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कुर्सी तरह-तरह की होती है, गद्दा-गद्दी लगी हुई, गोल-गोल घूमने वाली, लकड़ी की, स्टील की। सब विविधताओं के बीच एक समानता है। दो टांग के आदमी के लिये चार टाँग की कुर्सी होना ही होना। यह इसलिये भी ज़रूरी है कि कुर्सी मिली नहीं कि अकसर आदमी का बैलेंस गड़बड़ाता है। अब वह खुद को संभाले कि कुर्सी को। बाबू, अफसर से लेकर, मेयर मिनिस्टर तक किसी की भी कुर्सी पाना आसान नहीं है।
इसके साधक सेवा-मंत्र जपते हैं। कोई देश की सेवा विकास लाकर करना चाहता है, तो कोई जनता की। एक बार कामयाब हुये तो पता चलता है कि उनके कथन का अर्थ कोई समझ नहीं पाया। वह स्वयं की सेवा करते हैं और ठीकरा देश के सिर फोड़ते हैं।
नेताओं और अफसरों की बड़ी कोठियां, बंगले और अट्टालिकायें इस तथ्य की साक्षी हैं कि उन्होंने किन की सेवा की। योजना आयोग या मंत्रियों के बयान-घोषणायें कोई सुने तो उसे शक हो कि हिन्दुस्तान में स्वर्ग बस उतरने ही वाला है। यह दीगर है कि इसकी आशा करते न जाने कितने स्वर्गवासी हो गये।
कुर्सी कम्पटीशन से ही दुनिया चलती है। पहले लोग इस पर कब्जा करने को लालायित रहते हैं, फिर जमे रहने को। कुछ मंत्री-अफसर तो यहां तक कहते हैं कि बस उन्हें मुल्क की खिदमत के लिये इसकी दरकार है, कार, वेतन और सुविधाओं के लिये नहीं। अगर कोई सर्वे करे तो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस देश के शत-प्रतिशत जन सेवक निष्काम जन सेवा को समर्पित हैं, बशर्ते उन्हें कुर्सी इनायत हो। कल अगर बिना क्षेत्रीय भावना उकसाये, कुर्सी की संभावना हो तो छोटे-बड़े ठाकरे भी अचानक राष्ट्रीय बनने को प्रस्तुत होंगे। मराठी मानुष की हुंकार हर रोजगार पर स्थानीय का अधिकार आदि सिर्फ कुर्सी की छटपटाहट हैं।

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