सैमसंग ने पेश किया गैलेक्सी ग्रांड क्वात्रो
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इस मोड़ के आगे का रास्ता
प्रमोद जोशी
First Published:28-09-10 09:09 PM
Last Updated:28-09-10 09:21 PM
मीडिया की दूरबीन बता रही है कि यह हफ्ता अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और कॉमनवेल्थ खेलों की फज़ीहत के नाम रहेगा। यमुना का पानी उतर रहा है। सिर्फ मीडिया के सहारे जो दुनिया को देखते हैं, उन्हें धुंधली सी याद है कि इस साल शायद पहाड़ों में भी बाढ़ आई थी। उस पर फोनो किए थे। फिलहाल कुत्तों, बिल्लियों, साँपों और चमगादड़ों की तस्वीरें चाहिएं, जिनके बैकड्रॉप में कॉमनवेल्थ खेल गाँव हो। अगले हफ्ते खेल शुरू हो जाएंगे। कुछ दिन वहाँ ओबी वैन रहेगी। फिर डेढ़ महीने का बिहार समारोह शुरू होने वाला है। पितृपक्ष खत्म होते ही त्योहार शुरू। न्यू ईयर तक का शेडय़ूल टाइट। मीडिया के लिए न हो, पर कश्मीर के लिए यह हफ्ता काफी महत्वपूर्ण होगा।
कश्मीर पर पिछले दो हफ्तों में जो बातचीत हुई उसका असर देखने की ज़रूरत है। गृहमंत्री ने शांति-पहल के रूप में जो आठ सूत्री कार्यक्रम घोषित किया है, उसे अलगाववादियों ने पूरी तरह नामंजूर कर दिया है। देखना यह चाहिए कि क्या इस इलाके में कोई मौन पक्ष भी है, जो अलगाववादियों के दबाव में हो। इस पहल के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। एक है स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई और परीक्षा कार्यक्रम। दूसरे वार्ताकारों के नामों की घोषणा। उम्मीद है गुरुवार को इन वार्ताकारों के नाम घोषित कर दिए जाएंगे।
सोमवार को स्कूल-कॉलेज खुल गए, पर शहरी इलाकों में छात्रों की संख्या बहुत कम रही। सैयद अली शाह गिलानी ने हड़तालों का नया कार्यक्रम घोषित किया है। इस दौरान बच्चों को स्कूल न भेजने का आह्वान किया गया है। पिछले 108 दिनों में से 75 दिन हड़ताल रही है। सोमवार को केवल ग्रामीण इलाकों में बच्चों स्कूलों में देखे गए। आमतौर पर 10वीं और 12वीं के छात्र ही पथराव में शामिल रहते हैं। बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने परीक्षा-कार्यक्रम भी घोषित कर दिया है। अलगाववादी स्कूलों को खुलने देना नहीं चाहते। सरकारी स्कूलों पर उनका ज़ोर नहीं है, प्राइवेट स्कूलों के प्रबंधक स्कूल नहीं खोलने की घोषणा कर चुके हैं। क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल दुविधा में हैं। सरकार ने डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट को भी हटाने की प्रक्रिया शुरू की है। पथराव के कारण गिरफ्तार किए गए किशोरों को रिहा करना शुरू कर दिया गया है। केन्द्र ने 100 करोड़ का पैकेज घोषित किया है, पर कश्मीर का मसला विकास या बेरोजगारी वगैरह से जुड़ा नहीं है। बेरोज़गारी वहाँ की भी समस्या होगी, पर कश्मीर बहुत से दूसरे राज्यों से बेहतर है। इसे समझने की कोशिश करनी चाहिए कि कश्मीर की समस्या राजनैतिक अलगाव से जुड़ी है।
