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गांधी ने अंबेडकर से भी सीखा था
गिरिराज किशोर, वरिष्ठ साहित्यकार
First Published:22-03-12 11:25 PM
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बीसवीं सदी में मानवाधिकार के क्षेत्र में दो ऐसे व्यक्ति सक्रिय हुए, जिन्होंने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया है। एक महात्मा गांधी और दूसरे भीमराव अंबेडकर। मानवाधिकार दो रूपों में प्रभावी होता है, एक व्यक्ति के रूप में किसी के दुख को समझना और उसका प्रतिकार, दूसरा, सामाजिक स्तर पर समाज की तकलीफ को समझना व निराकरण करना। यह एक विशाल चुनौती है।

अंबेडकर का मानवीय सरोकार दूसरे प्रकार का था। उनके सामने एक इतना बड़ा दलित वर्ग था, जिसकी यातना को उन्होंने खुद महसूस किया था। उस वर्ग की पीड़ा उनकी अपनी थी। उनकी पीड़ा पूरे उस वर्ग की थी, जो इस देश का बहुत बड़ा अंग है। पीड़ा का निराकरण तभी संभव हो सकता है, जब मनुष्य उसका साक्षात्कार अपने अंदर करे। अंबेडकर ने अपने सरोकार को समष्टि से जोड़ा। उनकी इस करुणा को बुद्ध के संदर्भ में देखा जाए, तभी हम अनुभव कर सकते हैं कि अंबेडकर ने अपने अंदर की तकलीफ को अपने तक सीमित न रखकर समष्टि से जोड़ दिया था। मानव तभी मानव बनता है, जब करुणा का भाव उसे पखारता है।

यही कारण था कि अंबेडकर दलित मुक्ति के लिए जो संघर्ष कर रहे थे, उसमें मनुवादी दासता को तोड़ने, जातिवादी जकड़न को कमजोर करने और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाने में बुद्ध-दर्शन का बहुत बड़ा हाथ है। सबसे बड़ी बात यह है कि उनका मानवाधिकार सुधारवादी न होकर आत्ममुक्ति का आंदोलन था, जिसमें आत्म-मुक्ति का अहसास उस व्यक्ति को भी हो सके, जो सामाजिक भेदभाव से सर्वाधिक पीड़ित है।

दक्षिण अफ्रीका में वहां के भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को मुक्त करने के लिए ऐसा ही संघर्ष गांधी ने भी किया था। भारतीय मजदूर अधिकतर या तो दलित थे या पिछड़े वर्ग के थे। इसीलिए उन्हें अपने को एक तरह से ‘डिक्लास’ करना पड़ा था। रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा सबको बदलकर समान स्तर पर उतरकर उनके संघर्ष में शरीक होना गांधी के लिए एक अनिवार्यता थी। अंबेडकर के लिए यह जरूरी नहीं था, क्योंकि उनकी अपनी जड़ें उसी वर्ग में थीं। भले ही वह परम आधुनिक ढंग से रहते थे।

गांधी ने यह अनुभव किया था कि ये मजदूर उनका बहुत सम्मान करते हैं, पर उनके जीवन जीने और रहन-सहन के तरीके से नजदीक आने में झिझकते हैं। जब तक वह उसमें परिवर्तन नहीं लाएंगे, तब तक उनमें समानता का भाव पैदा करना संभव नहीं होगा। यहां तक कि उनके मकान में जो मजदूर या कार्यकर्ता रात में आकर ठहरते थे, उनके पेशाब के बर्तन सुबह वह स्वयं खाली करते और धोते थे। इसी बात को लेकर कस्तूरबा और उनके बीच तनाव भी हो गया था। अंबेडकर को इस समानता का प्रमाण देने की अनिवार्यता नहीं थी। उनकी दलित मुक्ति की दौड़ गांधी के बहुत आगे से शुरू हुई थी। अंबेडकर ने बुद्ध की समता को ही अपने जीवन का आधार बनाया। वह हिंदू वर्ण व्यवस्था के खिलाफ स्वानुभूत प्रतिक्रिया थी। वह उनके अपने अनुभव का प्रतिदान था।

