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हमको गांव पर लिखना है

कोसी नदी में लहरों का उफान इतना नहीं है कि वे टेलीविजन की खबर बन जाएं, वहां ऐसी कोई तबाही नहीं मच रही कि टीवी के नामचीन चेहरे रिपोर्टिग करने से लेकर कपड़े बांटने तक के लिए वहां चले जाएं। रेणु के मेरीगंज में मलेरिया का ऐसा कोई प्रकोप नहीं है कि दिल्ली और कोलकाता से डॉक्टरों की टीमें रवाना की जाएं। कुल मिलाकर, इन इलाकों में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा, जो खबर का हिस्सा बने। लेकिन गिरि (गिरींद्रनाथ झा) अब तक कई बार कह चुका है- ‘भइया हो, हमको गांव पर लिखने का मन करता है।’ गिरि की इस एक लाइन में खबरों के कारोबार में गांवों के पिछड़ जाने का दर्द है। वह कुछ लिखकर खबरों और मीडिया के धंधे में गांवों की हिस्सेदारी की मांग करता है। आखिर मीडिया के लिए गांव इतना अस्पृश्य क्यों होता चला गया? गिरि मीडिया में जिस गांव को शामिल करने की मांग कर रहा है, वह गांव की ऐसी नॉस्टेल्जिक इमेज खड़ी कर देना नहीं है कि आप शहर में रहने को एक पछतावे का फैसला मानने लग जाएं। गिरि का बस इतना भर कहना है कि आजाद भारत, जो एक कृषि प्रधान लोकतांत्रिक देश की पहचान के साथ आगे बढ़ा, साठ-बासठ साल बाद मीडिया के कारनामे से शीला और मुन्नी प्रधान देश हो गया। इस देश के गांवों और कस्बों से सिर्फ आइटम सांग ही नकलकर आए, चैता, फगुआ की रागिनी निकलकर नहीं आई। गिरि जब कहता है कि भइया हम गांव पर लिखना चाहते हैं, तो दरअसल वह मीडिया से कृषि प्रधान गांवों के देश की तरफ लौटने की बात करता है।
हुंकार में विनीत कुमार

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