1953 में शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के बाद से शुरू हुआ यह अलगाव बढ़ता ही चला गया। ऐसा लगता है कि 1947 से लेकर 1965 तक कश्मीर के नागरिक भारत के साथ जुड़े रहने के इच्छुक थे। 1965 में भी 1947 की तरह पाकिस्तानी रज़ाकार घुसे थे, पर कश्मीरी नागरिकों ने ही सुरक्षा दलों को सूचना दी। 70 और 80 के दशक में वहाँ चुनाव में धांधली और एक के बाद एक मनमर्जी के मुख्यमंत्री नियुक्त करने से पढ़े-लिखे लोगों में नाराज़गी घर कर गई।
हमारे संविधान का अनुच्छेद 370 कश्मीर को ध्यान में रखकर ही बनाया गया था। वह सिद्धांत और व्यवहार में लागू नहीं हुआ। जो उसे लागू कराना चाहते हैं उनका मानना है कि वह लागू ही नहीं हुआ। जो उसे हटाना चाहते हैं, वे मानते हैं कि यह न होता तो कश्मीर समस्या ही न होती। दोनों पक्ष असंतुष्ट हैं। अलगाव केवल कश्मीरियों के मन में ही नहीं है। शेष भारत के मन में भी कश्मीर को लेकर अलगाव है। कश्मीर के मसले को अलग कर दें, तब भी हमारे यहां फेडरलिज्म यानी संघवाद पर खुलकर चर्चा नहीं हो पाई। जिस आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) को लेकर उमर अब्दुल्ला सवाल उठा रहे हैं, उसका सवाल पूर्वी भारत में पहले से उठ रहा है। इरोम शर्मीला के आमरण अनशन की ओर देशवासियों का ध्यान ही नहीं गया। इतने विशाल देश को एक बनाए रखने के लिए कड़े कानूनों की ज़रूरत होती है, पर यह जानना भी ज़रूरी होता है कि दूर-दराज़ की जनता क्या चाहती है। समूचा नक्सली आंदोलन इसी किस्म की उपेक्षा का परिणाम है।
कश्मीर में अली शाह गिलानी या उन जैसे पाकपरस्त लोगों को बढ़ने और पनपने का मौका किसने दिया? गिलानी 1987 में कश्मीर विधानसभा के सदस्य रह चुके हैं। 1989 में हिंसा भड़कने के बाद उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। समूचे कश्मीर की राय उनकी राय है यह मान लेना उचित नहीं। पाकिस्तान में बैठे सैयद सलाहुद्दीन ने भी चुनाव लड़ा था। आरोप है कि रिगिंग की वजह से वे हार गए। बहरहाल पिछले हफ्ते के राजनैतिक प्रयासों पर बारीकी से ध्यान देने की ज़रूरत है। अब ज्यादा महत्वपूर्ण काम उस वार्ता-समिति के जिम्मे होगा, जिसकी घोषणा इस गुरुवार को होगी। यह समिति हर तरीके के लोगों से बात करेगी। कश्मीर की अशांति का केन्द्र पाकिस्तान है। दुर्भाग्य है कि पाकिस्तान की राजनैतिक उठा-पटक इस समस्या के समाधान में बाधा बनती रही है। सन् 2004 से 2007 तक जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ बातचीत के बाद दोनों देश समाधान के कुछ सूत्रों को खोज पाने में कामयाब हो गए थे। पाकिस्तान की मौजूदा सरकार शुरू में मुशर्रफ की बातचीत को सिरे से नकार रही थी, पर हाल में पाक विदेश मंत्री ने माना कि अतीत में हुई प्रगति को हम खारिज नहीं करेंगे। कश्मीर का हल खोजने के पहले कुछ बुनियादी सूत्र तय करने होंगे। भारत-पाकिस्तान और कश्मीर में इस समस्या को लेकर कई विचार हैं। इन्हें एक जगह लाना आसान काम नहीं, पर यह असम्भव भी नहीं है।
