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रोज पीड़ा से गुजरता है मणिपुर
कल्पना शर्मा
First Published:03-09-09 09:26 PM
Last Updated:03-09-09 09:39 PM
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शेष भारत ने जब 62वां स्वतंत्रता दिवस मनाया, तब सुदूर उत्तर-पूर्व के एक कोने में जश्न मनाने जैसा कुछ नहीं था। मणिपुर की राजधानी इम्फाल में 23 जुलाई को, एक आम दिन(अगर सच में वहां कोई आम दिन है) रबीना देवी नामक एक गर्भवती महिला तब गोली का शिकार बन गई, जब पुलिस एक युवक का पीछा कर रही थी। इस घटना में रबीना देवी की मौत हो गई। इसी समय एक संदिग्ध आतंकी को दवा की दुकान में धकेल कर गोली मार दी गई। पुलिस ने दावा किया कि आतंकी ने उन पर हमला किया था, लेकिन इस फर्जी मुठभेड़ को एक फोटोग्राफर ने (जो अपनी पहचान छुपाए रखना चाहता है) कैमरे में कैद कर लिया और तहलका पत्रिका को दे दिया। प्रकाशित 12 चित्रों में पुलिस को निहत्थे चोंगखम संजीत को घसीट कर दवा की दुकान में ले जाते हुए और फिर उसका शव बाहर लाकर ट्रक में लादते हुए दिखाया गया है। यह घटना भीड़-भाड़ वाले बाजार में दिन-दहाड़े (सुबह 10.30 बजे) हुई।
तहलका में ये चित्र देखने के बाद इम्फाल की गलियों में जनता का गुस्सा फूट पड़ा। महिलाएं, पुरुष और युवा सड़कों पर उतर आए और वे न्याय की मांग कर रहे हैं। वे आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट  (एएफएसपीए) को हटाए जाने की मांग भी कर रहे हैं। यह मांग कोई नई नहीं है। इस क्षेत्र में सशस्त्र बलों को प्राप्त विशेषाधिकार के खिलाफ जब-तब यह मांग उठती रहती है, लेकिन एएफएसपीए को हटाया नहीं जाता है। लोगों का गुस्सा भड़काने के लिए केवल एक घटना ही काफी है। ऐसे जन आंदोलनों के प्रति राज्य का रवैया भी नया नहीं है। आंदोलन से निपटने के लिए शाम से सुबह तक का कर्फ्यु लगाना, आंदोलनकारियों पर आंसू गैस छोड़ना और सशस्त्र बलों की ताकत का प्रदर्शन करना सरकार का पुराना हथियार है। जवाब में बंद का आह्वान होता है, कर्फ्यु का उल्लंघन किया जाता है और लोग अपनी गिरफ्तारी देते हैं। इस तरह वहां हिंसा का चक्र निरंतर चलता रहता है।
इस बार जन आक्रोश की समस्या इम्फाल घाटी के निवासियों, जिनमें ज्यादातर मैती हैं, तक ही सीमित नहीं है। 12 अगस्त को दो संदिग्ध आतंकियों को मारे जाने के खिलाफ जिन घाटियों में तंगकुल नागा रहते हैं, वहां भी बंद और विरोध हो रहा है। हाल ही में नई दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने भाषण में कहा कि भारत में होने वाली हिंसक घटनाओं में एक तिहाई उत्तर-पूर्व में होती हैं।
मणिपुर के बारे में बाहरी लोगों को जो चीज चौंकाती है, वह है वहां की महिलाओं की  संगठित होकर निडरता से चुनौतियों का मुकाबला करने की ताकत। यू ट्यूब पर एक वीडियो में दिखाया गया कि किस तरह वहां की सैकड़ों महिलाएं विरोधस्वरुप अपना अधो वस्त्र फेंक, राइफल तथा आंसू गैस से लैस पुलिस कर्मचारियों का सामना कर रही हैं। इम्फाल के बाजार में महिलाएं एकजुट होकर गिरफ्तारी दे रही हैं। इसकी तुलना वे ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ी गई लड़ाई से करती हैं और इसे दूसरे नूपिला (महिलाओं का युद्ध) की संज्ञा देती हैं।