गांधी ने आरंभ में जाति और वर्ण व्यवस्था को अवश्य माना, परंतु बाद में अपने व्यवहार में इस व्यवस्था को अस्वीकार भी किया कि वह ऐसे किसी विवाह में शामिल नहीं होंगे, जिसमें वर और वधु में एक दलित नहीं होगा। गांधी ने अपने को अंबेडकर के प्रभाव में इस बिंदु पर पूरी तरह से बदला। यह लचीलापन अंबेडकर से अधिक गांधी में देखने को मिलता है। भले ही वर्ण व्यवस्था आरंभ में व्यवसाय पर आधारित रही हो, जैसा कि कुछ विद्वान मानते हैं, बाद में आनुवंशिक यानी रक्त शुद्धता का पर्याय हो गई। गांधी का उस काल में रक्त शुद्धता के सवाल को नजरअंदाज करना वर्ण व्यवस्था को नकारना था।

कई बार लगता है कि सदियों से उपेक्षित और वंचित चले आ रहे वर्ग को मुख्यधारा में लाने और सम्मानित स्थान दिलाने का मार्टिन लूथर किंग जूनियर की तरह ही अंबेडकर का भी एक महान प्रयत्न था। भले ही मार्टिन लूथर किंग गांधी के अनुयायी थे, परंतु वह अंबेडकर की भांति अपने उपेक्षित वर्ग को समानता के स्तर पर लाने में सफल रहे। उसी संघर्ष का नतीजा है कि आज अमेरिका जैसे रंगवादी देश के राष्ट्रपति पद पर ब्लैक समुदाय का एक व्यक्ति आसीन है।

यहां मैं राहुल सांकृत्यायन के दर्शन-दिग्दर्शन से बुद्ध के संदर्भ में उनकी राय का उल्लेख करूंगा, ‘बुद्ध अपने समय के शासक वर्ग के एजेंट के मध्यस्थ जैसे थे। वर्ग के मौलिक स्वार्थ को हटाए बिना वह अपने को न्याय का पक्षधर बनाना चाहते थे।’ क्या यह बात अंबेडकर पर भी लागू हो सकती है? उनके द्वारा यह माने जाने के बावजूद कि अंग्रेजों ने दलित वर्ग के लिए इसके सिवा कुछ नहीं किया कि कानून की नजर में दलित के साथ भेदभाव नहीं होने दिया, (जबकि मनुवादी कानून में दलित के प्रति वैमनस्यपूर्ण भिन्न दंड विधान था)। वे सरकार के सम्मानित सदस्य थे।

अंबेडकर में दलित समाज के प्रति गहन करुणा थी। करुणा ही मानवाधिकार का आधार है। लेकिन उस करुणा का लाभ उनके समस्त समाज को नहीं मिला। शायद इस कारण कि सवर्ण समाज हो या अवर्ण समाज, वह सदा से बंटा रहा है। चार या पांच वर्णो का होना इस बात का प्रमाण है कि हम कभी एक नहीं रहे। जन्मजात फूट के शिकार हैं। शायद यही कारण था कि लाख प्रयत्नों के बावजूद अंबेडकर दलित वर्ग को आपस में मिलाकर एक समाज नहीं बना पाए। केवल आरक्षण के नाम पर वे एक हैं, वैसे बंटे हुए हैं। उनमें भी सवर्णों की तरह आंतरिक अस्पृश्यता बनी रही है। अंतिम दिनों में अंबेडकर कहा करते थे कि जो मैं चाहता था, वह कर नहीं पाया। शायद उसके पीछे यही भाव रहा हो कि वह समग्र दलित समाज को मिला नहीं पाए। यह बात गांधी के संदर्भ में भी सही लगती है।

अंबेडकर के सामने अपने समाज को आगे बढ़ाने की चुनौती थी। गांधी के सामने वर्चस्व वाले समाज को पीछे लाकर उपेक्षित समाज के साथ समता का रिश्ता बनाने की चुनौती थी, जो और भी कठिन थी। उन्हें पीछे लाना विषम चुनौती थी। इसके लिए गांधी को अथक प्रयत्न करना पड़ा। इसका विरोध भी हुआ और प्रतिवाद भी। लेकिन गांधी ने उनका ड्रेसकोड स्वीकार किया। वह उनकी बस्तियों में रहे। एक बहुत बड़े वर्ग को छुआछूत के इस घृणित सोच से बाहर निकालने में सफल भी हुए। इन सबके बावजूद एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने ‘माइंड सेट’ से बाहर नहीं आ पाया। वह जाति और वर्णवाद वाले समाज में गांधी और अंबेडकर के प्रयत्नों के बावजूद अब भी मौजूद है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
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