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दूषित जीवनशैली की देन है कैंसर
पी के दास, विशेषज्ञ, अपोलो कैंसर इंस्टिट्यूट
First Published:06-02-12 10:02 PM
युवराज सिंह को कैंसर होने की खबर आई, तो एक बार फिर लोगों का ध्यान इस खतरनाक बीमारी की ओर गया है। कैंसर की चपेट में एक उम्दा खिलाड़ी का आना दुखद है, पर मीडिया इसे लेकर जागरूक करने का जो काम किया, वह उम्मीद बंधाता है। हालांकि यह भी सच है कि कुछ जगह इस खबर को सनसनीखेज ढंग से पेश किया गया, जिसकी वजह से लोगों तक कुछ गलत जानकारियां और कुछ बेवजह के डर भी पहुंचे हैं। जबकि हमारे लिए जरूरी यह है कि हम कैंसर और इस तरह के रोगों के पूरे सवाल को सही संदर्भ में देखें।
कुछ दशक पहले तक अपने देश में लोगों की औसत आयु 50-60 साल के बीच होती थी। उस वक्त कई तरह की समस्याएं थीं। गांव के गांव महामारी की चपेट में आ जाते थे। हैजा, चेचक, प्लेग, टीबी जैसी बीमारियों का इलाज तक हर जगह संभव नहीं था। व्यापक राष्ट्रीय टीकाकरण योजनाएं नहीं थीं। बाद के दौर में कई मर्जों का इलाज बड़े पैमाने पर संभव हो पाया। एंटीबायोटिक्स ने हमारी जिंदगी लंबी कर दी। टीकाकरण का दौर शुरू हुआ और लोगों की औसत आयु बढ़कर 70 साल हो गई। वर्ष 2012 के आते-आते तक तो लोगों की औसत आयु 70 से 80 साल के बीच पहुंच गई है। उम्र का लंबा होना यह बताता है कि अब अधिकतर बीमारियों का इलाज देश में संभव है। यहां तक कि कई महामारियों का देश से उन्मूलन हो गया है। लेकिन जैसे-जैसे हमारी जिंदगी बढ़ती गई, हम कामकाजी व्यस्तताओं में उलझते गए। खास तौर पर शहरी जिंदगियां मिलावट, जंक फूड, धूम्रपान, गुटखा सेवन, नशाखोरी जैसी बुरी आदतों का शिकार होने लगीं और फिर कैंसर ने हमारे समाज को जकड़ लिया। मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहता हूं, क्योंकि भारत में कैंसर मरीजों की संख्या को लेकर विभिन्न संगठनों में एक-सी राय नहीं है। पर इसमें कोई दोराय नहीं कि करोड़ों लोग इसकी चपेट में हैं और हर साल इसमें लाखों लोग जुड़ते जा रहे हैं। वैसे लोगों की भी तादाद कम नहीं है, जो कैंसर पीड़ित हैं, परंतु उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं है। अक्सर जब हम दिल्ली के आसपास के इलाकों में चिकित्सा शिविर लगाते हैं, लोगों का मेडिकल चेक-अप करते हैं या कैंसर जागरूकता अभियान चलाते हैं, तो हमारी मुलाकात ऐसे मरीजों की भीड़ से होती है, जिसे अपने मर्ज का पता ही नहीं है। भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा ‘माउथ कैंसर’ के मरीज हैं, इस श्रेणी के कुल कैंसर मरीज के लगभग 85 प्रतिशत। इनमें भी युवा मरीजों की तादाद सबसे ज्यादा है। धूम्रपान और गुटखा सेवन इसकी वजहें हैं। दशकों से चिकित्सा जगत से जुड़े लोग यह मांग करते रहे हैं कि देश में धूम्रपान और तंबाकू-गुटखा सेवन को रोकने के कारगर कदम उठाए जाएं। लेकिन अब तक नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है। तंबाकू-गुटखा खाने वाले मुंह के जिस भाग में तंबाकू