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गणतंत्र में ही छिपे हैं लोकतंत्र के बीज
विभूति नारायण राय
First Published:25-01-10 11:36 PM
Last Updated:25-01-10 11:37 PM
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हिन्दी कविता में यदि भारतीय गणतंत्र का स्मरण करें तो दो प्रभावशाली बिम्ब उभरते हैं - एक में रघुबीर सहाय प्रश्न पूछते नजर आते हैं कि आखिर वह कौन भारत भाग्य विधाता है जिसके गुण फटा सुथन्ना पहने हरचरना गाता है और दूसरे में धूमिल अपना सर धुन रहे हैं कि क्या तीन थके रंगों का नाम ही आजादी है? 

हम सभी जानते हैं कि कविता में गद्य के मुकाबले भावुकता अधिक होती है पर यह भी सही है कि इस भावुकता का निर्माण भी ठोस जमीनी हकीकत पर ही होता है। अगर हमारी भाषा के दो बड़े कवियों के मन में भारतीय गणतंत्र को लेकर संशय है तो कहीं-न-कहीं इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण होंगे। क्या है जो साठ वर्ष बाद भी गणतंत्र दिवस के मौके पर हमें चैन से सोने नहीं देता? ऐसा क्या है जो गणतंत्र बनने की प्रक्रिया में टूट गया? क्या कुछ होना था जो नहीं हुआ या क्या कुछ ऐसा हुआ जिसे एक सभ्य गणतांत्रिक समाज में नहीं होना चाहिये था?

इससे भी बड़ा प्रश्न मेरे मन में बार-बार घुमड़ता है कि क्या भारतीय समाज गणतंत्र का पात्र 1950 में था या आज 2010 में है? पाठकों में से कुछ को मेरा यह मानना पसंद नहीं आयेगा कि भारतीय समाज अपनी अन्त:निर्मिति में लोकतंत्र विरोधी है। यदि मुझे किसी एक कारण की तलाश करनी हो तो मैं इसके लिये अपने समाज की सबसे घृणित संस्था वर्ण व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराऊंगा। इस अकेली संस्था ने भारतीय समाज को कभी लोकतांत्रिक नहीं होने दिया। मनुष्य के इतिहास में असमानता और क्रूरता को वैधता प्रदान करने वाला इससे प्रभावशाली दर्शन दूसरा नहीं होगा।

हम लाख गाल बजायें और खुद को जगद्गुरू कहते फिरें पर इस संस्था ने हमें सही अर्थो में मनुष्य भी नहीं बनने दिया। एक ऐसे समाज में जहाँ अपनी तीन चौथायी आबादी को पशु से भी नीचा दर्जा देने की परम्परा धर्म और संस्कृति का अविभाज्य अंग हो, जो दुनिया का सबसे शिक्षा विरोधी समाज इस अर्थ में हो कि यह अपनी बहुसंख्या को शिक्षा से वंचित करता हो और जहाँ इन सबको वैध ठहराने वाले धर्म शास्त्रों को प्रतिष्ठा हासिल हो, वहाँ यदि लोकतंत्र का बिरवा रोपा जायेगा तो क्या वे सारे प्रश्न नहीं खड़े होंगे जो रघुबीर सहाय और धूमिल की कविताओं में आकर बार-बार हमें परेशान करते हैं? पर यहाँ मेरा यह भी मानना है कि इन प्रश्नों के उत्तर भी गणतंत्र में ही छिपे हैं। एक सच्चा गणतंत्र ही स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्य हमारी नसों में प्रवाहित कर सकता है जिनसे धर्मग्रंथों ने हमें अब तक वंचित रखा था।

अरस्तू और प्लेटो से लेकर गांधी और नेल्सन मंडेला तक सबकी चिंता के केंद्र में वह व्यक्ति है जो वंचित है। अरस्तू ने अगर कहा कि सम्पत्तिवान की जगह निर्धन शासक हो, प्लेटो ने अपने रिपब्लिक में धन से प्रेम करने वालों या सम्मान को तरजीह देने वालों के मुकाबले विद्वानों को शासक बनाने की बात की, गांधी पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति की चिंता करते हैं या नेल्सन मंडेला राष्ट्राध्यक्ष के रूप में अपने पहले सम्बोधन में सबके लिये शांति, काम, रोटी और पानी की बात करते हैं तो इन सबके मन में ऐसे मूल्यों की कल्पना है जो किसी भी गणतंत्र का आदर्श हो सकते हैं और दुर्भाग्य से हमारा गणतंत्र जिनसे वंचित है।

