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बस अपनी कहना और दूसरों की न सुनना आज की एक बड़ी समस्या है। घर-दफ्तर सभी जगह आपका सामना ‘आत्मकेंद्रित मॉडल’ से होगा। हर जगह ‘मैं’-‘मैं’ का बोलबाला है। हम औपचारिक-अनौपचारिक बातचीत में ‘मैं’ शब्द का इस्तेमाल सबसे अधिक करते हैं। न्यूयार्क टेलीफोन कंपनी ने यह जानने के लिये एक सर्वें किया कि टेलीफोन पर जो वार्ताएं होती हैं, उसमें सबसे अधिक किस शब्द का प्रयोग होता है। वह शब्द ‘मैं’ ही था। यह कुल 500 चर्चाओं में 3900 बार बोला गया।
‘मैं’ के अत्यधिक इस्तेमाल से जाहिर होता है कि हम अपने बारे में ही ज्यादा सोचते हैं और दूसरों में दिलचस्पी नहीं रखते। अमिताभ बच्चन के अनुसार वह व्यक्ति निरा बुद्धू है जो अपनी ही बात हमेशा आगे रखना चाहता है। इसी तरह क्रिकेटर सौरव गांगुली खेल के उदाहरण से समझाते हैं कि आप तब तक अपने खेल में निखार नहीं ला सकते जब तक दूसरे के खेल में दिलचस्पी न लें। यही हाल जिंदगी का भी है। दूसरों की सुनना और उनमें दिलचस्पी लेना आपका अनुभव बढ़ाता है और आपको ज्यादा मानवीय बनाता है।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड एडलर का कहना है कि जो दूसरे में दिलचस्पी नहीं लेता उसके जीवन में सबसे ज्यादा कठिनाइयां आती हैं और ऐसा करने वाले ही ज्यादा असफल होते हैं। अमेरिकी राट्रपति थियोडर रूजवेल्ट दूसरों को काफी अहमियत देते थे। उन्हें अपने सारे नौकरों और कर्मचारियों का ही नहीं, बल्कि उनके परिवारजनों का भी नाम याद था। यही कारण था कि वे सबके चहेते थे और उन्हें अमेरिकी समाज काफी मानवीय मानता था। क्या उनके मूलमंत्र को हम नहीं अपना सकते?

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