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संजय जोशी तो बहाना हैं
आशुतोष, मैनेजिंग एडीटर, आईबीएन-7
First Published:10-06-12 08:36 PM
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क्या बीजेपी में वाजपेयी-आडवाणी युग का अंत हो गया है? घटनाएं तो कुछ ऐसे ही संकेत दे रही हैं। संजय जोशी को बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से बाहर करने का फैसला इसकी शुरुआत है। अगर यह सिर्फ नरेंद्र मोदी की खुंदक का नतीजा होता, तो यह अध्याय मुंबई में ही खत्म हो जाता। लेकिन जोशी को पार्टी से मुक्त करने के कदम ने इस धारणा को और पुष्ट किया है। यह घटना महज जोशी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने भर की नहीं है और न ही दो पुराने दोस्तों की दुश्मनी की तार्किक परिणति है। मामला इससे कहीं आगे है।

मुंबई में पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक के बाद होने वाली रैली में आडवाणी और सुषमा स्वराज निजी कारणों का हवाला देते हुए शामिल नहीं हुए, तभी आशंकाएं उभरने लगी थीं। ऐसा शायद पहली बार हुआ था कि भाजपा के युगपुरुष माने जाने वाले आडवाणी ने रैली की जगह अपने किसी निजी कार्यक्रम को तरजीह दी। सुषमा का भी वही तर्क था। गाजियाबाद के किसी कार्यक्रम में शामिल होना उन्हें पार्टी की रैली से ज्यादा जरूरी लगा। यह अनायास नहीं हो सकता। आडवाणी और सुषमा की अनुपस्थिति में मुंबई की पूरी रैली नरेंद्र मोदीमय हो गई और संदेश यह गया कि वह पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। लेकिन यह उपलब्धि अधूरी थी। सुषमा स्वराज के बारे में दिल्ली के गलियारों में यह चर्चा है कि आरएसएस उनमें प्रधानमंत्री का अक्स देखता है और आडवाणी तो आडवाणी हैं ही। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह पार्टी के सर्वाधिक सम्मानित और सबसे  बड़े नेता हैं।

दिल्ली में संजय जोशी से पार्टी का सारा कार्यभार ले लिया गया। उन्हें राजनीतिक वनवास दे दिया गया और ये दोनों नेता फिर भी चुप रहे। वह भी तब, जब इस फैसले के पहले बीजेपी के मुखपत्र कमल संदेश ने लिखा- यह कहना कि सिर्फ मेरी बात चलेगी..इससे पार्टी या संस्था तो दूर, परिवार भी नहीं चलता..। जब कोई कामयाबी की सीढ़ी चढ़ता है, तो उसकी समझ भी बढ़नी चाहिए,..लेकिन ये विडंबना है कि जो शिखर पर पहुंच जाता है, वह दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, ये जानते हुए कि एक दिन उसे भी नीचे आना है। यह संदेश साफ था। निशाने पर मोदी थे और जोशी को हटाने पर नाराजगी जताई गई थी। इशारों में यह भी कहा गया कि संघ परिवार और बीजेपी ने संगठन की आत्मा के साथ समझौता किया है। संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने भी काफी कुछ इसी लाइन पर लिखा और साथ ही तरुण भारत ने भी। संघ के पुराने बुजुर्ग नेता एमजी वैद्य ने तो कैमरे के सामने बोल भी दिया।

मुंबई में जो हुआ, उससे पार्टी कार्यकर्ताओं का एक तबका खासा नाराज है। वह पूछ रहा है कि संघ के लिए नि:स्वार्थ भाव से काम करने वाले एक स्वयंसेवक के साथ ऐसा व्यवहार क्यों? लगा कि कम से कम लालकृष्ण आडवाणी तो बोलेंगे या फिर सुषमा स्वराज ही कुछ इशारा करेंगी। आडवाणी ने सिर्फ ब्लॉग लिखा, लेकिन उनके निशाने पर मोदी नहीं, गडकरी थे, उनकी कार्यशैली थी। यानी पार्टी के दो सबसे बड़े नेताओं ने इस पूरे प्रकरण पर रहस्यमय चुप्पी साध रखी है।