आंदोलन का नेतृत्व कर रही चओबा देवी ने प्रेस से कहा- पानी सिर से गुजर चुका है। हम अब और जुल्म बर्दाश्त नहीं कर सकते, इसीलिए हमने संगठित होकर लड़ते हुए मारे जाने या पुलिस को गिरफ्तारी देने का फैसला किया है।  महिलाओं ने बताया कि कर्फ्यु के कारण किस तरह छात्रों की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है और दिहाड़ी करने वाले हजारों लोगों का जीवन बर्बाद हो गया है। इस वर्ष के शुरू में मणिपुर यात्रा के समय हमने देखा कि कर्फ्यु के दौरान किस तरह लोग संघर्ष कर रहे हैं। महिलाओं पर बच्चों को खाना व पानी मुहैया कराने तथा परिवार में यदि कोई बीमार हो तो उसे अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी होती है। इसलिए उन्हें कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।
मणिपुर में स्थिति बहुत जटिल है। वहां की जनसंख्या केवल 25 लाख है, लेकिन जातियों और जनजातियों में बंटे करीब 40 भूमिगत गुट हैं, जो आपस में संघर्षरत हैं। इसके अतिरिक्त वहां हजारों सैनिक और अर्धसैनिक बल हैं, जिन्हें एएफएसपीए के अंतर्गत असाधारण अधिकार प्राप्त हैं।
मणिपुर में मीडिया को खबरों के लिए प्राय: राज्य से बाहर के मीडिया पर निर्भर रहना पड़ता है। यहां के पत्रकार राज्य और भूमिगत गुटों के बीच पिस रहे हैं। यहां तक कि रोजमर्रा की खबरें देना भी बारुदी सुरंग पर चलने जैसा है। हाल में एक महिला पत्रकार ने कहा कि राज्य और भूमिगत गुटों के दो पाटों के बीच मीडिया पिस रहा है। उदाहरण के लिए अगर किसी  फोटोग्राफर ने किसी नागरिक की गैरकानूनी हत्या की फोटो लीं तो ये फोटो मणिपुर में नहीं छप सकतीं। 
हम लोगों के लिए ,जिन्हें उत्तर-पूर्व की जनता अक्सर मुख्य भूमि के लोग कहती है, यह जानना जरूरी है कि मणिपुर जैसे राज्यों में क्या हो रहा है। वहां की राजनीतिक जटिलताओं को हर कोई नहीं समझ सकता। निश्चित रूप से मणिपुर ऐसा राज्य नहीं है, जो केवल अंतहीन टकराव का अखाड़ा हो। यहां थियेटर, संगीत, खेल, कला, पारंपरिक हस्तकला आदि की पुरानी परम्परा है। पुरस्कार प्राप्त महिला बॉक्सर मैरी कॉम इसी राज्य से है। स्थिति सामान्य बनाने के लिए सबसे जरूरी चीज है, जनता को सही जानकारी मिलना। दुर्भाग्य से वहां उचित सूचनाओं का अभाव है।
स्वाइन फ्लू के डर के कारण पुणे और मुंबई में बंद की खबरें मीडिया में खूब आ रही हैं और उन पर चर्चा भी हो रही है, लेकिन मणिपुर के अधिकांश हिस्सों में जबरन बंद के बारे में हम बहुत कम जानते हैं। यहां तक कि अमेरिका के नेवार्क हवाई अड्डे पर फिल्म स्टार शाहरुख खान की तलाशी को भी मीडिया ने खूब तरजीह दी। बहुत कम लोग जानते हैं कि मणिपुर में लोगों को रोज सशस्त्र बलों द्वारा तलाशी की घटनाओं का सामना करना पड़ता है। किसी दूसरे देश में लाइन से बाहर आने को कहना और पूछताछ करना अपमानजनक हो सकता है, किन्तु जब अपने ही देश में रोजाना के काम पर जाते हुए शक से घिरे सवाल किए जाएं और जामा तलाशी ली जाए तो कैसा लगेगा? मणिपुर के हजारों लोग हर रोज इसी कटु अनुभव से गुजरते हैं, लेकिन उनके विरोध को न कोई सुनता है और न ही ध्यान देता है। 
 kalpu.sharma@gmail.com  
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

 
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