कश्मीर-दौरे पर गई संसदीय टीम की मुलाकात हाशिम कुरैशी से भी हुई। हाशिम कुरैशी 30 जनवरी 1971 में इंडियन एयरलाइंस के विमान को हाइजैक करके लाहौर ले गया था। लाहौर में उस विमान को विस्फोट करके नष्ट कर दिया गया था। हाशिम को 14 साल की कैद हुई। सन् 2000 में वह वापस आ गया। वह कश्मीर में भारतीय हस्तक्षेप के खिलाफ है, पर कहता है कि भारत और पाकिस्तान में से किसी एक को चुनना हो तो मैं भारत को चुनूँगा। पाक गिरफ्त वाले कश्मीर की बदहाली से वह नाखुश है। समस्या के कानूनी, राजनैतिक और सांस्कृतिक तमाम पहलू हैं। इन पर ठंडे दिमाग से सोचें। यह देखते हुए कि मामला किस मोड़ तक पहुँच गया है। अब हम पीछे नहीं जा सकते, इसलिए इस मोड़ के आगे ही जाना होगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
pjoshi23@gmail.com
कश्मीर पर पिछले दो हफ्तों में जो बातचीत हुई उसका असर देखने की ज़रूरत है। गृहमंत्री ने शांति-पहल के रूप में जो आठ सूत्री कार्यक्रम घोषित किया है, उसे अलगाववादियों ने पूरी तरह नामंजूर कर दिया है। देखना यह चाहिए कि क्या इस इलाके में कोई मौन पक्ष भी है, जो अलगाववादियों के दबाव में हो। इस पहल के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। एक है स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई और परीक्षा कार्यक्रम। दूसरे वार्ताकारों के नामों की घोषणा। उम्मीद है गुरुवार को इन वार्ताकारों के नाम घोषित कर दिए जाएंगे।
सोमवार को स्कूल-कॉलेज खुल गए, पर शहरी इलाकों में छात्रों की संख्या बहुत कम रही। सैयद अली शाह गिलानी ने हड़तालों का नया कार्यक्रम घोषित किया है। इस दौरान बच्चों को स्कूल न भेजने का आह्वान किया गया है। पिछले 108 दिनों में से 75 दिन हड़ताल रही है। सोमवार को केवल ग्रामीण इलाकों में बच्चों स्कूलों में देखे गए। आमतौर पर 10वीं और 12वीं के छात्र ही पथराव में शामिल रहते हैं। बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने परीक्षा-कार्यक्रम भी घोषित कर दिया है। अलगाववादी स्कूलों को खुलने देना नहीं चाहते। सरकारी स्कूलों पर उनका ज़ोर नहीं है, प्राइवेट स्कूलों के प्रबंधक स्कूल नहीं खोलने की घोषणा कर चुके हैं। क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल दुविधा में हैं। सरकार ने डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट को भी हटाने की प्रक्रिया शुरू की है। पथराव के कारण गिरफ्तार किए गए किशोरों को रिहा करना शुरू कर दिया गया है। केन्द्र ने 100 करोड़ का पैकेज घोषित किया है, पर कश्मीर का मसला विकास या बेरोजगारी वगैरह से जुड़ा नहीं है। बेरोज़गारी वहाँ की भी समस्या होगी, पर कश्मीर बहुत से दूसरे राज्यों से बेहतर है। इसे समझने की कोशिश करनी चाहिए कि कश्मीर की समस्या राजनैतिक अलगाव से जुड़ी है।
1953 में शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के बाद से शुरू हुआ यह अलगाव बढ़ता ही चला गया। ऐसा लगता है कि 1947 से लेकर 1965 तक कश्मीर के नागरिक भारत के साथ जुड़े रहने के इच्छुक थे। 1965 में भी 1947 की तरह पाकिस्तानी रज़ाकार घुसे थे, पर कश्मीरी नागरिकों ने ही सुरक्षा दलों को सूचना दी। 70 और 80 के दशक में वहाँ चुनाव में धांधली और एक के बाद एक मनमर्जी के मुख्यमंत्री नियुक्त करने से पढ़े-लिखे लोगों में नाराज़गी घर कर गई।
