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पानी के संकट में बागवानी न सुहाए
गफूर ‘स्नेही’
First Published:18-06-12 11:33 PM
नकली हैं, तो बुरा क्या है? इनके सामने तो ओरिजनल भी फीके हैं। प्लास्टिक के फूलों की कीमत ऊंची भले ही हो, मगर ये फूल न बासी होते हैं, और न इनके रंग फीके पड़ते हैं। इनके अंदर खुशबू नहीं, तो क्या गम, स्प्रे हैं न! गरमी में हरियाली कम हो जाती है। खेत सूखकर डरावने हो जाते हैं। मगर आर्टिफिशियल फूल घड़ी-घड़ी पानी नहीं मांगते। भला पानी के संकट में बागवानी करना क्या सुहाता है? यही तो इनकी खासियत है। बूंद-बूंद जिंदगानी है, यानी सीधी-सीधी जल की बचत है।
मेरे एक मित्र गोवा वार में सेनानी रहे साहसी व्यक्ति की इकलौती निशानी हैं, परंतु उनमें निर्भीकता का निशान तक नहीं। विशुद्ध व्यापारी हैं। शिक्षा की दुकान चलाते हैं। एक दिन वह बैंक गए। वहां पर फूलों की दिलकश सजावट पर उनकी नजर पड़ी। मुरीद हो गए। हरदम तारीफ करते, तो हमने एक दिन राजफाश किया- क्या नकली की तारीफ करते हो? वह चौंके, नहीं यार, कैसा नकलीपन? हमने कहा- हे चश्माधारी, चश्मा उतारो, फिर देखो गमले में रेत भरी है। फूल-पत्तों पर गर्त (गर्द) जमी है। वह अगली बार गए, तो हकीकत जान हमारी नजर के कायल हो गए। यह अभिनय की दुनिया है। यहां सब कुछ नाटकीय है। जो दिलकश दिखता है, वह दरअसल रंग-गंधहीन निकलता है। दिल्ली दरबार में ऐसे कई सजावटी फूल हैं।
शासन को चाहिए कि वह नागरिकों को निर्देश दे कि वे ग्रीष्म काल में ऐसे ही कृत्रिम फूलों का इस्तेमाल करें। पानी की बचत होगी और जल संकट टलेगा। अब हर जगह तो कश्मीर की डल झील है नहीं कि शिकारों पर फूल खिलते रहें। भले ही प्रकृतिवादी-पर्यावरणविद नाराजगी जताएं, मगर हम यथार्थवादी लोग हैं, साथ ही तरकीब वाले भी। जैसा वक्त, वैसी चाल अख्तियार करना बुद्धिमानी भरा कदम है।
वैसे सुधी जनों, वर्षा के बाद आप फिर से उसी असलियत पर लौट आएं, वरना पौधारोपण का क्या होगा? जीवन में और पर्यावरण के सुधार में कदापि गलती और लापरवाही न करें। वरना आर्टिफिशियल फ्लावर भी हमारी हंसी असल में उड़ाएंगे।
मेरे एक मित्र गोवा वार में सेनानी रहे साहसी व्यक्ति की इकलौती निशानी हैं, परंतु उनमें निर्भीकता का निशान तक नहीं। विशुद्ध व्यापारी हैं। शिक्षा की दुकान चलाते हैं। एक दिन वह बैंक गए। वहां पर फूलों की दिलकश सजावट पर उनकी नजर पड़ी। मुरीद हो गए। हरदम तारीफ करते, तो हमने एक दिन राजफाश किया- क्या नकली की तारीफ करते हो? वह चौंके, नहीं यार, कैसा नकलीपन? हमने कहा- हे चश्माधारी, चश्मा उतारो, फिर देखो गमले में रेत भरी है। फूल-पत्तों पर गर्त (गर्द) जमी है। वह अगली बार गए, तो हकीकत जान हमारी नजर के कायल हो गए। यह अभिनय की दुनिया है। यहां सब कुछ नाटकीय है। जो दिलकश दिखता है, वह दरअसल रंग-गंधहीन निकलता है। दिल्ली दरबार में ऐसे कई सजावटी फूल हैं।
शासन को चाहिए कि वह नागरिकों को निर्देश दे कि वे ग्रीष्म काल में ऐसे ही कृत्रिम फूलों का इस्तेमाल करें। पानी की बचत होगी और जल संकट टलेगा। अब हर जगह तो कश्मीर की डल झील है नहीं कि शिकारों पर फूल खिलते रहें। भले ही प्रकृतिवादी-पर्यावरणविद नाराजगी जताएं, मगर हम यथार्थवादी लोग हैं, साथ ही तरकीब वाले भी। जैसा वक्त, वैसी चाल अख्तियार करना बुद्धिमानी भरा कदम है।
वैसे सुधी जनों, वर्षा के बाद आप फिर से उसी असलियत पर लौट आएं, वरना पौधारोपण का क्या होगा? जीवन में और पर्यावरण के सुधार में कदापि गलती और लापरवाही न करें। वरना आर्टिफिशियल फ्लावर भी हमारी हंसी असल में उड़ाएंगे।
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