class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ब्लॉग वार्ता : बदलते शहरी जीवन के किस्से

व्यक्तिगत सामाजिक पारिवारिक संस्मरणों में भी कई प्रकार के आयाम झलकने लगते हैं। विजय माथुर के इस ब्लॉग को पढ़ते वक्त पारिवारिक तानेबाजियों के बीच एक व्यक्ति के बच जाने की कथा सुनाई दी। विजय माथुर की राजनीतिक जिंदगी के बीच परिवार किसी सियासी अखाड़े की तरह दिखता है और इतिहास के कई दौर दिलचस्प किस्सों की तरह। http://vidrohiswar.blogspot.com  क्लिक करेंगे, तो आपको लखनऊ के एक परिवार के बहाने पूरा शहर दिखने लगेगा।

कारगिल में नौकरी के सिलसिले में था, तो टीबी अस्पताल के सीएमओ ने बोली के आधार पर कहा था कि क्या आप लखनऊ के हैं। नौ वर्ष की उम्र में लखनऊ छोड़ने के बीस साल बाद भी बोली के आधार पर मुझे लखनऊ से जोड़ा गया, लेकिन 49 साल बाद वापस लखनऊ लौटने पर यहां के लोगों ने मुझे बाहरी माना है। लखनऊ  की नई कॉलोनियों में 80 प्रतिशत लोग बाहर से आकर बसे हैं और लखनवी तहजीब से कोसों दूर हैं, वे ही मुझे बाहरी मानते हैं।

विजय माथुर की ये पंक्तियां एक आदमी द्वारा कई शहरों में नौकरी के बाद अपने मूल शहर में लौटने के बाद की टकराहट को बयान करती हैं। वे लिखते हैं कि अपने नजदीकी रिश्तेदार भी वापस आने पर असहज महसूस कर रहे हैं। मैंने भी मेहनत की कमाई से एक छोटा घर खरीदा है। यही उन दौलतवालों रिश्तेदारों को खटकता है। लोगों को ईमानदारी और मेहनत से गुजर-बसर सुहाता नहीं है। जो ज्योतिषी बेईमानी और पाखंड पर चलते हैं, उन्हें भी मेरा ईमानदारी और वैज्ञानिक आधार पर चलना अच्छा नहीं लगता है।

विजय माथुर अपने पिता के समय में ले जाते हैं। बाबूजी कालीचरण हाई स्कूल में पढ़ते थे। टेनिस में सीनियर ब्वॉयज एसोसिएशन में पंडित अमृतलाल नागर के साथ भी बाबूजी खेले थे। आगे बढ़ते इस संस्मरण में बाबूजी के साथ रिश्तेदारों और भाइयों के छल-कपट की सार्वभौमिक दास्तानें हैं। हमारे देश के असंख्य परिवारों के ये सब किस्से हैं, जहां भाई ने भाई का जीना मुहाल कर रखा है। दरअसल हम परिवार को देश की तरह देखने लगते हैं। किन्हीं राष्ट्रवादी क्षणों में पारिवारिक एकता के अहसास को छोड़ दें, तो बाकी समय में झगड़ने और छल-कपट के ही किस्से संस्मरणों में चले आते हैं।

विजय माथुर सिलीगुड़ी के अपने स्कूली दिनों की भी बातें बता रहे हैं। हमारे हेड मास्टर के एन ओझा द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल थे। वारंट ऑफिसर के रूप में। उनके बैच में 20 लोग भर्ती हुए थे। 19 मारे गए। वह आगरा में तैनात रहे, इसलिए बच गए। निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे’ कड़क आवाज में सस्वर पाठ उनके ओज को दर्शाता था।

1965 में जब भारत-पाक युद्ध हुआ, तब नौवीं क्लास के विजय माथुर कविता लिख रहे थे। खाने को था नहीं पैसा, केवल धोती-कुरता और कंघा, खदरी पोशाक और दो पैसे का चश्मा ले लिया। ग्राम में तार आया, कार्य संभालो चलो देहली, जब खिलवाड़ भारत के साथ पाकिस्तान ने किया, तो सिंह का बहादुर लाल भी चुप न रह कदम उठाया, खदेड़ कश्मीर से शत्रु को, फिरोजपुर से धकेल दिया, अड्डा हवाई सरगोधा का तोड़, लाहौर भी ले लिया। विजय बताते हैं कि युद्ध के बाद दुर्गा पूजा के पंडालों में अब्दुल हमीद आदि शहीदों की मूर्तियां भी सजाई गईं। टूटे पाकिस्तानी पैटन टैंकों की भी झलकियां दिखाई गईं।

इन संस्मरणों से कितना कुछ आंखों के सामने घूम जाता है। विजय लिखते हैं कि शास्त्रीजी और जनरल चौधरी जनता में बेहद लोकप्रिय हो गए थे। युद्ध की समाप्ति पर कलकत्ता की जनसभा में शास्त्रीजी ने कहा था, वह आज भी याद है। पड़ोसी भास्करानंद मित्र ने अपना रेडियो बाहर रख दिया था, ताकि सभी शास्त्रीजी को सुन सकें। शास्त्रीजी ने सोमवार को अन्न त्याग देने का नारा दिया था। हमारे घर शनिवार की शाम रोटी-चावल नहीं खाते थे।

सैनिक समाचार में छपी एक कविता का उल्लेख है। सीमा मांग रही कुर्बानी, भू माता की रक्षा करने बढ़ो वीर सेनानी। बताते हैं कि हाल यह था कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शनों में भी युद्ध के नारे गूंजने लगते थे। चाहे बरसे जितने गोले,चाहे गोलियां, अब न रुकेंगी दीवानों की टोलियां। खैर अब राजधानियों में हड़तालियों को रोकने के लिए स्थायी अवरोधक लग चुके हैं।

विजय माथुर लिखते हैं कि सिलीगुड़ी में सभी किताबें नहीं मिलती थीं। एक मित्र के पिताजी कलकत्ता में थे। वह किताबें भेज देते थे। मैंने हिन्दी निबंध की पुस्तक उससे लेकर तीन-चार दिनों में दो कॉपियों पर पूरी उतार डाली। देर रात तक लालटेन की रोशनी में भी लिखकर। यह ब्लॉग अच्छा है।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है, naisadak.blogspot.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:ब्लॉग वार्ता : बदलते शहरी जीवन के किस्से