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हिंदी बी की मर्मकथा
सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार
First Published:16-06-12 10:35 PM
‘हिंदी तू सचमुच पापिनी है। तू नीच है। तुझे जीने का कोई हक नहीं। शर्म-लिहाज होता, तो अब तक कहीं मर-खप गई होती!’
‘मेरा क्या कसूर है मालिक?’ हिंदी ने मिनमिनाते हुए कहा।
‘तेरा इतिहास तेरा कसूर है। तू कल की छोकरी और पांच हजार साल की बुजुर्गा बी तमिल को बेदखल करने चल दी? शर्म न आई?’
‘मैं कहां गई थी? नेताओं ने भेजा था। न जाती, तो यहां पिटती। गई, तो आप कह रहो हो कि मेरी गलती।’
‘तेरी वजह से मुआ कार्टून बना?’
‘कार्टून तो कई दशक पहले छपा था जी।’
‘छपा कभी हो, झटका तो अब जाके लगा!’
‘आप तो मेरे ही पीछे पड़े हो जी। मैं तो तमिलजी को बहिनजी मानती हूं। तो व्हाई दिस कोलावेरी डी जी?’
‘कोलावेरी डी हरगिज मत गइयो। उनके दिल कूं फिर ठेस पहुंच गई, तो सत्यानाश हो जाएगा।’
‘मेरे हिंदी बाल-बच्चों को राज ठाकरे के लोग मुंबई में पीटते हैं, तब कोई कुछ नहीं कहता! अंग्रेजी की वजह से कई आत्महत्या कर लेते हैं। मेरी क्या भावनाएं नहीं? सब मुझे ही मारना चाहते हैं। मेरी कोई सुनता ही नहीं!’
‘तेरी ये हिम्मत कि आरोप लगाए?’
‘मैं अपनी बात कह रही थी। राजभाषा हूं!’
‘राजभाषा कहने से तू राजरानी नहीं बन गई! तू है- गरीब की जोरू। अपनी औकात में रह! हैसियत मत भूल!’
‘क्या भाषा भी गरीब-अमीर होती है जी?
‘होती है मूर्खा, होती है। सब तेरा कसूर है।’
‘पिटने में भी मेरा कसूर? सो कैसे?’
‘बकरी के बच्चे की कहानी भूल गई क्या?’
‘किस बकरी के बच्चे की कहानी?’
बकरी का एक बच्चा था। एक दिन वन में चरते हुए उसे बड़ी जोर की प्यास लगी। वह नदी का पानी पीने लगा। इतने में एक भेड़िया आकर पानी पीने लगा। बकरी के बच्चों को देखते ही उसके मुंह में पानी भर आया- मेरा ताजा भोजन और इतने पास! उसने कुटिल बुद्धि का उपयोग कर कहा, बकरी के बच्चे, तू बड़ा ही नीच है। जान-बूझकर मेरा पानी गंदा करता है। अब मैं क्या पिऊं? बकरी का बच्चा डर के मारे कांपने लगा और कहने लगा- माई-बाप! बड़ी गलती हो गई। आगे से ऐसा नहीं होगा। आज मेरी जान बख्श दीजिए! भेड़िए ने उसे जाने दिया।
अगले दिन बकरी के बच्चे को फिर प्यास लगी। वह फिर नदी की ओर आया। कल वाली जगह छोड़ उसने नई जगह चुनी। पानी में उसने मुंह डाला ही था कि भेड़िए की क्रोध भरी आवाज सुनाई दी, बकरी के बच्चे तू तो सचमुच बदतमीज है। कल मना किया था। आज फिर मेरा पानी गंदा कर मेरी अवमानना कर रहा है। आज तो सजा देकर ही रहूंगा! बकरी का बच्चा कांपते हुए बोला, लेकिन आज तो पानी आपकी ओर से मेरी ओर बह रहा है। आपका पानी मैं पी रहा हूं। ‘कानून छांटता है बदमाश?’ इसके बाद भेडिया उसे खा गया!
‘कहानी से कुछ समझी हिंदी बी?’
‘समझ तो बहुत कुछ गई। अब मेरी भी सुन लो जी! मेरे नाम से उनकी भावनाएं घायल होती हों, तो मेरी बला से। उनकी खातिर 50 करोड़ से ज्यादा मेरे बच्चे-बच्चियां क्या जीना छोड दें? अरे, अब जलें जलने वाले। मैं तो राजभाषा हूं। मैं किसी की बांदी नहीं। देख लेना, एक दिन मेरा भी होगा!’
इससे पहले कि हिंदी बी सचमुच ‘भड़क्कम’ हों, मैंने उन्हें ‘वणक्कम’ किया और दृश्य से बाहर आ गया!