को दबाकर रखते हैं, वहां सबसे पहले सफेद धब्बा बनता है। बाद में यह लाल हो जाता है। हालांकि ये दोनों ही शुरुआती चरण हैं। इनसे निजात पाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। बस गुटखा या तंबाकू खाना बंद कर दीजिए। लेकिन उचित दिशा-निर्देश के अभाव में मर्ज दूसरे चरण में पहुंच जाता है, और मुंह के उस हिस्से में दाना यानी ट्यूमर हो जाता है। इसके बाद तो स्थिति फिर बिगड़ती ही चली जाती है। दरअसल, कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि को ही कैंसर कहा जाता है। जब शरीर के किसी भाग की कोशिका अपनी पहचान खोकर असामान्य ढंग से बढ़ने लगती है, तो माना जाता है कि उस व्यक्ति को कैंसर हो रहा है। भारतीय पुरुषों में फेफड़े का कैंसर आम है और इससे सबसे ज्यादा लोगों की मौत होती है। दरअसल, विकास की अंधाधुंध दौड़ में हम पर्यावरण से दूर और प्रदूषण के करीब होते गए। अब यही दूषित वायु हमारे शरीर में प्रवेश कर फेफेड़े को छलनी कर रही है। ऊपर से शहरी चकाचौंध, फैशन और मानसिक तनाव ने हमें धूम्रपान और नशे का आदी बना दिया है। महिलाओं में दो तरह के कैंसर आम हैं- स्तन कैंसर व बच्चेदानी का कैंसर। शहरी महिलाएं स्तन कैंसर का शिकार हो रही हैं, तो ग्रामीण महिलाओं में बच्चेदानी के कैंसर सामान्य रोग हैं। इन दिनों शहरों में लड़कियां देर से शादी कर रही हैं। इससे कई तरह की शारीरिक समस्याएं आती हैं और हॉर्मोन विसंगतियां शुरू हो जाती हैं। नतीजतन महिलाएं स्तन कैंसर का शिकार हो जाती हैं। इसलिए शहरी महिलाओं को अपना नियमित चेक-अप कराना चाहिए। लड़कियां चाहें, तो खुद ही इसका चेक-अप कर सकती हैं। 40 वर्ष से अधिक उम्र की औरतों को साल में एक बार मैमोग्राम टेस्ट करवाना चाहिए। ग्रामीण महिलाओं में बच्चेदानी के कैंसर की दो वजहें होती हैं- पहली, दूषित खान-पान व रहन-सहन और दूसरी, शारीरिक संबंधों में सफाई को प्राथमिकता न देना। हालांकि इस मर्ज से छुटकारा पाने की दिशा में हमें अहम कामयाबी मिल चुकी है। इसकी रोकथाम के लिए बाजार में टीके आ गए हैं, जो कारगर हैं। हमें इस बात की गांठ बांध लेनी होगी कि बहुतायत कैंसर मानव जनित हैं। हमने गांवों की जमीन में कीटनाशक डाल दिए, तो शहरों को कल-कारखानों से प्रदूषित कर दिया। रहन-सहन, खान-पान और हमारा समाज ही इस रोग के लिए जिम्मेदार हैं। परंतु 10-15 फीसदी कैंसर के मामले ऐसे भी आते हैं, जो वंशानुगत होते हैं। मसलन बच्चों में ब्लड कैंसर या फिर ब्रेन ट्यूमर होना। अपने देश में कैंसर के सबसे ज्यादा मामले आ रहे हैं, इसलिए अपने देश के चिकित्सक भी इस मायने में काफी अनुभवी हैं। अत: यह कहना गलत होगा कि अपने यहां इस बीमारी का पता नहीं चल पाता है। काफी कुछ अस्पतालों में मौजूद सुविधाओं, चिकित्सकों की योग्यता और उनके अनुभव पर निर्भर करता है। वैसे भी, सिर्फ एक ही मेडिकल टेस्ट के जरिये कैंसर का पता नहीं चलता। इसके लिए ब्लड टेस्ट, एक्स-रे, सीटी स्कैन, एडवांस्ड एमआरआई, एंडोस्कोपी कराने होते हैं। कोशिका की असामान्य वृद्धि का पता चलने के बाद ग्राउंड स्टोरी और मरीज के इतिहास को भी जानना होता है। फिर उस असामान्य कोशिका को ढूढ़ना होता है, जहां गड़बड़ियां होती हैं। लेकिन चेक व क्रॉस चेक के जरिये ही हम इस कैंसर से निजात पा सकते हैं।
