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भरोसे को जीतना सबसे बड़ी जरूरत
गोपालकृष्ण गांधी, पूर्व राज्यपाल
First Published:10-04-12 09:00 PM
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पिछले महीने करीब 300 लोगों को दिल्ली में संबोधित करते हुए 14वें दलाई लामा ने कहा, ‘बुद्ध के संदेश आपको विरोधाभासी लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। बुद्ध ने कभी अपना दृष्टिकोण नहीं बदला। उन्होंने तो बस अपने संदेश को उसे ग्रहण करने वाले की ग्राह्य क्षमता के मुताबिक सरल बनाया है।’ उसके बाद दलाई लामा ने कुछ पल के लिए अपनी आंखें बंद कीं और फिर एक तरफ देखते हुए बड़ी शालीनता के साथ कहा, ‘इसलिए आपको बुद्ध का जो भी संदेश अपील करे, उससे ही आप खुद को जोड़ सकते हैं।’

उस बड़े से कक्ष में बौद्ध दर्शन के गुणग्राही अकिंचन भाव से दोनों तरफ बैठे थे और पीछे भी काफी संख्या में लोग खड़े थे। हालांकि मैं तथागत के दर्शन के बारे में बहुत कुछ नहीं जानता, लेकिन मैंने अगली कतार की सीट ‘हथिया’ ली थी। वैसे, पहली कतार की सीटें काबिलियत के आधार पर मिलती ही कब हैं? उन पर अक्सर अयोग्य, चाटूकार और वक्त की कदर न करने वाले लोगों का ही कब्जा होता है। बहरहाल, बुद्ध की तरह ही उनके अनुयायी दलाई लामा भी अपने श्रोताओं के भिन्न मानसिक स्तरों को समझते हुए अपने बोलने के अंदाज में भिन्नता ला रहे थे। बौद्ध दर्शन के ‘चार महान सत्यों’ की व्याख्या करते हुए वह परिपक्व बौद्धिकों के लिए जहां तिब्बती बौद्ध धर्म व तंत्रयान के जटिल पेंच खोल रहे थे, वहीं जो बौद्ध धर्म के गंभीर विमर्श से अछूते थे, उन्हें दलाई लामा की सभा प्रेरक नीति-कथाओं और उनकी जिंदगी की घटनाओं में गूंथ रही थी।

ज्ञान के अनेक स्तरों पर पहुंचते हुए उस सभा में बौद्ध धर्मगुरु ने कहा था कि आत्मबोध की प्रक्रिया में वर्षों, बल्कि कई जन्म लग सकते हैं। मैं जन्म-दर-जन्म जैसी अवधारणाओं से बिल्कुल इत्तफाक नहीं रखता, लेकिन फिर मुझे राहत मिली, जब दलाई लामा ने आगे कहा कि ‘अपने पहले लंदन दौरे में मैंने अपना प्रवचन जैसे ही समाप्त किया, भद्र-सा दिखने वाला एक ब्रिटिश नागरिक मेरे पास आया और मेरा अभिवादन करने के बाद बोला, आपने अपने प्रवचन में कई बार कहा कि मैं नहीं जानता, मैं नहीं जानता.. यह तो सचमुच अद्भुत है!’ बौद्ध धर्मगुरु श्रोताओं को यही जताना चाहते थे कि हमारी सीमाएं भी यदि सहायक हैं, तो वे आकर्षक हैं। दलाई लामा ने भगवान बुद्ध के संदेश को समझाते हुए कहा कि अधिक से अधिक ज्ञान अर्जित करने की कामना आदर्श स्थिति नहीं है, बल्कि पीड़ित मानवता की सहायता के लिए बार-बार जन्म लेने की चाहत ही आदर्श स्थिति हो सकती है।