‘मेरा क्या कसूर है मालिक?’ हिंदी ने मिनमिनाते हुए कहा।
‘तेरा इतिहास तेरा कसूर है। तू कल की छोकरी और पांच हजार साल की बुजुर्गा बी तमिल को बेदखल करने चल दी? शर्म न आई?’
‘मैं कहां गई थी? नेताओं ने भेजा था। न जाती, तो यहां पिटती। गई, तो आप कह रहो हो कि मेरी गलती।’
‘तेरी वजह से मुआ कार्टून बना?’
‘कार्टून तो कई दशक पहले छपा था जी।’
‘छपा कभी हो, झटका तो अब जाके लगा!’
‘आप तो मेरे ही पीछे पड़े हो जी। मैं तो तमिलजी को बहिनजी मानती हूं। तो व्हाई दिस कोलावेरी डी जी?’
‘कोलावेरी डी हरगिज मत गइयो। उनके दिल कूं फिर ठेस पहुंच गई, तो सत्यानाश हो जाएगा।’
‘मेरे हिंदी बाल-बच्चों को राज ठाकरे के लोग मुंबई में पीटते हैं, तब कोई कुछ नहीं कहता! अंग्रेजी की वजह से कई आत्महत्या कर लेते हैं। मेरी क्या भावनाएं नहीं? सब मुझे ही मारना चाहते हैं। मेरी कोई सुनता ही नहीं!’
‘तेरी ये हिम्मत कि आरोप लगाए?’
‘मैं अपनी बात कह रही थी। राजभाषा हूं!’
‘राजभाषा कहने से तू राजरानी नहीं बन गई! तू है- गरीब की जोरू। अपनी औकात में रह! हैसियत मत भूल!’
‘क्या भाषा भी गरीब-अमीर होती है जी?
‘होती है मूर्खा, होती है। सब तेरा कसूर है।’
‘पिटने में भी मेरा कसूर? सो कैसे?’
‘बकरी के बच्चे की कहानी भूल गई क्या?’
‘किस बकरी के बच्चे की कहानी?’
बकरी का एक बच्चा था। एक दिन वन में चरते हुए उसे बड़ी जोर की प्यास लगी। वह नदी का पानी पीने लगा। इतने में एक भेड़िया आकर पानी पीने लगा। बकरी के बच्चों को देखते ही उसके मुंह में पानी भर आया- मेरा ताजा भोजन और इतने पास! उसने कुटिल बुद्धि का उपयोग कर कहा, बकरी के बच्चे, तू बड़ा ही नीच है। जान-बूझकर मेरा पानी गंदा करता है। अब मैं क्या पिऊं? बकरी का बच्चा डर के मारे कांपने लगा और कहने लगा- माई-बाप! बड़ी गलती हो गई। आगे से ऐसा नहीं होगा। आज मेरी जान बख्श दीजिए! भेड़िए ने उसे जाने दिया।
अगले दिन बकरी के बच्चे को फिर प्यास लगी। वह फिर नदी की ओर आया। कल वाली जगह छोड़ उसने नई जगह चुनी। पानी में उसने मुंह डाला ही था कि भेड़िए की क्रोध भरी आवाज सुनाई दी, बकरी के बच्चे तू तो सचमुच बदतमीज है। कल मना किया था। आज फिर मेरा पानी गंदा कर मेरी अवमानना कर रहा है। आज तो सजा देकर ही रहूंगा! बकरी का बच्चा कांपते हुए बोला, लेकिन आज तो पानी आपकी ओर से मेरी ओर बह रहा है। आपका पानी मैं पी रहा हूं। ‘कानून छांटता है बदमाश?’ इसके बाद भेडिया उसे खा गया!
‘कहानी से कुछ समझी हिंदी बी?’
‘समझ तो बहुत कुछ गई। अब मेरी भी सुन लो जी! मेरे नाम से उनकी भावनाएं घायल होती हों, तो मेरी बला से। उनकी खातिर 50 करोड़ से ज्यादा मेरे बच्चे-बच्चियां क्या जीना छोड दें? अरे, अब जलें जलने वाले। मैं तो राजभाषा हूं। मैं किसी की बांदी नहीं। देख लेना, एक दिन मेरा भी होगा!’
इससे पहले कि हिंदी बी सचमुच ‘भड़क्कम’ हों, मैंने उन्हें ‘वणक्कम’ किया और दृश्य से बाहर आ गया!
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टिप्पणियाँ
टिप्पणियॉ पढ़े(1)
बहुत उत्तम लिखा और भविष्य की ओर संकेत भी धन्यवाद हिंदी का सम्मान पढ़ाने के
By एस के यादव (20th-June-2012 01:04:AM)
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