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एक छोटी सी उम्मीद का अंत
हर्ष वी. पंत
First Published:08-02-10 11:42 PM
Last Updated:09-02-10 12:25 AM
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एक साल में कितना फर्क पड़ जाता है? एक साल पहले बराक ओबामा की वाहवाही इसलिए हो रही थी कि वे पहले अफ्रीकी अमेरिकी थे जो अमेरिकी राष्ट्रपति पद तक पहुंचे थे जिसे कि दुनिया का सबसे ताकतवर पद माना जाता है। उनके व्यक्तित्व के जादू और खूबसूरत प्रेरणास्पद वाक्य गढ़ने की काबिलियत ने अमेरिकियों को विश्वास दिला दिया था कि उनके देश में एक नया युग शुरू हो चुका है।

उन्होंने युवा अमेरिकियों की एक पूरी नई पीढ़ी को प्रेरित किया कि वे राजनीति को सामाजिक बदलाव के एक औजार की तरह देखें। वे जार्ज बुश के बाद आए इसलिए भी दुनिया उनके लिए बिछी चली गई। बुश से नफरत करने वालों ने अपने आपको यह विश्वास दिला दिया था कि 11 सितम्बर 2001 के बाद हुई सारी अंतरराष्ट्रीय गड़बड़ियों के जिम्मेदार चूंकि  जार्ज बुश थे, इसलिए ओबामा के राष्ट्रपति बनने से संयुक्त राष्ट्रअमेरिका का दुनिया के प्रति नजरिया बदल जाएगा और यह दुनिया एक बेहतर जगह हो जाएगी।

आज अमेरिका में या दुनिया में या और कहीं भी ऐसी भावनाएं ढूंढ़ना मुश्किल है। वाशिंगटन के राजनैतिक नेतृत्व के प्रति अमेरिकी जनता का गुस्सा चरम पर है। हालांकि आर्थिक स्थिति पिछले एक साल में बेहतर हुई है, लेकिन आम अमेरिकियों को इसका लाभ नहीं मिला है, जो अब भी अपने मनचाहे रोजगार नहीं पा सकते। घाटा बढ़ता जा रहा है और अमेरिकी नीति निर्माताओं की उसे काबू में करने की कुव्वत पर प्रश्नचिन्ह लगे हैं। 

ओबामा के समर्थकों को जो चीज सबसे ज्यादा नाराज कर गई है, वह उनकी नीतियों का बाईं ओर झुकाव है।
सन् 2008 को अमेरिका में अनुदार ताकत की मृत्यु का साल माना गया था, जिसमें ‘रेगन युग’ खत्म हो गया। ओबामा के चुनाव जीतने के बावजूद यह साफ था कि अनुदार आर्थिक और सामाजिक मूल्य मजबूत बने रहेंगे। जिन स्वतंत्र मतदाताओं ने ओबामा को वोट दिया था, वे चाहते थे कि वे राजनीति में मध्यमार्ग अपनायें, जिसका उन्होंने अपने अभियान में वायदा किया था। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी के वामपंथियों को ओबामा की विजय में अपना एजेंडा लागू करने और अगले कई वर्षो तक अमेरिका की सामाजिक राजनैतिक नीतियों को अपने मुताबिक ढालने का मौका नजर आया।

इससे स्वतंत्र मतदाताओं को इतनी नाराजगी हुई कि डेमोकेट्र्स की शानदार विजय के सिर्फ एक साल के भीतर उन्हें अपनी पुरानी सीटें जीतना भी मुश्किल हो रहा है। इस साल के सीनेटर और गवर्नर के चुनावों में से प्रमुख डेमोक्रेट्स के हट जाने से डेमोक्रेटिक पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह संदेह हो रहा है कि क्या पार्टी अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में अपना बहुमत बचा पाएगी? एक ताजा गैलप पोल के मुताबिक 40 प्रतिशत अमेरिकियों ने खुद को ‘अनुदार ’ माना, जबकि खुद को ‘उदार’ मानने वाले सिर्फ 21 प्रतिशत थे।

मध्यमार्गी चार प्रतिशत कम होकर 36 प्रतिशत हो गए। अपने को अनुदार मानने वाले स्वतंत्र लोग 30 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत हो गए। स्वतंत्र लोग डेमोकेट्रिक पार्टी से दूर होते चले गए हैं, क्योंकि पार्टी ने वाम रुख अख्तियार कर लिया है।

यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है, जब सुरक्षा के मुद्दों पर ओबामा के नेतृत्व की भारी आलोचना हो रही है। एक अमेरिकी हवाई जहाज को एक यात्राी द्वारा विस्फोट से उड़ाने की कोशिश से ओबामा को वैसा ही झटका लगा है, जैसे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागान हमलों से बुश को लगा था। कहा जाता है कि ओबामा ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को चेतावनी दी है कि ऐसी दूसरी गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इससे यह संदेश मिलता है कि सौम्य नेतृत्व की शैली अब अपनी बर्दाश्त की हद तक पहुंच गई है।

ओबामा ने यह कहा कि ‘आखिरकार जिम्मेदारी मेरी है’ और उन्होंने अमेरिकी गुप्तचर व्यवस्था में दरारों को बंद करने के कई उपायों के आदेश दे दिए हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि आतंकवाद और सुरक्षा के मुददों पर नये सिरे से ध्यान देना क्या ओबामा प्रशासन की प्राथमिकताओं को बदल देगा। घरेलू मोर्चे पर ओबामा पर यह दबाव है कि वे बुरी तरह लहुलुहान अर्थव्यवस्था का उद्धार करें, जबकि स्वास्थ्य, पर्यावरण और आर्थिक नियमन के मामलों में विवादास्पद महत्वाकांक्षी परिवर्तनों के लिए एक अड़ियल संसद को साथ लेना जरूरी है।

विदेश नीति में ओबामा की प्राथमिकता में इराक से सेना की वापसी है, जबकि अफगानिस्तान में वे अमेरिकी उपस्थिति को मजबूत करना चाहते हैं। महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मामलों में विश्व को नेतृत्व दे सकने की उनकी क्षमता को भी परखा जा रहा है। जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन में जो समझौता उन्होंने करवाए, वह जी-20, 2007 के बाली मंत्रिस्तरीय सम्मेलन और दूसरे ऐसे ही सम्मेलनों में किए गए वायदों की जुगाली भर है। 

ओबामा प्रशासन की रणनीति इस गलत यकीन पर आधारित थी कि चीनी कुछ ज्यादा उदार हो सकते हैं। ईरानी और उत्तर कोरियाई सरकारों की तरफ ओबामा ने हाथ बढ़ाया है, लेकिन किसी ने रुचि नहीं दिखाई है। उत्तर कोरिया ने वाशिंगटन की उपेक्षा की है, जबकि ईरानी मुल्लाओं के मन में अमेरिका के लिए सिर्फ घृणा है और वे अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखे हुए हैं। यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में ओबामा चीन को  ज्यादा प्रभावी होने दे रहे हैं और उनके पास क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिए कोई रणनीति नहीं है।

चेक गणराज्य और पोलैण्ड में प्रतिरोधी मिसाइल सिस्टम लगाने की योजना को रद्द करने से रूस तो संतुष्ट हुआ है, लेकिन इससे पूर्व यूरोपियन देशों में डर उत्पन्न हो गया है और सुरक्षा के रखवाले की तरह अमेरिका की विश्वसनीयता भी संदेहास्पद हो गई है।

ओबामा के राज में हालांकि मनमोहन सिंह को पहले राजकीय अतिथि के तौर पर बुलाया गया, लेकिन ओबामा की जीत के पहले भी यह साफ था कि नये प्रशासन की प्राथमिकताओं में भारत बहुत ऊपर नहीं है। इसकी वजह से भारत शायद अकेला देश था जिसने ओबामा से बहुत उम्मीदें नहीं रखी थीं। भारत को अमेरिका के प्रति अपने सावधान रवैये को जारी रखना होगा, क्योंकि अगले वर्ष ओबामा अपने घरेलू एजेंडा में और ज्यादा व्यस्त हो जाएंगे। भारत को हमेशा की तरह अपनी सुरक्षा हितों की रखवाली खुद ही करनी होगी।

जबकि राष्ट्रपति के उम्मीदवार की तरह ओबामा का वक्तृत्व प्रेरणादायी था, सर्वोच्च प्रशासक की तरह उनकी नेतृत्व शैली खोखली दिखाई दे रही है। अक्सर यह शैली उद्देश्यहीन ही दिखाई देती है, जोकि उनके मीडिया आक्रांत सहयोगियों की धुन पर बदलती रहती है,जो सहयोगी राजनीति को नीतियों और जोड़तोड़ को राजनय मान बैठे हैं। ओबामा के लिए अब भी वक्त है कि वे अपने राष्ट्रपतित्व को उबार लें, लेकिन लगातार उनके लिए समय कम होता जा रहा है।

harsh.pant@kcl.ac.uk

लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक है

 
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