प्रस्तुति: प्रवीण प्रभाकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
कुछ दशक पहले तक अपने देश में लोगों की औसत आयु 50-60 साल के बीच होती थी। उस वक्त कई तरह की समस्याएं थीं। गांव के गांव महामारी की चपेट में आ जाते थे। हैजा, चेचक, प्लेग, टीबी जैसी बीमारियों का इलाज तक हर जगह संभव नहीं था। व्यापक राष्ट्रीय टीकाकरण योजनाएं नहीं थीं। बाद के दौर में कई मर्जों का इलाज बड़े पैमाने पर संभव हो पाया। एंटीबायोटिक्स ने हमारी जिंदगी लंबी कर दी। टीकाकरण का दौर शुरू हुआ और लोगों की औसत आयु बढ़कर 70 साल हो गई। वर्ष 2012 के आते-आते तक तो लोगों की औसत आयु 70 से 80 साल के बीच पहुंच गई है। उम्र का लंबा होना यह बताता है कि अब अधिकतर बीमारियों का इलाज देश में संभव है। यहां तक कि कई महामारियों का देश से उन्मूलन हो गया है। लेकिन जैसे-जैसे हमारी जिंदगी बढ़ती गई, हम कामकाजी व्यस्तताओं में उलझते गए। खास तौर पर शहरी जिंदगियां मिलावट, जंक फूड, धूम्रपान, गुटखा सेवन, नशाखोरी जैसी बुरी आदतों का शिकार होने लगीं और फिर कैंसर ने हमारे समाज को जकड़ लिया। मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहता हूं, क्योंकि भारत में कैंसर मरीजों की संख्या को लेकर विभिन्न संगठनों में एक-सी राय नहीं है। पर इसमें कोई दोराय नहीं कि करोड़ों लोग इसकी चपेट में हैं और हर साल इसमें लाखों लोग जुड़ते जा रहे हैं। वैसे लोगों की भी तादाद कम नहीं है, जो कैंसर पीड़ित हैं, परंतु उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं है। अक्सर जब हम दिल्ली के आसपास के इलाकों में चिकित्सा शिविर लगाते हैं, लोगों का मेडिकल चेक-अप करते हैं या कैंसर जागरूकता अभियान चलाते हैं, तो हमारी मुलाकात ऐसे मरीजों की भीड़ से होती है, जिसे अपने मर्ज का पता ही नहीं है। भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा ‘माउथ कैंसर’ के मरीज हैं, इस श्रेणी के कुल कैंसर मरीज के लगभग 85 प्रतिशत। इनमें भी युवा मरीजों की तादाद सबसे ज्यादा है। धूम्रपान और गुटखा सेवन इसकी वजहें हैं। दशकों से चिकित्सा जगत से जुड़े लोग यह मांग करते रहे हैं कि देश में धूम्रपान और तंबाकू-गुटखा सेवन को रोकने के कारगर कदम उठाए जाएं। लेकिन अब तक नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है। तंबाकू-गुटखा खाने वाले मुंह के जिस भाग में तंबाकू को दबाकर रखते हैं, वहां सबसे पहले सफेद धब्बा बनता है। बाद में यह लाल हो जाता है। हालांकि ये दोनों ही शुरुआती चरण हैं। इनसे निजात पाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। बस गुटखा या तंबाकू खाना बंद कर दीजिए। लेकिन उचित दिशा-निर्देश के अभाव में मर्ज दूसरे चरण में पहुंच जाता है, और मुंह के उस हिस्से में दाना यानी ट्यूमर