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दलील वकील की और आफत मुवक्किल की
श्याम सुमन, विशेष संवाददाता, हिन्दुस्तान
First Published:10-06-12 08:33 PM
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नूपुर तलवार की समीक्षा याचिका पर फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जो संदेश दिया है, वह  काफी महत्वपूर्ण है। यह संदेश उन लोगों के लिए है, जो अपने रसूख और पैसे के बल पर कानून और व्यवस्था से छल करते हैं। रसूखदार लोग बड़े वकीलों के जरिये, जिनकी कोर्ट में ‘फेस वैल्यू’ है, मुकदमों को लटकाने में कामयाब हो जाते हैं या फिर प्रतिवादी को इस कदर परेशान कर देते हैं कि वे हार मानकर मुकदमे से हट जाएं या फिर समझौता करने को बाध्य हो जाएं। अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया है कि किसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती देना अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कोर्ट की प्रक्रिया के दुरुपयोग की हद तक न जाए।

नूपुर तलवार की समीक्षा याचिका भी इस हद को पार कर चुकी थी। दरअसल, यह याचिका न सिर्फ बहुत हल्के आधारों पर खड़ी थी, बल्कि इसमें वही बिंदु उठाए गए थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट पहले के आदेश में खारिज कर चुका था। यही नहीं, उन्होंने समीक्षा याचिका के नियमों का पालन भी नहीं किया था। इस याचिका में मजिस्ट्रेट के समन आदेश की ही बखिया उधेड़ने के लिए लंबी-चौड़ी दलीलें थीं। कोर्ट इस याचिका का मकसद समझ गया और उसे लगा कि याचिका ट्रायल कोर्ट में लंबित मुकदमे को कानूनी पेच में उलझाने के लिए दायर की गई है। कोर्ट ने तलवार दंपती को चेताया है कि वे अपने वकीलों से उचित सलाह लेकर ही किसी आदेश को चुनौती दें, अन्यथा भविष्य में उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। लेकिन सच यह भी है कि याचिका दायर कराने वाले और उस पर बहस करने वाले देश के नामी-गिरामी वकील थे। अदालत ने उन्हें कुछ नहीं कहा, चेतावनी दी, तो सिर्फ याचिकाकर्ता को। क्या यह संभव है कि पेशे से दंत चिकित्सक नूपुर तलवार समीक्षा याचिका जैसी जटिल कार्रवाई के लिए खुद ही पहल करें? जाहिर है कि भारी फीस वसूलने वाले वकीलों ने ही उन्हें ऐसा करने की सलाह दी होगी। लेकिन जब भी ऐसा होता है, तो गाज वादी पर ही गिरती है, वकील पर नहीं। जुर्माना भी ठुकता है, तो वादी पर ही, वकील साफ-साफ बच जाते हैं। क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं थी कि वे वादी को उचित सलाह देते और उनसे कहते कि समीक्षा याचिका दायर करना उचित कदम नहीं है? ये वही वकील थे, जिन्होंने याचिका पर जोरदार बहस की और इसी बहस को अदालत ने व्यर्थ, बेवजह और अनावश्यक करार दिया।

सवाल यह है कि अदालत का कीमती वक्त जाया करने के लिए कौन जिम्मेदार है, सलाह देने वाले और बहस करने वाले वकील या फिर नूपुर तलवार? इसका जवाब नहीं मिला। यही सवाल हमारी न्याय-व्यवस्था में सुधार लाने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। क्या हमारी न्याय व्यवस्था वकीलों के मामले में हस्तक्षेप करने से बच रही है? इसका जवाब अगर पूरे जोरों से ‘हां’ में नहीं दिया जा सकता, तो ‘न’ भी नहीं कहा जा सकता है।

 
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