होता है, जैसा कि इस बार देखने को मिल रहा है।
उदाहरण के तौर पर, पिछले दिनों आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग का मामला उजागर हुआ। आप टिकट खरीदकर दर्शक-दीर्घा में इस उम्मीद के साथ बैठते हैं कि अनिश्चितताओं के इस रोमांचक खेल में आपको दिलचस्प मुकाबला देखने को मिलेगा, पर वहां सब कुछ ‘फिक्स्ड’ हो, यह जानकर आपको कैसा लगता है? यह दर्शकों से, देश से विश्वासघात नहीं, तो और क्या है? दरअसल, यही वह वक्त है, जब इस खेल और भारतीय क्रिकेट बोर्ड में सुधार की बात की जाती, पर सरकार ने चुप्पी साध रखी है। क्या क्रिकेट खेलने वाले दूसरे देशों में भी ऐसा ही होता है? इंग्लैंड में तीन पाकिस्तानी क्रिकेटरों का नाम स्पॉट फिक्सिंग में आया। हुआ क्या? पुलिस उन्हें पकड़कर ले गई। वहां पॉलिटिक्स नहीं हुई, बल्कि पुलिस कार्रवाई हुई। इससे ठीक उलट, अपने यहां बीसीसीआई खुद इस पूरे मामले की जांच कर रही है, एक पेशेवर जांच एजेंसी की तरह। वैसे आईपीएल की कहानी इस बार यहीं तक नहीं रुकी। रेव पार्टियां, युवतियों-विदेशी नागरिकों से छेड़छाड़ जैसे कई शर्मनाक मामले भी आए।
दरअसल, यह जो करोड़ों-अरबों रुपये का ‘खेल’ चल रहा है, इसके पीछे ‘कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी ‘हितों का टकराव’ है। जब आईपीएल को, जो एक नॉन रजिस्टर्ड बॉडी है, साल 2009 में दक्षिण अफ्रीका ले जाया गया, उस वक्त ललित मोदी इसके कमिश्नर थे और बीसीसीआई के कोषाध्यक्ष थे एन श्रीनिवासन। उस वक्त यह तय हुआ था कि पैसों का आदान-प्रदान बीसीसीआई के कोषाध्यक्ष के माध्यम से सीधे होगा। तब विदेशी बैंकों के खातों में कई मिलियन डॉलर गए, क्या इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक से इजाजत ली गई थी? क्या यह मनी लॉड्रिंग की घटना नहीं थी? क्या यह फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट ऐक्ट (फैमा) का उल्लंघन नहीं था? सरकार ने इस संस्था को 19 नोटिस भेजे, पर क्या उनके वाजिब जवाब मिले? इस लिहाज से तो ललित मोदी छोटे प्यादे थे, कर्ताधर्ता तो तब के कोषाध्यक्ष ही हुए। उस समय कहा गया कि कानून की जानकारी न होने की वजह से ये मामले आए। लेकिन कानून की जानकारी न होना माफी की वजह नहीं हो सकती। जाहिर है, अगर वह बच निकले, तो उनका मन तो बढ़ेगा ही।
अब एक दूसरे व ताजातरीन मामले में, यानी अपनी कंपनी के निवेश में कथित अनियमितता की जांच के तहत सीबीआई ने उनसे पूछताछ की है। अगर श्रीनिवासन बीसीसीआई से जुड़े नहीं होते, तो क्या उनकी हैसियत इतनी बड़ी होती कि उनका नाम करोड़ों के इस मामले में आता? इसे यों समझिए कि अगर शाहरुख खान फिल्म स्टार न होते, तो क्या उन्हें विज्ञापन मिलता? साफ है, पद का दुरुपयोग किया गया है। पहले बोर्ड का काम ‘प्रमोशन ऑफ क्रिकेट’ होता था, अब वह ‘बिजनेस ऑफ क्रिकेट’ हो गया है। ऐसा नहीं कि यह बात सिर्फ मैं कह रहा हूं, क्योंकि मैं विपक्षी पार्टी से हूं। साल 2011 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के एक मंत्री ने राज्यसभा में यही कहा था।
जहां तक इस पूरे प्रकरण में सरकारी दखल का मसला है, तो इसे एक उदाहरण से समझिए। तकरीबन 40-45 दिनों तक आईपीएल के मैच हुए, तब संसद का सत्र चल रहा था। पर कुछ मंत्री शाम को आईपीएल मैच देखने को स्टेडियम में मौजूद होते थे। ऐसा क्यों? अगर वे दोनों जगह होते थे, तो संसदीय कामकाज की तैयारियां कब करते थे? जब कोई सांविधानिक ओहदे पर होता है, तो वह पब्लिक सर्वेट है। उसे किसी और काम के लिए विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है। क्या अनुमति ली गई थी? अगर वे निजी काम से आईपीएल में जा रहे थे, तब भी खर्च सरकारी हुआ न। मान लीजिए, उन्होंने अपने पैसे खर्च किए, तो उसका कोई ब्योरा तो होगा ही। चलिए यह भी सही नहीं है, तो जाहिर तौर पर आईपीएल का पैसा खर्च हुआ होगा। ऐसे में, क्या यह सांविधानिक पद का दुरुपयोग नहीं है, कानून का उल्लंघन नहीं है? एक और बात। नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन में क्रिकेट को आरटीआई के दायरे में लाने की बात जब-जब होती है, कुछ मंत्री इसका विरोध करने लगते हैं। क्या ये संकेत नाकाफी हैं?
