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अपने आस-पास आपको ऐसे बहुत से लोग दिखेंगे जो किसी एक तरह का ही काम लगातार करते रहते हैं। यहां तक कि वह काम भी जिसकी आमतौर पर जरूरत नहीं होती। मसलन कुछ लोग हर समय हाथ धोते रहते हैं। कुछ लोग सर्दी में भी बार-बार माथे का पसीना पोछते हैं, भले ही माथा पूरी तरह से सूखा ही क्यों न हो। कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें किसी खास रंग का पेन रखने और उसी से लिखने की आदत होती है। कुछ बार-बार जेब से पैसे निकाल कर गिनते रहते हैं।
ऐसे लोग भी हैं जो बार-बार घर फोन करके सबकी खैरियत का हाल लेते रहते हैं। आमतौर पर यह खराब आदत नहीं है, लेकिन जब एक ही दिन में तीन दर्जन बार इसी काम के लिए फोन किया जाए उसे बीमारी ही माना जाएगा। इन आदतों को आबसेसिव कंपलसिल डिसआर्डर कहा जाता है। यानी ऐसी आदतें जिन पर आपका खुद का बस नहीं चलता, आप इन्हें करने को मजबूर होते हैं। अनुमान है कि दो से तीन फीसदी तक लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें इस तरह की आदतें होती हैं।
मनोवैज्ञानिक इससे निपटने को दो आसान तरीके बताते हैं। पहला यह कि जिन हालात में यह आदत परेशान करती है उनका सामना धीरे धीरे लगातार करें। अगर आपको लगता है कि आप काले के अलावा किसी और रंग के पेन का इस्तेमाल करेंगे तो गड़बड़ होगी ही। ऐसे में हर रोज आप कोशिश करके हर रोज दो तीन बार दूसरे रंग के पेन का इस्तेमाल कीजिए। यह कोशिश न सिर्फ आपकी आदत सुधारेगी बल्कि आपको इस आदत की व्यर्थता का अहसास भी कराएगी। दूसरा तरीका जो हर मामले में जरूरी है कि आप अपने विचार को ज्यादा यथार्थवादी बनाएं।

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