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ऐसा भी झगड़ा
अमृत साधना
First Published:10-06-12 08:29 PM
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अगर किसी ने आपको अपमानित किया और आपने प्रतिक्रिया की, तो इसका मतलब हुआ कि उसके हाथ में आपकी चाबी है। बाद में भले ही आप अपने व्यवहार का समर्थन करें, लेकिन अंदर ही अंदर आपको कुछ सालता रहेगा। इसी से आपका कर्म बनेगा। कर्म का नियम समझाते हुए ओशो कहते हैं, ‘हर क्रिया के कुछ परिणाम होने ही वाले हैं, लेकिन वे बाद में नहीं होंगे, वे अभी और यहीं होंगे। जब तुम किसी के साथ सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव करते हो, तो क्या तुम्हें एक तरह की खुशी या शांति नहीं मिलती है? क्या वह संतुष्टि तुम्हें तब होती है, जब तुम क्रोध से उबल रहे होते हो या किसी को चोट पहुंचाते हो? नहीं, असंभव। तुम्हें कुछ तो अनुभव होगा ही, लेकिन वह है उदासी कि तुमने फिर से मूढ़ की तरह बर्ताव किया या तुमने फिर से वही मूर्खता की, जिसे न करने की तुमने बार-बार सोची थी।’

लड़ना ही है, तो ऐसे लड़ें, जैसे प्राचीन चीन के योद्धा लड़ते थे। उनका सिद्धांत था- पूरी त्वरा से लड़ना है, लेकिन उसमें कोई भी भाव बीच में न आए। प्रसिद्ध लेखक लुई फिशर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि चीन गए, तो वहां एक अजीब तमाशा देखा। दो आदमियों में भयंकर झगड़ा चल रहा था। ऐसा कि दौड़ पड़ते थे एक-दूसरे के ऊपर कि अब गर्दन दबा देंगे, लट्ठ मार देंगे। चारों तरफ भीड़ खड़ी देख रही थी। लुई फिशर ने अपने दुभाषिए के जरिये पूछा कि माजरा क्या है? दुभाषिए ने कहा कि चीनी रिवाज ऐसा है कि जो पहले क्रोध में आकर मारेगा, वह हार गया, क्योंकि उसने अपना धैर्य खो दिया। हारने का मतलब है भावना के तल पर आप हार गए। जब तक लड़ाई में कोई इमोशनल कंटेंट नहीं था, तब तक लड़ाई एक खेल थी और भीड़ उसका मजा ले रही थी। और सचमुच ऐसा ही हुआ, उनमें से एक को क्रोध आ गया, उसने डंडा मार दिया। फौरन भीड़ छिटक गई, क्योंकि वह हार गया था।

 
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