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सच्चे सुधार का सही रास्ता कहीं और खोजना होगा
मृणाल पाण्डे
First Published:27-06-09 08:38 PM
Last Updated:27-06-09 08:39 PM
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पिछड़ेपन, गरीबी और अशिक्षा का अक्सर अपराधीकरण से चोली दामन का साथ माना जाता है। पर सम्पन्न होते किसी समाज में ऊंची तालीम और सामान्य से बेहतर जीवन जीने की सुविधाओं के बावजूद अगर कन्या शिशुओं की भ्रूण हत्या, बलात्कार और दहेज प्रताड़ना के मामलों में लगातार बढ़ोतरी होती दिखाई दे, तो हम क्या समझें? मानना पड़ेगा कि उस समाज की रचना, उसकी अमीरी और शिक्षा की अवधारणा में कोई असाधारण दोष है।

इसी कारण स्त्री का अस्तित्व वहा ऐसा बिन्दु बन गया है, जिससे टकराकर राज-समाज दोनों की दृष्टि अन्यायपरक और विभक्त हो जती है। इस समूची अवधारणा को महाजनी सभ्यता का ही निन्दनीय भाग बताने वाले माक्र्सवादियों की राय में लिंगभेद भी उनके पूजीवाद के विरोध की बड़ी वजह है। पर खुद साम्यवाद में माक्र्स और (उससे कुछ ही कम पैमाने पर एंगिल्स) ने भी स्त्री का आस्तित्व प्राय: पारिवारिक संपत्ति से ही जोड़ कर परखा है। फलस्वरूप न सिर्फ रूसी पोलित ब्यूरो से औरतें लगातार गायब रहीं, एक बच्चे फी परिवार का नियम कड़ाई से लागू करते ही चीन में कन्या शिशुओं की बड़े पैमाने पर हत्याए होने लगीं और वाम शासित बंगाल में भी राजनैतिक बदले की भावना से पार्टी कॉडरों द्वारा (जसे नन्दीग्राम में) वर्गशत्रु की स्त्रियों से कई बार बलात्कार किए गए।

मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा तथा पंजब राज्यों में कन्या शिशुओं की गिरती तादाद पर अभी स्वच्छिक समाजसेवी संगठन, ‘एक्शन एड’ ने कनाडाई संस्था ‘आई.डी.आर.सी.’ की मदद से पाच विशेषज्ञों : मेरी ई.जॉन, रविन्दर कौर, रजनी पैरीवाला, सरस्वती राजू और अल्पना सागर की एक विशद शोध रपट (प्लानिंग फैमिलीज, प्लानिंग जण्डर) प्रकाशित की है। यह रपट इस बात को पुष्ट करती है कि लिंगगत भेदभाव भारतीय राज-समाज में अभी भी गहराई से व्याप्त है।

सर्वेक्षित पाचों राज्यों में लड़कों और लड़कियों के तुलनात्मक आकड़े खासतौर से निराशाजनक रहे हैं। जबकि इन राज्यों के युवा परिवार नियोजन अपनाने वाले और बेहतरीन शक्षिक सुविधाओं से लैस हैं। तरक्की के कई मानकों पर स्त्रियों का जीवन भी यहा देश के औसत से कहीं बेहतर है।

परिवार सीमित हैं, माताए सुशिक्षित हैं और कई अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों पर काम भी कर रही हैं, लेकिन फिर भी बेटे-बेटी के सवाल पर एक हिचकिचाहट, एक गहरी दुविधा यहा व्याप्त है, जो कागड़ा के पालमपुर शहर की एक मां के शब्दों में साफ उभर कर आती है : ‘..पता नहीं मुङो अपने दोनों बेटों के लिए बहू मिल पाएगी या नहीं। इसलिए, कि हमारे लोगों को लड़किया कतई नहीं चाहिए। मेरी भी अगर बेटी होती तो मुङो उसके दहेज की चिंता लग जाती। वैसे भी मेरे जेठ की एक बेटी है, जिसकी शादी और दहेज की फिक्र ने पूरे परिवार को जकड़ रखा है। कई बार मुङो लगता है कि एक बेटी तो होनी ही चाहिए। पर वहीं यह सोच कर राहत भी महसूस करती हू कि मेरे बेटी नहीं है, वर्ना उम्रभर मैं उसकी फिक्र में घुलती रहती।..’

