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देश को खेलों में अव्वल बना सकते हैं सचिन
खुशवंत सिंह, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार
First Published:11-05-12 09:51 PM
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सचिन तेंदुलकर को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के फैसले की मैं तारीफ करता हूं। उन्होंने क्रिकेट में जो शानदार प्रदर्शन किया है, अगर इसे उसका पुरस्कार कहा जाए, तो यह गलत होगा। दरअसल, हमारी संसद को उनके जैसे कद वाले खिलाड़ियों की जरूरत है, ताकि खेलों की दुनिया में हमारे देश की पिछड़ी स्थिति सबकी नजर में आ सके। क्रिकेट और बैडमिंटन के अलावा शायद ही कोई दूसरा खेल हो, जिसमें हम दुनिया में कहीं गिने जाते हों। मुझे उम्मीद है कि तेंदुलकर ऐसे तरीके ढूंढ़ेंग, जिनसे स्कूल और कॉलेज के छात्रों को खेलों में देश की स्थिति सुधारने का महत्व समझ में आ सके। राज्यसभा में उनकी मौजूदगी से उनके टेस्ट क्रिकेट खेलने पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वह अपना क्रिकेट जारी रखते हुए देश का नाम ऊंचा कर सकते हैं। साथ ही वह देश को यह अहसास भी दिला सकते हैं कि हमें खेलों की दुनिया में सबसे बड़ा नाम बनना है। मैं उन्हें सांसद बनने पर शुभकामनाएं देता हूं।

मैं झारखंड में राज्यसभा चुनाव के मतदाताओं की भी इस बात के लिए तारीफ करता हूं कि उन्होंने एसएस अहलूवालिया को उच्च सदन में एक और कार्यकाल का मौका नहीं दिया। वह प्रभावशाली दिखने वाले पटना के एक अमीर सरदार हैं। वह पार्टियां बदलते रहे हैं और अपने अलावा किसी के प्रति वफादार नहीं रहे। वह सदन में हंगामे से अपनी मौजूदगी का अहसास कराते हैं। 12 साल में संसद में उनका कामकाज इतना ही है कि उसे एक डाक टिकट के पीछे लिखा जा सकता है।

ईशर का सफर
मेरी बुद्धि बहुत कम है और बहुत मुश्किल से ही मैं इम्तिहान पास कर पाता था। लेकिन इम्तिहानों में टॉप करने वालों के लिए मेरे दिल में काफी इज्जत है। इन लोगों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी हैं, योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी और उनकी पत्नी ईशर भी। मैंने ईशर का बायोडाटा देखा, तो कई अद्भुत बातें पता चलीं। उनके दादा वाधवा सिंह पंजाब के सबसे बड़े अचार बनाने वाले थे। मेरे पिता उनसे गाजर, शलजम और गोभी के अचार खरीदते थे और हर शाम खाने के साथ बहुत सारा अचार खाया करते थे। इस चक्कर में अक्सर उनका गला बैठ जाता था और फिर वह भारी आवाज में बोलते थे। मुझे ऐसे कई मौके याद हैं, जब नए साल में उन्होंने संकल्प लिया कि वह इस साल वाधवा सिंह के अचार नहीं खाएंगे। यह संकल्प दो हफ्ते से ज्यादा नहीं चल पाता था। ईशर के माता-पिता कुछ साल इंदौर में रहने के बाद 1950 में कोलकाता चले गए, जहां ईशर की पढ़ाई लड़कियों के मारवाड़ी स्कूल शिक्षायतन में हुई। वह वजीफा हासिल करके मैसाच्युसेट्स इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी पहुंच गईं। 1970 की गरमियों में उनकी मुलाकात वर्ल्ड बैंक में काम करने वाले मोंटेक सिंह से हुई, अब वे एक हंसते-खेलते परिवार का हिस्सा हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

 
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