अपने देश में क्रिकेट एक ऐसा मंदिर है, जो जात-पात व धर्म से ऊपर है। यह समाज को जोड़ने का काम करता है। जब हम 1983 का विश्व कप जीते थे, तो पूरे देश ने मजहब, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता की सीमा से ऊपर उठकर जीत का जश्न मनाया था। इस खेल में किसी की काबिलियत उसकी भाषा व क्षेत्रीयता से नहीं आंकी जाती। पर इसे चला वे लोग रहे हैं, जो जाति-मजहब-क्षेत्रीयता की बात करते हैं। साफ है, इसके पीछे अपना राजनीतिक उद्देश्य है। ऐसे में, जब बड़ी सरकार (केंद्र), छोटी सरकार (बीसीसीआई व उसके अधिकारियों) को नोटिस भेजती है, तो इस पर कई प्रश्नचिह्न लगते हैं। फिलहाल, श्रीनिवासन-जगन मामला सुर्खियों में है। अगर सब कुछ यों ही चलता रहा तो.. आगे-आगे देखिए, होता है क्या?
प्रस्तुति: प्रवीण प्रभाकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
उदाहरण के तौर पर, पिछले दिनों आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग का मामला उजागर हुआ। आप टिकट खरीदकर दर्शक-दीर्घा में इस उम्मीद के साथ बैठते हैं कि अनिश्चितताओं के इस रोमांचक खेल में आपको दिलचस्प मुकाबला देखने को मिलेगा, पर वहां सब कुछ ‘फिक्स्ड’ हो, यह जानकर आपको कैसा लगता है? यह दर्शकों से, देश से विश्वासघात नहीं, तो और क्या है? दरअसल, यही वह वक्त है, जब इस खेल और भारतीय क्रिकेट बोर्ड में सुधार की बात की जाती, पर सरकार ने चुप्पी साध रखी है। क्या क्रिकेट खेलने वाले दूसरे देशों में भी ऐसा ही होता है? इंग्लैंड में तीन पाकिस्तानी क्रिकेटरों का नाम स्पॉट फिक्सिंग में आया। हुआ क्या? पुलिस उन्हें पकड़कर ले गई। वहां पॉलिटिक्स नहीं हुई, बल्कि पुलिस कार्रवाई हुई। इससे ठीक उलट, अपने यहां बीसीसीआई खुद इस पूरे मामले की जांच कर रही है, एक पेशेवर जांच एजेंसी की तरह। वैसे आईपीएल की कहानी इस बार यहीं तक नहीं रुकी। रेव पार्टियां, युवतियों-विदेशी नागरिकों से छेड़छाड़ जैसे कई शर्मनाक मामले भी आए।
दरअसल, यह जो करोड़ों-अरबों रुपये का ‘खेल’ चल रहा है, इसके पीछे ‘कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी ‘हितों का टकराव’ है। जब आईपीएल को, जो एक नॉन रजिस्टर्ड बॉडी है, साल 2009 में दक्षिण अफ्रीका ले जाया गया, उस वक्त ललित मोदी इसके कमिश्नर थे और बीसीसीआई के कोषाध्यक्ष थे एन श्रीनिवासन। उस वक्त यह तय हुआ था कि पैसों का आदान-प्रदान बीसीसीआई के कोषाध्यक्ष के माध्यम से सीधे होगा। तब विदेशी बैंकों के खातों में कई मिलियन डॉलर गए, क्या इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक से इजाजत ली गई थी? क्या यह मनी लॉड्रिंग की घटना नहीं थी? क्या यह फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट ऐक्ट (फैमा) का उल्लंघन नहीं था? सरकार ने इस संस्था को 19 नोटिस भेजे, पर क्या उनके वाजिब जवाब मिले? इस लिहाज से तो ललित मोदी छोटे प्यादे थे, कर्ताधर्ता तो तब के कोषाध्यक्ष ही हुए। उस समय कहा गया कि कानून की जानकारी न होने की वजह से ये मामले आए। लेकिन कानून की जानकारी न होना माफी की वजह नहीं हो सकती। जाहिर है, अगर वह बच निकले, तो उनका मन तो बढ़ेगा ही।
