रविवार, 19 मई, 2013 | 17:53 | IST
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चीन की बढ़ती ताकत का अर्थ
हर्ष वी. पंत
First Published:20-08-10 09:31 PM
Last Updated:20-08-10 09:56 PM
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चीन अब जापान को पछाड़ते हुए दुनिया की दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन गया है। इस आर्थिक ताकत का इस्तेमाल वह अपनी फौज को आधुनिक बनाने में कर रहा है और जल्द ही वह एशिया प्रशांत में अमेरिकी ताकत को पीछे छोड़ देगा। उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी ताईवान अब उसके मुकाबले में कहीं नहीं ठहरता और इसके बाद वह जापान और भारत जैसी क्षेत्रीय ताकतों को पीछे छोड़ने निकल पड़ा है। चीन और अमेरिका के बीच की फौजी प्रतिद्वंद्विता इस क्षेत्र में पूरी तेजी से चल रही है, इसलिए सभी क्षेत्रीय ताकतें चीन के मुकाबले जवाबी नीतियां बनाने में जुट गई हैं।
बीजिंग ने यह दावा करना शुरू कर दिया है कि चीन के दक्षिण का सारा समुद्र उसकी सीमा है। वह इसे ‘मुख्य राष्ट्रीय हित’ कहता है, पहले यह मुहावरा तिब्बत और ताईवान के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसका असर फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम और ताईवान पर पड़ा है, समुद्री सीमा के उनके भी अपने-अपने दावे हैं। आमतौर पर समुद्री सीमा 12 किलोमीटर तक मानी जाती है जो किसी देश का आर्थिक क्षेत्र भी होती है, लेकिन चीन ने उसे लगभग 200 किलोमीटर तक बढ़ा दिया है। चीन मुक्त नौवहन के मूल सिद्धांतों को ही चुनौती दे रहा है। चीन के इस दावे का नतीजा यह हुआ है कि हाल के वर्षो में उसने सैकड़ों वियतनामी मछुआरों को पकड़ा है। अमेरिकी व अन्य नौसेनाओं को परेशान किया है। यहां तक कि हनोई के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाली बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भी दिक्कत खड़ी की है। मजबूरी में अमेरिका को कई बार इसका जवाब भी देना पड़ा है। आसियान की हाल की बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने सुझाव दिया था कि अमेरिका दक्षिणी चीनी समुद्र में परस्पर विरोधी दावों को लेकर मध्यस्थता कर सकता है, जाहिर है वह चीन की सीमा तय करना चाहता है।
पिछले महीने जब अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने संयुक्त सैन्य अभ्यास किया था तो भी चीन ने इस पर एतराज जताया था। उसका कहना था कि यह काम भड़काने वाला है। उसे सबसे ज्यादा एतराज पीले सागर में अमेरिकी विमानवाहक पोत की मौजूदगी को लेकर था। एतराज के बावजूद अमेरिका ने अभ्यास किया, हालांकि उसने खुद को पश्चिमी जापान के आसपास तक ही सीमित रखा। पिछले दो दशकों में दक्षिणी चीन सागर के विवाद में दरकिनार किए जाने के बाद अब अमेरिका ने भी कमर कस ली है और अब वह इस क्षेत्र के अपने सहयोगियों को आश्वस्त कर रहा है कि चीन की बढ़ती ताकत को चुनौती दी जाएगी। दक्षिण चीनी समुद्र का विवाद सिर्फ इसके संसाधनों का विवाद ही नहीं है, चीन ऐसी नौसेना तैयार करना चाहता है जो इसके तटों से बहुत दूर भी अपने काम को अंजाम दे सके। दक्षिणी चीनी सागर का विवाद पिछले दिनों इसलिए भी गर्मा गया क्योंकि वह वहां हैनान में अपना नौसैनिक अड्डा बनाना चाहता है। यह जगह वियतनाम के तट से बहुत ज्यादा दूर नहीं है। इस काम के लिए हैनान बहुत अच्छी जगह नहीं है, लेकिन इसका कोई विकल्प भी नहीं है। बाकी हर जगह रास्ते में छोटे-छोटे द्वीप बाधा बने खड़े हैं। चीन ऐसी जगह अपना अड्डा बनाना चाहता है जहां रास्ता साफ हो और किसी को भी उसकी पनडुब्बियों की आवाजाही की भनक न लगे।
पिछले कुछ महीनों में चीनी नौसेना की मलेशियाई, इंडोनेशियाई और वियतनामी नौसेनाओं से झड़पों की खबरें मिली हैं। अप्रैल में वहां चीन ने अपना नौसैनिक अभ्यास किया था और इस दौरान उसके हैलीकाप्टर जापान की सीमा के 90 मीटर तक अंदर घुस आए थे, जिस पर जापान ने काफी हंगामा भी किया था। पड़ोसी देशों के साथ ऐसी उल्लंघनों की तो एक पूरी फेहरिस्त है।
इस बीच दक्षिण कोरिया भी चीन से अपने रिश्तों का फिर से आकलन करने में जुटा है। हाल के वर्षो में चीन ने दक्षिण कोरिया को अपना सबसे अच्छा दोस्त बना लिया था। मिंग शासनकाल के सांस्कृतिक रिश्तों की यादों ने इस दोस्ती में मदद की थी। दक्षिण कोरिया को उम्मीद थी कि उसके प्रायद्वीप में हालात को स्थिर बनाने में बीजिंग उसकी मदद करेगा। वह इस क्षेत्र में चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है, चीन से वहां जाने वालों का काफी स्वागत किया जाता है, पर अब दक्षिण कोरिया का मोहभंग हो गया है। चेनान की घटना के बाद जब पूरी दुनिया उत्तर कोरिया की निंदा कर रही थी तो चीन ने उसका पक्ष लेना शुरू कर दिया। इस घटना में उत्तर कोरिया ने तारपीडो से दक्षिण कोरिया के युद्धक विमान चेनान को गिरा दिया था जिसमें सवार सभी 46 दक्षिण कोरियाई नाविक मारे गए थे। इस हमले के लिए प्योंगयांग की निंदा करने के बजाय चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव का विरोध किया जो दरअसल उत्तर कोरिया की निंदा करने के लिए था। इसी वजह से सुरक्षा परिषद दक्षिण कोरिया के खिलाफ कोई कड़ा कदम नहीं उठा सकी।
पूर्वी एशिया में चीन की जिस ‘साफ्ट पावर’ का जिक्र किया जाता था अब वह सोच बेमतलब हो गई है। चीन के ‘शांतिपूर्ण उदय’ का तर्क अब संदेह के घेरे में है। भारत के नीति नियामकों को अब चीन की बढ़ती ताकत का यथार्थवादी आकलन करना चाहिए। चीन का हठ जिस तरह से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताएं बदलने का वक्त आ गया है। चीन ने बहुत से तरीकों से भारत पर निशाना साधा हुआ है। और अगर एक बार चीन ने पूर्वी एशिया पर अपना दबदबा कायम कर लिया तो भारत के लिए अपने महत्वपूर्ण हितों को बचाना मुश्किल हो जाएगा। उस हालात से निपटने की तैयारी करने का वक्त अब आ गया है।
लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं

 
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