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हिमालय पर भारी पड़ेगा यह ‘झूठ’
आशुतोष उपाध्याय
First Published:08-02-10 11:34 PM
Last Updated:08-02-10 11:35 PM
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आईपीसीसी चेयरमैन आर.के. पचौरी ने 2035 तक हिमालयी ग्लेशियरों के पिघल जाने की अपनी बड़बोली घोषणा को तो उन्होंने वापस ले लिया मगर इस प्रकरण के फलितार्थ हिमालयवासियों पर भारी पड़ सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को नकारने वाली अंतरराष्ट्रीय लॉबियां अगर जीत गईं तो बेलगाम उत्सर्जन एशिया की सेहत के बैरोमीटर की बची-खुची सेहत का सत्यानाश कर सकते हैं। हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की सच्चाई जानने के लिए भले ही वैज्ञानिक सबूत जुटाने पड़ें लेकिन यहां की खेती, पानी और जीव-जंतुओं पर लग रहे जलवायु परिवर्तन के घावों को पहचानने के लिए किसी विशेषज्ञ आंख की जरूरत नहीं। पिछले कुछ दशकों से हिमालय की गोद लगातार गर्म हो रही है।

हिमरेखा पीछे खिसकी है और शिखरों की सफेद टोपियों ने रंग बदला है। ऊंचाई के बसासती इलाकों में अब यदा-कदा ही बर्फ पड़ती है। रिमझिम सतझड़ (सात रोज तक लगातार वर्षा) की जगह अब मारक खण्डवृष्टि (टुकड़ों में वर्षा) या बादल फटने जैसी आपदाओं ने ले ली हैं। जाड़ों की वर्षा और बर्फबारी में आई कमी के कारण भूगर्भीय चट्टानों के कोटरों में पर्याप्त पानी जमा नहीं हो पाता। नतीजतन सदानीरा जलस्त्रोत फरवरी आते-आते दम तोड़ रहे हैं। हिमाचल, उत्तराखण्ड और नेपाल की सदियों पुरानी परंपरागत जल प्रणालियों का पिछले कुछ दशकों में तेजी से क्षरण हुआ है। यहां की अधिकतर बस्तियों में पेयजल संकट सामाजिक तनाव का कारण बन रहा है।

हिमालय की इस बदलती आबोहवा की ताकीद खेती और फसलें भी कर रही हैं। मीठे सेब और संतरे के इलाके अब इनकी खटास से हैरान हैं। इन फलों की गुणवत्ता और उत्पादन में गिरावट आई है। कई इलाकों से तो सेब पूरी तरह विदा हो चुका है। यही नहीं, गर्म घाटियों में भी मुश्किल से पैदा होने वाला आम अब अपेक्षाकृत ऊंचे इलाकों में बौराता दिखाई पड़ता है। बुग्यालों तक पहुंचने वाले घुमंतू पशुचारक बताते हैं कि घास के ये मौसमी पैबंद अब शिखरों की ओर रुख कर रहे हैं।

कभी इफरात में मिलने वाली संजीवनी जड़ी-बूटियां अब दुर्लभ हो गई हैं। निचले इलाकों में इनकी खेती के बेशक अच्छे परिणाम मिले हैं, लेकिन उनमें पहले जैसी तासीर नहीं है। हां, गर्म नदी घाटियों को बदलते मौसम का बोनस जरूर मिला है। यहां के गिने-चुने सिंचाईदार इलाकों में मैदानी सब्जियां किसानों की आजीविका का नया जरिया बन रही हैं।

वन्य जीवन में भी जलवायु परिवर्तन ने अपनी स्पष्ट छाप छोड़ी है। फरवरी-मार्च के महीनों में दहकने वाले लाल बुरांस अब दिसंबर में फूल रहे हैं। यही हाल आड़ू-खुबानी, नाशपाती जैसे फलों का भी है। सर्दियों भर छाई रहने वाली चटख धूप ने इनका परागण काल पीछे खिसका दिया है। गर्म दक्षिणी ढलानों के हठी चीड़ वन ठंडे उत्तरमुखी ढलानों के बांज के जंगलों को बेदखल कर रहे हैं। हिमरेखा के आसपास का नाजुक जैवमंडल जलवायु परिवर्तन का सबसे भरोसेमंद सबूत हैं।

इस लिहाज से हिमालयी मोर कहे जाने वाले मोनाल का दुर्लभ होना बेहद चिंताजनक है। हिमालयी भालुओं व मधुमक्खियों का हाल भी कुछ अच्छा नहीं है। हिमालयी उड़न गिलहरी के दर्शन अब दंतकथाओं में ही होते हैं। अलबत्ता पहाड़ी प्रदेशों में कभी अजनबी समझे जाने वाले मच्छरों के कुनबे अब नई-नई बीमारियों के साथ यहां बस गए हैं। इसी तरह कीट-पतंगों व तितलियों की कई प्रजातियों को भी बढ़ते तापमान की बदौलत चढ़ाई चढ़ने में कामयाबी मिली।

कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन के इन स्वत:सिद्ध आघातों ने हिमालय की इंसानी बस्तियों को सांसत में डाल दिया है। साल भर गुजारे लायक खेती यहां पहले भी नहीं होती थी। पानी व खेती के नए संकटों ने पलायन की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया है। दूर-दराज गांवों में इसका असर ज्यादा दिखाई पड़ता है। नौजवानों की समूची पीढ़ी मैदानों की ओर पलायन कर गई है। कभी लहलहाने वाले सीढ़ीदार खेत पीछे छूट गए बुजुर्गो की ओर नाउम्मीदी से ताकते बंजर पड़े हैं।

मौजूदा ग्लोबल वार्मिग को मनुष्य जनित ठहराने वाले वैज्ञानिक तर्क दुनिया भर की ताकतवर उत्सजर्क लॉबी को फूटी आंख नहीं सुहा रहे। प्राकृतिक संसाधनों की सीमितता की चर्चा और किफायत से खर्चने की नसीहत उनके लिए किसी गाली से कम नहीं। ग्लोबल वार्मिग संबंधी वैज्ञानिक उपलब्धियों के दबाव ने औद्योगिक देशों को क्योटो प्रोटोकॉल तैयार करने को मजबूर किया था। इस दबाव ने कम प्रदूषणकारी टेक्नोलॉजी और ऊर्जा के वैकल्पिक स्नोतों की भी राह खोली। ये बेशकीमती नसीहतें आगाह करती हैं कि इंसान धरती पर सिर्फ भकोसने के लिए नहीं आया है।  विज्ञान के इन विलक्षण निष्कर्षो को पचौरी के एक ‘झूठ’ से झुठलाया जा रहा है।

लेखक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली में न्यूज एडिटर हैं

 
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