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कायल कर देने वाली द्रविड़ की सज्जनता
रामचन्द्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार
First Published:23-03-12 11:14 PM
एक साल पहले जब मैं दमे के एक दौरे से उबर रहा था, तब मुङो सुबह के अखबार के पहले पन्ने पर छपी एक तस्वीर ने बहुत राहत दी। उस तस्वीर में एक लंबा, दुबला आकर्षक नौजवान एक छोटे, स्थूलकाय, अधेड़ व्यक्ति से बात कर रहा था, जिसके व्यक्तित्व में कोई खास बात नहीं थी। पहली नजर में दिखने वाला यह विरोधाभास गौर से देखने पर कुछ जटिल हो जाता था। नौजवान के चेहरे पर सम्मान, श्रद्धा और आत्मीय प्रशंसा का भाव था। तस्वीर में नौजवान नीचे देख रहा था, लेकिन भावनात्मक रूप से वह उस छोटे व्यक्ति को बहुत ऊंचा देख रहा था।
ये दोनों व्यक्ति राहुल द्रविड़ और जी आर विश्वनाथ थे। विश्वनाथ मेरे किशोरावस्था के नायक थे, क्योंकि वह बहुत खूबसूरत बल्लेबाजी करते थे, वह बहुत ही शरीफ और भले आदमी थे, वह मेरे ही राज्य कर्नाटक के थे और वह पहले टेस्ट खिलाड़ी थे, जिनसे मैंने हाथ मिलाया था। मैं एक क्रिकेट प्रेमी की तरह उनका प्रशंसक था, लेकिन यहां एक ऐसा नौजवान था, जिसने विश्वनाथ से दोगुने रन बनाए थे, फिर भी उसकी भावनाएं मेरी ही तरह थीं। ये दोनों एक अंडरपास के उद्घाटन के लिए इकट्ठा हुए थे, जिसका नामकरण विश्वनाथ के नाम पर किया गया था और यह कार्य द्रविड़ के हाथों संपन्न हुआ था।
दोपहर तक जब दवाओं से दमे का दौरा पूरी तरह खत्म हो गया, तब मैंने द्रविड़ को एक संदेश भेजा। द्रविड़ से मेरी थोड़ी-बहुत जान-पहचान है। उनके जवाब ने उसी बात की पुष्टि की, जो वह तस्वीर बता रही थी। मुझे याद है कि उन्होंने लिखा था, जब मैं छोटा बच्चा था, तब मैं विशी को खेलते हुए देखने के लिए भागा था, जो हैदराबाद के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच खेल रहे थे। उस दिन स्टेडियम में कम से कम बीस हजार दर्शक थे। लेकिन अब वे दिन जा चुके हैं।
मुझे उस तस्वीर और उस संवाद की याद आई, जब मैं राहुल द्रविड़ के रिटायरमेंट पर ग्रेग चैपल का लेख पढ़ रहा था। उस लेख में 2006 के वेस्ट इडीज दौरे का जिक्र था, जिसमें चैपल भारतीय टीम के कोच थे। भारत ने बीस साल बाद उपमहाद्वीप के बाहर कोई सीरीज जीती थी। चैपल ने विशेष तौर पर द्रविड़ और अनिल कुंबले के योगदान को याद किया। चैपल ने लिखा, ‘किसी और टीम में ऐसे दो मजबूत, अड़ियल और स्वाभिमानी प्रतिस्पद्र्धी नहीं हैं। उनके लिए टीम का हित सबसे ऊपर है। शायद बंगलुरु के पानी में ही कोई बात है।’
यह बात शायद सच है। द्रविड़ के पहले जी आर विश्वनाथ थे और कुंबले के पहले भगवत चंद्रशेखर थे। मैं कर्नाटक का कट्टर पक्षपाती हूं और मुझे इन सारे खिलाड़ियों को देखने का भरपूर मौका मिला है। अपनी जवानी के दिनों में मैं जानता था कि मुंबई के बाहर विशी भारत के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज थे और चंद्रा सुभाष गुप्ते के बाद भारत के सवरेत्कृष्ट लेग स्पिनर थे। ये लोग मेरे अपने शहर के थे, जिन्होंने मेरे देश के लिए कई टेस्ट मैच जिताए या बचाए थे। लेकिन सिर्फ उनके खेल की वजह से मैं उन्हें पसंद नहीं करता था, क्योंकि यह बात उनके तमाम साथी और प्रतिपक्षी भी मानेंगे कि विशी और चंद्रा अपने दौर के सबसे सज्जन खिलाड़ी थे।
अधेड़ उम्र में मैं द्रविड़ और कुंबले का वैसा ही प्रशंसक हूं, जैसा मैं उनके दो पूर्ववर्तियों का रहा हूं। सचिन तेंदुलकर के बाद द्रविड़ भारत के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज हैं और कुंबले आज तक के सर्वश्रेष्ठ भारतीय गेंदबाज। ये दोनों भी बंगलुरु के हैं, इसलिए मैं इनके प्रति थोड़ा पक्षपाती हूं, लेकिन कुछ अर्से पहले उन्होंने एक अजीब ढंग से मेरे करियर में मदद की। लगभग दस वर्ष पहले मुङो जीवन की सबसे कठिन परीक्षा देनी थी। एक रात पहले मुझे एक सपना आया। उस सपने में अनिल कुंबले की लेग ब्रेक ने एलेक स्टुअर्ट के बल्ले का बाहरी किनारा लिया और राहुल द्रविड़ ने काफी नीचे कैच पकड़ लिया। यह मेरे लिए बहुत अच्छा शगुन साबित हुआ, क्योंकि इससे मैं बहुत आत्मविश्वास और राहत महसूस करने लगा और अगले दिन मैं परीक्षा में पास हो गया।