हमारे संविधान का अनुच्छेद 370 कश्मीर को ध्यान में रखकर ही बनाया गया था। वह सिद्धांत और व्यवहार में लागू नहीं हुआ। जो उसे लागू कराना चाहते हैं उनका मानना है कि वह लागू ही नहीं हुआ। जो उसे हटाना चाहते हैं, वे मानते हैं कि यह न होता तो कश्मीर समस्या ही न होती। दोनों पक्ष असंतुष्ट हैं। अलगाव केवल कश्मीरियों के मन में ही नहीं है। शेष भारत के मन में भी कश्मीर को लेकर अलगाव है। कश्मीर के मसले को अलग कर दें, तब भी हमारे यहां फेडरलिज्म यानी संघवाद पर खुलकर चर्चा नहीं हो पाई। जिस आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) को लेकर उमर अब्दुल्ला सवाल उठा रहे हैं, उसका सवाल पूर्वी भारत में पहले से उठ रहा है। इरोम शर्मीला के आमरण अनशन की ओर देशवासियों का ध्यान ही नहीं गया। इतने विशाल देश को एक बनाए रखने के लिए कड़े कानूनों की ज़रूरत होती है, पर यह जानना भी ज़रूरी होता है कि दूर-दराज़ की जनता क्या चाहती है। समूचा नक्सली आंदोलन इसी किस्म की उपेक्षा का परिणाम है।
कश्मीर में अली शाह गिलानी या उन जैसे पाकपरस्त लोगों को बढ़ने और पनपने का मौका किसने दिया? गिलानी 1987 में कश्मीर विधानसभा के सदस्य रह चुके हैं। 1989 में हिंसा भड़कने के बाद उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। समूचे कश्मीर की राय उनकी राय है यह मान लेना उचित नहीं। पाकिस्तान में बैठे सैयद सलाहुद्दीन ने भी चुनाव लड़ा था। आरोप है कि रिगिंग की वजह से वे हार गए। बहरहाल पिछले हफ्ते के राजनैतिक प्रयासों पर बारीकी से ध्यान देने की ज़रूरत है। अब ज्यादा महत्वपूर्ण काम उस वार्ता-समिति के जिम्मे होगा, जिसकी घोषणा इस गुरुवार को होगी। यह समिति हर तरीके के लोगों से बात करेगी। कश्मीर की अशांति का केन्द्र पाकिस्तान है। दुर्भाग्य है कि पाकिस्तान की राजनैतिक उठा-पटक इस समस्या के समाधान में बाधा बनती रही है। सन् 2004 से 2007 तक जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ बातचीत के बाद दोनों देश समाधान के कुछ सूत्रों को खोज पाने में कामयाब हो गए थे। पाकिस्तान की मौजूदा सरकार शुरू में मुशर्रफ की बातचीत को सिरे से नकार रही थी, पर हाल में पाक विदेश मंत्री ने माना कि अतीत में हुई प्रगति को हम खारिज नहीं करेंगे। कश्मीर का हल खोजने के पहले कुछ बुनियादी सूत्र तय करने होंगे। भारत-पाकिस्तान और कश्मीर में इस समस्या को लेकर कई विचार हैं। इन्हें एक जगह लाना आसान काम नहीं, पर यह असम्भव भी नहीं है।
कश्मीर-दौरे पर गई संसदीय टीम की मुलाकात हाशिम कुरैशी से भी हुई। हाशिम कुरैशी 30 जनवरी 1971 में इंडियन एयरलाइंस के विमान को हाइजैक करके लाहौर ले गया था। लाहौर में उस विमान को विस्फोट करके नष्ट कर दिया गया था। हाशिम को 14 साल की कैद हुई। सन् 2000 में वह वापस आ गया। वह कश्मीर में भारतीय हस्तक्षेप के खिलाफ है, पर कहता है कि भारत और पाकिस्तान में से किसी एक को चुनना हो तो मैं भारत को चुनूँगा। पाक गिरफ्त वाले कश्मीर की बदहाली से वह नाखुश है। समस्या के कानूनी, राजनैतिक और सांस्कृतिक तमाम पहलू हैं। इन पर ठंडे दिमाग से सोचें। यह देखते हुए कि मामला किस मोड़ तक पहुँच गया है। अब हम पीछे नहीं जा सकते, इसलिए इस मोड़ के आगे ही जाना होगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
pjoshi23@gmail.com
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