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ब्लॉग वार्ता : कानपुर से कुवैत तक का पन्ना
रवीश कुमार
First Published:08-09-09 09:58 PM
Last Updated:08-09-09 10:05 PM
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ब्लॉगिंग एक नई विधा है। हिंदी के कोई दस पंद्रह हजार ब्लॉगरों में कम ही ब्लॉगर होंगे, जिनकी उम्र पांच साल की होगी। इंटरनेट के चालीस साल होने के इस हफ्ते में हिंदी के एक ब्लॉग का पांच साल का हो जाना कम बड़ी बात नहीं है। वैसे दुनिया का पहला ब्लॉग महज दस साल पहले ही लिखा गया था।  पांच साल पूरे करने वाले ब्लॉग का नाम है- मेरा पन्ना।

क्लिक कीजिए-http:// www. jitu.info/ merapanna कानपुर के जीतू भाई कुवैत जाकर भी कानपुर को ही जीते रहते हैं। अपने पुराने मोहल्ले की शरारतों को याद कर पुरानी गलियों में लौटते रहते हैं। लिखते हैं कि हमारी टोली जब भगवानदास की दुकान के सामने हो हल्ला मचाती तो डर कर आइसक्रीम के गोले खाने को दे देते थे। शिवकुमार इस डर से हमें जलेबी खिला देते थे कि कहीं उनके बच्चे को दूसरे मोहल्ले में न ले जाऊं। गोपाल टॉकीज के दरवाजे के बाहर कान लगाकर मुफ्त में फिल्में देखने का अपना ही मजा होता था।

बचपन में बहुत कुछ होता है। इसलिए उसकी यादों से ब्लॉग तो क्या न जाने कितनी किताबें छप जायें। मगर इन किस्सों में बहुत कुछ दिखता है। 20-30 साल पहले के सामाजिक संबंध, शहर का ढांचा आदि आदि। जीतू भाई चमनगंज से पतंग खरीदते थे और बकरमन्डी से मांझा। पैसे को लेकर रास्ते में दोस्तों के बीच मारपीट हो जाती थी। लेकिन जब छतों पर टीवी एंटेना का हमला हुआ, पतंगों की जान पर आफत बन आई। अब पतंगबाजी शहर के एक खास हिस्से में बचा खुचा एक शौक है। इसे लेकर रोमांस भी कब का खत्म हो चुका है।

पीली कमीज और घनी मूंछें जीतू भाई की तस्वीर की ट्रेड मार्क है। तीन साल से तो वो मुझे ऐसे ही दिख रहे हैं। लेकिन इन्होंने अपने लिए कभी ब्लॉगिंग नहीं की। गूगल एडसेंस से पैसे मिले तो बाकी ब्लागरों को भी बताया कि ब्लगिंग से पैसा कैसे कमाया जा सकता है। ब्लगिंग से जुड़ी तकनीकी जानकारी देने वाले कई लेख मेरा पन्ना पर मिलेंगे।

मेरा पन्ना के मोहल्ला पुराण में छपे लेखों के जरिये कानपुर की एक दिलचस्प तस्वीर बनती रहती है। जीतू बताते हैं कि कैसे कॉमिक्स पढ़ने के लिए पी रोड पर राजाराम बुकस्टॉल और राधा मोहन मार्केट में मनोरंजन संग्रहालय के ग्राहक बने। फिर कहानी आगे बढ़ती हुई बताती है कि कॉमिक्स बुक्स किराये पर देने के लिए दुकानदारों ने ग्राहकों का चेन बनाने में पाठकों का ही इस्तेमाल किया। नया ग्राहक लाने वाले को दस पैसे में वहीं बैठ कर पढ़ने की इजाजत मिलती थी। नए ग्राहकों से बीस पैसे प्रति कॉमिक्स की पढ़ाई लेता था। 

वो फुर्सत में छतियाना एक दिलचस्प लेख है। अपार्टमेंट के इस दौर में छतों का उपयोग पेंट हाउस या फिर पानी की टंकी के आरामगाह के रूप में ही रहा है। अब छतों पर मानव आबादी अपने अनुभवों का निर्माण विकास नहीं करती है। महानगरों के अखबार बताते हैं कि फलां ने छत से कूद कर आत्महत्या कर ली। कभी छत जिंदगी के असली केंद्र हुआ करते थे। तभी तो जीतू भाई ने छत पर की गई शरारतों को छतियाना लिखा है।

तो छतियाने के क्रम में भाई साहब एक लड़की को चिट्ठी दे बैठे। पड़ोस की लड़की से नजरे मिलाने का छत से बड़ा कोई खुला मैदान उत्तर भारत की संस्कृति में नहीं हुआ। बाकी भारत और दुनिया की कम जानकारी है। तो जीतू भाई के अनुसार वो लड़की अगले दिन सुबह पांच बजे छत पर आ गई।
बस फिर क्या था, दिन हो या रात, हम छत पर टंगे रहते, पढ़ाई गई तेल लेने। धीरे धीरे प्रेम पत्र में पारंगत होते गए। जीतू भाई के इस लेख में कोई महेंद्र बाबू भी हैं, जो उन्हें प्रेम पत्र लेखन शैली में गाइड कर रहे थे। आगे चल कर जीतू भाई स्वतंत्र हो जाते हैं। शेरो शायरी की किताबें खरीदते हैं। लगता था कि सारी शायरी उन्हीं के लिये लिखी गई है। सारे दीवानों को एक जैसी फीलिंग कैसे हो जाती है?

तो इस तरह पांच साल पुराने इस शहर में पुराना कानपुर फिर से बनने लगता है। ठीक है कि संस्मरणों में आई कई दुकानें मिट गईं होंगी, सड़कों पर अब फ्लाईओवर बन गए होंगे, मोहल्ले टूटकर अपार्टमेंट वाली हाउसिंग सोसायटी में बदल गए होंगे। लेकिन जो तस्वीर दिलो-दिमाग में बची है, उसका क्या। दुनिया के कई देशों में घूम चुके जीतू भाई अपने ब्लॉग में आर्थिक मामलों पर जमकर लिखते हैं। पूरे अधिकार के साथ। ठीक-ठाक निवेश गुरु मालूम पड़ते हैं। पांच साल तक ब्लॉगिंग करते रहने के लिए बधाई।

ravish@ ndtv. com

लेखक का ब्लॉग है naisadak. blogspot. com

 
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