विशी और चंद्रा की तरह ही द्रविड़ और कुंबले में भी क्रिकेट कौशल के अलावा बहुत मानवीय गुण हैं। हालांकि, वक्त के साथ चीजें बहुत बदल गई हैं। विशी और चंद्रा के साथ जो विशेषण दिमाग में आते हैं, वे सहज, भले और कुछ हद तक मजे में रहने वाले लोगों के हैं। द्रविड़ और कुंबले के साथ साहसी और प्रतिबद्ध विशेषण ज्यादा याद आते हैं। यह फर्क शहर के बदले हुए समाजशास्त्र का है। जिस बंगलुरु में विशी और चंद्रा खेलते थे, वह मावल्ली टिफिन रूम और खुले-खुले कब्बन पार्क का बंगलुरु था, जहां भरपूर हरियाली और खपरैल वाले बंगले हुआ करते थे। एम जी रोड पर तब कारों से ज्यादा सिनेमाघर दिखते थे। द्रविड़ और कुंबले जब खेले, तब बंगलुरु, एप्सीलोन और इंफोसिस का शहर था, जहां कांच और कंक्रीट की बड़ी-बड़ी इमारतें हैं और पक्षी गायब हो चुके हैं, जहां तरह-तरह के वाहन भारी ट्रैफिक जाम में फंसे रहते हैं।
हो सकता है कि राहुल द्रविड़ में जी आर विश्वनाथ के मुकाबले ज्यादा दमखम हो या यह भी हो सकता है कि यह समय की मांग हो। यहां एक छोटी-सी घटना का जिक्र जरूरी है, जिससे यह पता लगता है कि वह अपने और मेरे हीरो विश्वनाथ से किस तरह अलग हैं। एक दिन टेलीविजन देखते हुए मैंने यह पाया कि तब कप्तान द्रविड़ स्लिप की जगह मिड ऑफ पर फिल्डिंग कर रहे हैं। मैंने उन्हें एक चिट्ठी लिखी, जिसकी शुरुआत इस तरह थी: ‘प्रिय राहुल, आप संभवत: भारतीय क्रिकेट के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ टेस्ट बल्लेबाज हैं और निस्संदेह खेल के किसी भी स्वरूप में भारत के सर्वश्रेष्ठ स्लिप फिल्डर। आपको वहीं फिल्डिंग करनी चाहिए।
हो सकता है कि कुछ अनियमित गेंदबाजी की वजह से आपको लगता होगा कि मिड ऑफ पर फिल्डिंग करना आपके लिए जरूरी है, ताकि आप गेंदबाज को सलाह दे सकें। इसके बावजूद मेरा ख्याल है कि आपकी जगह स्लिप में ही है और भारत में कोई खिलाड़ी आपके आसपास भी नहीं है। इसीलिए शुरुआती ओवरों में कई कैच छूट रहे हैं।’
दो-तीन दिनों के बाद चिट्ठी का जवाब आया, उसमें मेरी सलाह का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन लिखा था कि उन्होंने मेरी तभी-तभी छपी एक किताब खरीदी थी। द्रविड़ ने लिखा ‘आपकी यह बात सही है कि हमारा सारा इतिहास गांधीजी के साथ खत्म हो जाता है, जबकि पिछले 60 वर्षों में बहुत सारी घटनाएं हुई हैं, जिन्हें दर्ज किया जाना जरूरी है। मैंने किताब के 180 पन्ने पढ़ लिए हैं, इसे पूरा करने के बाद मैं चाहूंगा कि इस पर आपसे चर्चा करूं।’
मेरी ई-मेल एक बिन मांगी और कुछ हद तक दुस्साहसी सलाह थी, जैसे किसी औसत गति गेंदबाज ने बाउंसर मारा हो। इसे कलाइयों के एक नाजुक झटके के साथ सीमा के पार पहुंचा दिया गया। मुङो बेहद विनम्र और संतुलित शब्दों में यह बता दिया गया कि मुझे क्रिकेट की रणनीति को छोड़कर इतिहास की किताब लिखने पर ध्यान देना चाहिए। मैंने यह सलाह मान ली।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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टिप्पणियाँ
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आप जैसे दो कौड़ी ke लोग देश को साउथ इंडिया और नोर्थ इंडिया में बाँट रहे और इस चीज को मैंने खुद कर्नाटक में रह कर महसूस किया
By Dev (25th-March-2012 11:11:PM)
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