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शाहरुख खान के बहाने बॉलीवुड की एकजुटता का सच फिर पर्दे से बाहर आ गया। शिव सेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के किंग खान को धमकाने के मसले पर मुंबइया फिल्मी नगरी खामोश है। अब तक जो छिटपुट बयान आए हैं वे ऐसे नहीं थे जो ठाकरे परिवार का हौसला पस्त कर सके। उनसे कहीं ज्यादा दिलेरी कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने दिखाई है। ‘सहाफत’ में शेष नारायण सिंह ‘ठाकरे के मुंह पर राहुल गांधी का तमाचा’ में कहते हैं, ‘उन्होंने मुंबई के लोकल ट्रेन में सफर कर और शिव सेना, मनसा के गढ़ में समय बिताकर साबित कर दिया वे बंदरघुड़कियों से नहीं डरते।’
उर्दू मीडिया शाहरुख की खुलकर वकालत कर रहा है और बॉलीवुड की गुटबाजी से पर्दा उठाने में जुटा है। फिल्म वालों का तो विवादों से चोली दामन का नाता है। पर एक के साथ कोई विवाद शुरू हो तो बाकी चुप्पी साध लेते हैं। राखी सांवत की नई फिल्म के गाने के ‘कमीनी’ शब्द पर सेंसर बोर्ड की कैंची चलाने का मसला आया तो उन्होंने भी खामोशी अख्तियार कर ली, जिनकी फिल्म ‘कमीने तेरा खून पी जाऊंगा’ जैसे डॉयलाग के बिना पूरी नहीं होती। गुजरात में ‘परजानियां’ और ‘फनां’ नहीं चलने दी गई। फिर भी बॉलीवुड चुप रहा। फिल्म ‘कुर्बान’ मुंबई में तभी प्रदर्शित हो पाई, जब इसके निर्माता करण जौहर मनसे हेडक्वार्टर में राज ठाकरे से फिल्म के एक डॉयलाग में बम्बई कहने के लिए माफी मांग आए। उनकी खामोशी के चलते ही आज भी अंडर वर्ल्ड उन पर हावी है।
उर्दू अखबार कहते हैं हेडली मामले में जब महेश भट्ट के बेटे, भांजे इमरान हाशमी और कंगना रानावत पर संदेह की उंगली उठी तब भी कोई यह कहने आगे नहीं आया कि वे ऐसे कैरेक्टर के लोग नहीं हैं। शाहरुख के मसले पर मुंबई से प्रकाशित एक अखबार ‘बालीवुड की बुजदिली’ में कहता है कि शुरुआत में ही अन्याय के खिलाफ मुखर हो जाते तो ऐसी नौबत नहीं आती। साजिद रशीद अपने लेख, ‘लगे रहो शाहरुख खान’ में कहते हैं, उनसे पहले ऐसा हौसला बुजुर्ग कलाकार ए.के. हंगल ने दिखाया था। एक दशक पहले पाकिस्तान डे पर हाईकमीशन की दावत में शरीक होने पर शिव सेना ने माफी मांगने और उनकी नई-पुरानी फिल्मों का बहिष्कार करने का फरमान जारी कर दिया था। पर वे नहीं झुके। उनका कहना था वे पाकिस्तान में जन्मे हैं। इसलिए उस मुल्क से उनके लगाव को कम नहीं किया जा सकता।
साजिद रशीद ने शाहरुख के मसले पर अमिताभ बच्चन की भी आलोचना की है। एक अन्य अखबार कहता है अमित जी शाहरुख की हिमायत करने के साथ अपने ब्लॉग में बाल ठाकरे के लिए अपनी फिल्म ‘रण’ का स्पेशल शो करने की भी बात करते हैं। इसकी जगह उन्हें ठाकरे परिवार के साथ आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमले के विरोध में वहां की यूनिवर्सिटी से मानद सनद लेने से इनकार करना चाहिए था। रोजनामा ‘राष्ट्रीय सहारा’ में फरहा खान कहती हैं, ‘किसी को ऐसी चीजों से डरने की जरूरत नहीं।’ उनकी तरह शबाना आजमी, प्रीति जिंटा, पूजा बेदी, महेश भट्ट, अनुपम खेर, आमिर खान ने भी शाहरुख की हिमायत की है। लेकिन उनमें से किसी ने भी ठाकरे परिवार का मुखर विरोध करने का हौसला नहीं दिखाया।
फिल्म बनाने में जितने भी हुनरमंद लगते हैं। सब की अपनी यूनियन है। लेकिन वे भी बालीवुड पर होने वाले हमले पर चुप्पी साधे हैं। अखबारों का मानना है मनसे और शिव सेना से मुकाबला करने का यह बेहतर मौका है। आरएसएस, बीजेपी, गृहमंत्री पी.चिदंबरम और राज्यमंत्री शशिथरूर भी शाहरुख और मुंबई नगरी सबकी है के समर्थन में आ गए हैं। ‘ऐतमाद’ कहता है, सुपर स्टार शाहरुख खान दुनिया में बालीवुड के राजदूत की हैसियत रखते हैं। उनके साथ ऐसा व्यवहार गलत है।
‘सियासत’ कहता है शाहरुख के मसले पर शिव सेना गाली गलौज पर उतर आई है। पटना के ‘कौमी तन्जीम’ ने कांग्रेस के उस बयान को तरजीह दी है जिसमें शाहरुख का बचाव किया गया है। अखबार कहते हैं कि मनसा और शिव सेना में दम है तो वे आरएसएस, बीजेपी, कांग्रेस, राहुल गांधी, प्रियंका वढेरा, मुकेश अंबानी, पी. चिदंबरम जैसों की मुखालफत कर दिखाए। मुंबई दौरे पर राहुल गांधी को काला झंडा दिखाने वाले कहां सटक गए पता ही नहीं चला। अखबारों में शाहरुख के उस बयान को भी प्रमुखता मिली है जिसमें उन्होंने आईपीएल और पाकिस्तानी खिलाड़ियों की हिमायत करने की बात कही है। उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसके लिए माफी मांगी जाए। वे स्वतंत्रता सेनानी के बेटे और भतीजे हैं। अन्याय के सामने कतई नहीं झुकेंगे।
लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं

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