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ब्लॉग वार्ता : ऑनलाइन होती जाति की चेतना

हिन्दुस्तान में पिछली एक सदी में स्थानीयता ग्लोबल हुई है। पिछले बीस साल में आबादियों का उजड़ना-बसना काफी तेज गति से हुआ। इससे पहचान के नए संस्करण सामने आए। दिल्ली में ही कई तरह की स्थानीयता है। पूर्वी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली से अलग है और दक्षिण दिल्ली, उत्तरी दिल्ली से। मॉल, मेट्रो, मार्केट और अपार्टमेंट से बन रही नई पहचानों के बीच जातीय पहचान खुद को ढूंढ रही है। इसी तलाश में संगीता पुरी ने खत्री समाज पर एक ब्लॉग बनाया है। हमारा खत्री समाज। क्लिक कीजिए http://khatrisamaj.blogspot.com 
    
1901 में अंग्रेजी हुकूमत ने जो पहली बार जनगणना कराई थी, तबकी टीस अभी तक जातीय चेतनाओं में बनी हुई हैं। संगीता लिखती हैं कि खत्रियों के व्यापार से संबंधित होने के कारण जनमत गणना अधिकारियों ने चाल चलते हुए इसे सम्मानित स्तर से एक श्रेणी नीचे रख दिया। मात्र ख और क्ष में परिवर्तन बोलचाल भाषा की ही देन है, लेकिन खत्रियों के व्यापार से संबंधित होने के कारण उनकी हैसियत नीचे कर दी गई। यही वो मोड़ है, जिसके बाद से जातियों ने संगठन बनाए और अपना इतिहास लिखना शुरू किया, जो आज भी जारी है।

इस ब्लॉग पर खत्री बैजनाथ पुरी का लेख है। वो भी अपनी जातीय चेतना की कसक को लेकर परेशान हैं। लिखते हैं कि हिन्दू समाज में खत्रियों की क्या स्थिति है, इस विवादग्रस्त प्रश्न पर पिछली सदी में पर्याप्त लिखा जा चुका है। इस प्राचीन सैनिक जाति को तीसरी श्रेणी में रखकर रिजले ने काफी क्षति पहुंचाई है। बाद में रिजले ने सुधार तो कर दिया, लेकिन ऐसा लगता है कि रिजले साहब की भूल का दूषित कुप्रभाव समाप्त नहीं हुआ है।

दरअसल हर जाति दूसरी जाति से अपने आप होड़ करती रहती है। कभी-कभी लगता है कि जातियां एक दूसरे के बराबर होना चाहती हैं, लेकिन खुद को श्रेष्ठ साबित करने की बेचैनी इस भ्रम को तोड़ देती है। खत्री समाज के लोगों की व्यापक उपलब्धियों के बाद भी इस तरह की कसक परेशान करती होगी, हैरानी होती है।

इस ब्लाग पर खत्री समाज के भीतर के बदलावों का भी ब्यौरा दिया जा रहा है। संगीता लिख रही हैं कि पूर्विए खत्रियों ने कुछ प्रगतिशील कदम पहले ही उठा लिये थे। जैसे उन्होंने समस्त अल्ल के खत्रियों के साथ आपस में विवाह संबंध करना शुरू कर दिया, जबकि पच्छए चौजातिए (मेहरोत्रे, खन्ने, कपूर और सेठ) अपने घेरे से बाहर आकर विवाह संबंध कायम करने में अभी पिछले बीस-पच्चीस साल तक सकुचाते रहे। यह प्रसन्नता की बात है कि अब समस्त खत्री जाति में संकीर्णता के बंधन टूट गए हैं। 

व्यवसाय और समृद्घि के कारण खत्री कई शहरों में गए और बस गए। उनके अपने संस्कारों में स्थानीय संस्कार घुलते-मिलते रहे। संगीता पुरी लिखती हैं कि खत्री सारश्वत ब्राह्नाण से ही पौरोहित्य का काम कराते थे। लेकिन जब दूसरी जगहों पर गए तो स्थानीय ब्राह्नाण से भी संस्कार कराने लगे। उनकी बोली भी बदली। खड़ी बोली के साथ अवधी और ब्रज के भी शब्दों का प्रयोग होने लगा।

संगीता पुरी बता रही हैं कि खत्रियों के रक्त का प्रभाव ही था कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे जाति के मूल रूप में बनाए रखने में सफल रहे हैं। विवाह संस्कार के शुभ अवसर पर घोड़ी, तलवार, वेदी और हाथी दांत का चूड़ा आदि खत्री विवाह संस्कार की आवश्यक विशेषताओं को इन्होंने कभी नहीं छोड़ा। हिंदी ब्लॉग जगत में जातीय चेतना को लेकर कई ब्लॉग हैं। हर शहर में जातीय सम्मेलन लगातार हो रहे हैं। अखबारों में इनकी एक तस्वीर तो छपती ही है। हाल ही में गाजियाबाद में त्यागी ब्राह्नाण समाज का परिचय सम्मेलन हुआ। मीडिया में खबर आई कि नौकरी-पेशा होने के बाद भी त्यागी ब्राह्नाण लड़के-लड़कियों ने एक दूसरे को कम ही पसंद किया। शायद अब पसंद के आधार बदल रहे हैं। जातीय संगठन इस चुनौती से जूझ रहे हैं। जो टूट रहा है और जिसे टूटना चाहिए, उसे बचाने में लगे हैं।

अगर 1901 को आधार माने तो सौ साल से ज्यादा वक्त हो रहा है जातीय चेतना और संगठनों का। अब जातियों की ऑनलाइन शादी विवाह वेबसाइट बन गई है। कायस्थों ने अपने लिए अलग वेबसाइट बना ली है। दूसरी जातियों की भी होगी। समाज का पुराना नेटवर्क टूट गया है। नया बन नहीं पा रहा है। फूफा जी और मामा जी को एक दूसरे से मिले हुए कई साल हो जाते हैं। शहर और नौकरी के दौरान जो दोस्त बनते हैं वो बदलते रहते हैं। रिश्तों का यह अस्थाई दौर है। ऑनलाइन हो जाइये। अपनी जाति को फिर से परिभाषित कीजिए।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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