तीन दिनों तक चले उस कार्यक्रम के हर सत्र में मैं अपने समकालीन दो चर्चित व्यक्तियों- अरुणा रॉय और वजाहत हबीबुल्ला के साथ बैठा था। ये दोनों न सिर्फ मेरी ही आयु के हैं, बल्कि हम भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक ही ‘बैच’ के भी हैं। जब आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने कहा कि दुख का बोध महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके बारे में निष्क्रियतापूर्वक विचार करने की बजाय बौद्ध धर्म कहता है कि पीड़ितों की बेहतरी के लिए सक्रिय कदम उठाओ, तो मेरे मन में ‘सक्रिय मदद’ के दो उदाहरण तत्काल कौंध गए, जो दलाई लामा के सामने और मेरे आस-पास ही बैठे थे। अरुणा रॉय ने किसी न किसी रूप में देश के शोषित लोगों को जागरूक किया, ताकि वे सूचना, राशन, काम और मजदूरी के अपने अधिकारों की मांग करें। वहीं वजाहत ने कश्मीर में ‘विश्वास’, ‘भरोसा’ या ‘एतबार’ को बहाल करने के लिए विलक्षण प्रयास किया है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर आंद्रे बेंते ने लिखा है कि अधिकारों का ढांचा तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन इसके साथ ही उस ढांचे के लिए यह बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि उसमें लोगों का पूरा भरोसा हो। प्रतिष्ठा और न्याय के नाम पर मानवाधिकारों को कुचलना, दूसरे जीवों के स्वच्छंद जीने के अधिकारों का दमन और एकाधिकार के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर लोगों के हक को खारिज करना वास्तव में राष्ट्रीय शर्म है। इसी तरह, व्यक्तियों और संस्थाओं के बीच भरोसे के खात्मे, समाज और राज्य तंत्र के बीच विश्वास के अंत और शासन के विभिन्न अंगों के बीच के अविश्वास को एक ‘राष्ट्रीय पीड़ा’ के रूप में देखा जाना चाहिए। आज के भारत में किसी के लिए भी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि कोई उसके बारे में कहे, ‘मुझे उस पर भरोसा है।’
हमारे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भरोसे की पुनर्बहाली की शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसके लिए सबसे पहले आपराधिक कृत्यों में शामिल कुछ लोगों को ईमानदारी के साथ अपने दोषों को स्वीकार करना होगा। और हां, इसके साथ ही न्यायपालिका को सख्ती के साथ कानून के राज को लागू करना पड़ेगा। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि लोग अपनी अंतरात्मा में झांके। इसके लिए भावनाओं में फिर से प्राण फूंकने की आवश्यकता है। हमारे बीच आज महात्मा नहीं हैं। लेकिन हमारे पास वह उत्कट इच्छा तो है ही, जो नैतिकता की नजीरें पैदा करती है, नैतिकता से प्रेरित नेतृत्व खड़ा करती है और साहस व प्रतिबद्धता से लबरेज पुरुष और औरत को हमारे सामने प्रस्तुत करती है।

उस दिन के अपने विमर्श में एक जगह पर दलाई लामा ने कहा था, ‘कई बार लोग सोचते हैं कि मैं उन्हें उनकी बीमारी से मुक्ति दिला सकता हूं..लेकिन मैं उन्हें भला-चंगा नहीं कर सकता..मेरे पास ऐसी शक्तियां नहीं हैं।’ फिर भी, जब दलाई लामा मानवता की नाकामी के रूप में ‘स्वार्थ’ और ‘पाखंड’ को चिह्न्ति करते हैं, तो साबित हो जाता है कि मर्ज को पकड़ने की महारत तो उनमें है ही। अपने उस संवाद में धर्मगुरु ने तो इन्हें नहीं गिनाया था, लेकिन मनुष्यता के भीतर की इन दो कमजोरियों के साथ कुछ और दुर्गुणों को हम जोड़ सकते हैं। मसलन, ईर्ष्या, महत्वाकांक्षा, अश्लीलता, हिंसा आदि।

हमारे देश में इस समय मौजूद नैतिकता के चंद प्रतीकों में से एक 14वें दलाई लामा भी हैं और उन्हें ‘प्रोटोकॉल-अतिथि’ के रूप में देखते हुए कहीं न कहीं हम अपने आप को ही नकारते हैं। कायदे से उन्हें महात्मा बुद्ध की इस पीड़ित धरती की दवा के रूप में देखा जाना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
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