हो जाता है। इसके बाद तो स्थिति फिर बिगड़ती ही चली जाती है। दरअसल, कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि को ही कैंसर कहा जाता है। जब शरीर के किसी भाग की कोशिका अपनी पहचान खोकर असामान्य ढंग से बढ़ने लगती है, तो माना जाता है कि उस व्यक्ति को कैंसर हो रहा है। भारतीय पुरुषों में फेफड़े का कैंसर आम है और इससे सबसे ज्यादा लोगों की मौत होती है। दरअसल, विकास की अंधाधुंध दौड़ में हम पर्यावरण से दूर और प्रदूषण के करीब होते गए। अब यही दूषित वायु हमारे शरीर में प्रवेश कर फेफेड़े को छलनी कर रही है। ऊपर से शहरी चकाचौंध, फैशन और मानसिक तनाव ने हमें धूम्रपान और नशे का आदी बना दिया है। महिलाओं में दो तरह के कैंसर आम हैं- स्तन कैंसर व बच्चेदानी का कैंसर। शहरी महिलाएं स्तन कैंसर का शिकार हो रही हैं, तो ग्रामीण महिलाओं में बच्चेदानी के कैंसर सामान्य रोग हैं। इन दिनों शहरों में लड़कियां देर से शादी कर रही हैं। इससे कई तरह की शारीरिक समस्याएं आती हैं और हॉर्मोन विसंगतियां शुरू हो जाती हैं। नतीजतन महिलाएं स्तन कैंसर का शिकार हो जाती हैं। इसलिए शहरी महिलाओं को अपना नियमित चेक-अप कराना चाहिए। लड़कियां चाहें, तो खुद ही इसका चेक-अप कर सकती हैं। 40 वर्ष से अधिक उम्र की औरतों को साल में एक बार मैमोग्राम टेस्ट करवाना चाहिए। ग्रामीण महिलाओं में बच्चेदानी के कैंसर की दो वजहें होती हैं- पहली, दूषित खान-पान व रहन-सहन और दूसरी, शारीरिक संबंधों में सफाई को प्राथमिकता न देना। हालांकि इस मर्ज से छुटकारा पाने की दिशा में हमें अहम कामयाबी मिल चुकी है। इसकी रोकथाम के लिए बाजार में टीके आ गए हैं, जो कारगर हैं। हमें इस बात की गांठ बांध लेनी होगी कि बहुतायत कैंसर मानव जनित हैं। हमने गांवों की जमीन में कीटनाशक डाल दिए, तो शहरों को कल-कारखानों से प्रदूषित कर दिया। रहन-सहन, खान-पान और हमारा समाज ही इस रोग के लिए जिम्मेदार हैं। परंतु 10-15 फीसदी कैंसर के मामले ऐसे भी आते हैं, जो वंशानुगत होते हैं। मसलन बच्चों में ब्लड कैंसर या फिर ब्रेन ट्यूमर होना। अपने देश में कैंसर के सबसे ज्यादा मामले आ रहे हैं, इसलिए अपने देश के चिकित्सक भी इस मायने में काफी अनुभवी हैं। अत: यह कहना गलत होगा कि अपने यहां इस बीमारी का पता नहीं चल पाता है। काफी कुछ अस्पतालों में मौजूद सुविधाओं, चिकित्सकों की योग्यता और उनके अनुभव पर निर्भर करता है। वैसे भी, सिर्फ एक ही मेडिकल टेस्ट के जरिये कैंसर का पता नहीं चलता। इसके लिए ब्लड टेस्ट, एक्स-रे, सीटी स्कैन, एडवांस्ड एमआरआई, एंडोस्कोपी कराने होते हैं। कोशिका की असामान्य वृद्धि का पता चलने के बाद ग्राउंड स्टोरी और मरीज के इतिहास को भी जानना होता है। फिर उस असामान्य कोशिका को ढूढ़ना होता है, जहां गड़बड़ियां होती हैं। लेकिन चेक व क्रॉस चेक के जरिये ही हम इस कैंसर से निजात पा सकते हैं।
प्रस्तुति: प्रवीण प्रभाकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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