उधर मोदी ने सही वक्त पर अपना दांव चला। संजय जोशी को पार्टी में लाते वक्त ही वह विरोध कर सकते थे, पर नहीं किया। जोशी को यूपी की जिम्मेदारी सौंप दी गई, वह चुप रहे। नाराजगी दिखाई, प्रचार नहीं किया, लेकिन तब जोशी को बाहर करने की कोई शर्त नहीं रखी। जैसे ही यूपी में बीजेपी ने मुंह की खाई, मोदी का पारा चढ़ गया। गुजरात की पूरी इकाई के साथ राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बहिष्कार की धमकी दे दी। इस बात के संकेत भी दिए कि वह पार्टी भी छोड़ सकते हैं। मोदी का वार काम कर गया। पार्टी को तय करना पड़ा कि वह मोदी की कीमत पर जोशी को रख सकती है या नहीं। सारे बड़े नेताओं की उपस्थिति में फैसला हुआ कि जोशी को जाना पड़ेगा। यानी मोदी को पता चल गया कि पार्टी उन्हें छोड़ने का जोखिम नहीं मोल ले सकती। यह नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी जीत थी और इस बात का इशारा भी कि संघ परिवार और बीजेपी के पास उनके सामने झुकने के अलावा कोई चारा भी नहीं है।

मोदी जैसे नेता के लिए यह काफी था। मोदी चाहते, तो मुंबई प्रकरण के बाद चुप भी रह सकते थे। लेकिन वह इंतजार नहीं करना चाहते थे। लोहा गरम था। चोट तो होनी चाहिए, क्योंकि जोशी तो सिर्फ बहाना हैं। उनके निशाने पर कुछ और है। लिहाजा मोदी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी चाल चली।

मोदी ने एक तीर से पांच शिकार किए। एक, पार्टी में उनका एक पुराना दुश्मन हमेशा के लिए धराशायी हो गया। दो, पार्टी के अंदर यह साफ करना कि उनकी अनदेखी करना अब राष्ट्रीय नेताओं और संघ परिवार के लिए संभव नहीं। तीन, खुद को पार्टी का सबसे बड़ा नेता साबित करना। चार, 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर अपनी दावेदारी को बिना लाग-लपेट रखना। पांच, पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों को साफ संदेश देना कि वे जोशी प्रकरण से सबक लें और विरोध करने की जुर्रत करने से पहले अच्छी तरह सोच लें। 

आज की तारीख में बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी से बड़ा करिश्माई और जनाधार वाला नेता नहीं है। दंगों के दाग के बावजूद उनकी छवि विकास पुरुष की है। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, अनंत कुमार, वेंकैया नायडू इस मामले में मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। यहां तक शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा राजे भी मोदी के सामने छोटे ही हैं। लेकिन मोदी की राह में प्रक्रियाजन्य रोड़े तो अटकाए ही जा सकते हैं। और गठबंधन की राजनीति का मायाजाल फैलाकर मोदी की महत्वाकांक्षा पर ग्रहण लगाया जा सकता है।

ऐसे में, मोदी को अभी से कदम उठाना था, ताकि यह साफ हो कि उनका दोस्त कौन है और दुश्मन कौन। बीजेपी के बड़े नेता इस सच्चाई से रूबरू हैं कि मोदी से दुश्मनी लेने का नतीजा क्या होता है? लेकिन एक और सच्चई है। गुजरात में मोदी के हाथ में सत्ता आते ही सारे बड़े नाम हाशिये पर धकेल दिए गए। किसी को शक हो, तो वह केशुभाई पटेल, काशीराम राणा, सुरेश मेहता, गोवर्धन झड़पिया से पूछ ले। बच गए सिर्फ वे, जो मोदी का गुणगान करते हैं। तो क्या संजय जोशी प्रकरण ने खतरे की घंटी बजा दी है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
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