अब एक दूसरे व ताजातरीन मामले में, यानी अपनी कंपनी के निवेश में कथित अनियमितता की जांच के तहत सीबीआई ने उनसे पूछताछ की है। अगर श्रीनिवासन बीसीसीआई से जुड़े नहीं होते, तो क्या उनकी हैसियत इतनी बड़ी होती कि उनका नाम करोड़ों के इस मामले में आता? इसे यों समझिए कि अगर शाहरुख खान फिल्म स्टार न होते, तो क्या उन्हें विज्ञापन मिलता? साफ है, पद का दुरुपयोग किया गया है। पहले बोर्ड का काम ‘प्रमोशन ऑफ क्रिकेट’ होता था, अब वह ‘बिजनेस ऑफ क्रिकेट’ हो गया है। ऐसा नहीं कि यह बात सिर्फ मैं कह रहा हूं, क्योंकि मैं विपक्षी पार्टी से हूं। साल 2011 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के एक मंत्री ने राज्यसभा में यही कहा था।
जहां तक इस पूरे प्रकरण में सरकारी दखल का मसला है, तो इसे एक उदाहरण से समझिए। तकरीबन 40-45 दिनों तक आईपीएल के मैच हुए, तब संसद का सत्र चल रहा था। पर कुछ मंत्री शाम को आईपीएल मैच देखने को स्टेडियम में मौजूद होते थे। ऐसा क्यों? अगर वे दोनों जगह होते थे, तो संसदीय कामकाज की तैयारियां कब करते थे? जब कोई सांविधानिक ओहदे पर होता है, तो वह पब्लिक सर्वेट है। उसे किसी और काम के लिए विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है। क्या अनुमति ली गई थी? अगर वे निजी काम से आईपीएल में जा रहे थे, तब भी खर्च सरकारी हुआ न। मान लीजिए, उन्होंने अपने पैसे खर्च किए, तो उसका कोई ब्योरा तो होगा ही। चलिए यह भी सही नहीं है, तो जाहिर तौर पर आईपीएल का पैसा खर्च हुआ होगा। ऐसे में, क्या यह सांविधानिक पद का दुरुपयोग नहीं है, कानून का उल्लंघन नहीं है? एक और बात। नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन में क्रिकेट को आरटीआई के दायरे में लाने की बात जब-जब होती है, कुछ मंत्री इसका विरोध करने लगते हैं। क्या ये संकेत नाकाफी हैं?
अपने देश में क्रिकेट एक ऐसा मंदिर है, जो जात-पात व धर्म से ऊपर है। यह समाज को जोड़ने का काम करता है। जब हम 1983 का विश्व कप जीते थे, तो पूरे देश ने मजहब, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता की सीमा से ऊपर उठकर जीत का जश्न मनाया था। इस खेल में किसी की काबिलियत उसकी भाषा व क्षेत्रीयता से नहीं आंकी जाती। पर इसे चला वे लोग रहे हैं, जो जाति-मजहब-क्षेत्रीयता की बात करते हैं। साफ है, इसके पीछे अपना राजनीतिक उद्देश्य है। ऐसे में, जब बड़ी सरकार (केंद्र), छोटी सरकार (बीसीसीआई व उसके अधिकारियों) को नोटिस भेजती है, तो इस पर कई प्रश्नचिह्न लगते हैं। फिलहाल, श्रीनिवासन-जगन मामला सुर्खियों में है। अगर सब कुछ यों ही चलता रहा तो.. आगे-आगे देखिए, होता है क्या?
प्रस्तुति: प्रवीण प्रभाकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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