किसी समाज के सभ्य होने या न होने का पैमाना सिर्फ यही हो सकता है कि वह अपने कमजोर लोगों को कितना स्पेस देता है। हमारे बीच कमजोर कौन है? कमजोर हैं आर्थिक रूप से गरीब, दलित, पिछड़े, आदिवासी या औरतें। इन तबकों में से कुछ आर्थिक रूप से सम्पन्न हो जाने के बाद भी सामाजिक उपेक्षा का दंश ङोलने के लिये मजबूर हैं। किसी राज्य के लिये इससे बड़ी असफलता क्या हो सकती है कि एक विशाल जनसंख्या का राज्य में कोई स्टेक न हो। ऐसा राज्य कैसे अपने गणराज्य होने पर इतरा सकता है जहाँ 1984 जैसे दंगे हों, जिनमें तीन दिन में कई हजार सिक्ख नृशंसतम तरीकों से मारे जायें और ढाई दशक सिर्फ़ इस बात के लिये आंदोलन करते बीत जायें कि दोषियों को दण्डित किया जाय?

उस गणराज्य का क्या मतलब जिसके संविधान की भूमिका में उल्लिखित धर्मनिरपेक्षता की चिंदिया बाबरी मस्जिद के रूप में उड़ा दी जाय? कुछ वर्षो पहले आस्ट्रेलिया ने एक राष्ट्र के रूप अपने मूल निवासियों से इस बात के लिये क्षमायाचना की थी कि उनके पुरखों के साथ ज्यादतियाँ हुई थीं। क्या भारतीय गणराज्य कभी इतना प्रौढ़ होगा कि अपने दलितों से अमानवीय व्यवहार के लिये क्षमा माँगे? यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते जैसे बड़बोलेपन के बावजूद हमने स्त्रियों के लिये कैसे नर्क निर्मित किये थे इसका अहसास हमें कभी होगा क्या? 

आज जब हम आदिवासियों की जमीनें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये ले रहे हैं तो क्या इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय गणराज्य उन्हें यह आश्वस्त करने में सफल हो पा रहा है कि उन्हें उजाड़ने के बाद जो दुनिया बनेगी उसमें एक मनुष्य के रूप में उनका भी अधिकार होगा? मुझे लगता है कि ऊपर पूछे गए सारे प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक होगा। मैं फिर रेखांकित करना चाहूँगा कि वर्ण व्यवस्था के कारण हमारी संवेदनायें शिथिल हुईं, हमारी भाषा क्रूर हुयी।

भारतीय गणतंत्र को सही अर्थो में लोकतंत्र बनाने के बीज भी उसी में छिपे हैं। हमारा संविधान उसकी सबसे बड़ी ताकत है। धार्मिक पुस्तकों के विपरीत यह एक सामूहिक लोकतांत्रिक चेतना की उपज है जिसमें तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ दिमाग लगे थे और जो हमें सभ्य बनाने की दिशा में ले जाने का पूरा प्रयास कर रहा है। वर्ण व्यवस्था जैसी संस्थायें समाज को लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में संविधान को आगे बढ़ने से रोक रही हैं, पर वे कब तक इसमें सफल हो पायेंगी? इतिहास की गति निर्मम होती है और प्रतिगामी शक्तियाँ अन्ततोगत्वा उसकी चक्की में पिस जाती हैं।

हमारे समाज में भी यही हो रहा है। पिछले कुछ दशकों में दलितों, महिलाओं, आदिवासियों या अल्पसंख्यकों के पक्ष में जो कानून बने हैं वे इसी संघर्ष का परिणाम हैं। यह जरूर है कि परिवर्तन की रफ्तार धीमी है और भारतीय गणराज्य अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से को यह नहीं समझा पा रहा है कि भारत राष्ट्र में उसकी भी भागीदारी है, पर परिवर्तन हमेशा धीमी गति से होता है। गणतंत्र की इस सालगिरह पर क्या हम कामना कर सकते हैं कि परिवर्तन की गति थोड़ी तेज हो?

लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं

 
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