पिछले छह दशकों के दौरान लोकतंत्र ने भारत की अर्थव्यवस्था और समाज में भारी बदलाव पैदा किए हैं। इन बदलावों के दबाव ने एक ओर तो नागरिकों की शिक्षा तक पहुच बढ़ाई, हरित क्रांति पैदा की, पर आगे जाकर शहरों में संपन्न मध्यवर्ग और ग्रामीण क्षेत्र में किसानों का एक नवधनाढ्य समूह भी पैदा किया, जिसकी जीवनशैली और मूल्यों की कमानी स्त्री शिक्षा की जरूरत को सिर्फ बेटे के लिए गोरी अंग्रेजी बोलने वाली बहूओं के उत्पादन से जोड़ देती है, और दहेज में मिलने वाली मोटर, जमीन और कमाऊ किंतु आज्ञाकारी बीवी द्वारा उत्पादित कैश की विशाल संभावनाओं से।

छोटी जोत वाले घरों के जो युवा परिवार शहरों को जाने लगे हैं, वे भी बरस-त्योहार पर घर लौटते हैं, तो इसी सोच के लुभावने टोकरे लेकर। लिहाज शम्पू के पाउच और मिनट नूडल्स की ही तरह अल्ट्रासाउंड द्वारा गर्भ में भ्रूण के लिंग की जच कराकर अवांछित कन्या भ्रूण की ‘सफाई’ की बाबत विशद जनकारी और प्रैक्िटकल सलाहें भी  दहेज की नई संभावनाओं सहित आज दूर-दराज के गावों तक में ज फैली हैं।

उच्चशिक्षिता बहुओं वाले सम्पन्न परिवारों में कन्या शिशुओं की तादाद में सबसे बड़ी गिरावट को लेकर ‘स्त्री ही तो स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु है’ का पुराना तराना दोहराना भी यहा एक हद तक बेमानी है। कटु सचाई यह है, कि सन्तानोत्पत्ति से जुड़े फैसले करते वक्त लोग आदर्शो पर नहीं व्यावहारिकता पर चलते हैं। अत: युवाओं को जमीनी स्थिति के मद्देनजर लड़कों के मा-बाप बनने में ही भविष्य की बेहतर संभावनाए दिखती हैं।

उन्हें लगता है कि अपने सुरक्षित बुढ़ापे के लिए अगर पेट काट कर जोड़ी कमाई का निवेश करना हो, तो वे यह बेटे की बजाए पराए घर की थाती बनने जा रही बेटी पर क्यों करें? प्रकटत: इस किस्म के माता-पिता शिक्षित होकर इतना तो जानते हैं कि खुलकर यह बात कहना उन्हें दकियानूस बनाता है। इसीलिए सभा-गोष्ठियों में कन्याओं की सुशिक्षा और दहेज-प्रथा पर लिखने-बोलने में वे प्राय: किसी से पीछे नहीं दिखाई देते। किन्तु जहा फैमिली की प्लानिंग का मुद्दा आता है, वे अथर्ववेद के मंत्र रचयिता की तरह न्याय से नजरें बचाकर कह उठते हैं, कि बेटी जन्मे पड़ोस में! उनके घर बेटा ही आए।

तो क्या यह मान लिया जाए कि हमें एक लगातार स्त्री विहीन होते जाते समाज को भारत की अपरिहार्य नियति मान कर स्वीकार कर लेना होगा? रपट में रोहतक, कागड़ा और फतेहगढ़ साहब जैसे कुछ छोटे शहरों का डाटा दिखा रहा है कि पढ़ी-लिखी लड़कियों के खिलते व्यक्तित्व और कृतित्व के उजास में उम्मीद की कुछ किरणों छिपी हैं। तीनों शहरों में अधिकाधिक लड़किया निरंतर ऊची तालीम हासिल कर अच्छी नौकरी पाने की क्षमता में आज अकाट्य रूप से लड़कों से बेहतर प्रमाणित हुई हैं। उधर विवाहित बेटों द्वारा मा-बाप को संपत्ति हथिया कर दरकिनार करने के प्रकरण समाज में बढ़ रहे हैं। नतीजतन अभिभावक अपने सुरक्षित बुढ़ापे के संदर्भ में अधिक समझदार तथा कमासुत प्रमाणित हुई बेटियों के बारे में दोबारा सोचने को मजबूर हो रहे हैं।

डाटा दिखा रहा है कि पहली संतान यदि लड़की हो, तो उसे सहज स्वीकार करने वाले माता-पिता की तादाद पिछले दशक से बढ़ रही है। यानी लड़की का जन्म तमाम जमीनी सचाइयों के बावजूद एकदम अस्वीकार्य भी नहीं रहा है। हरियाणा, पंजब तथा दिल्ली में (लाडली योजना जसी) कई नई योजनाए भी कन्या जन्म की स्वीकार्यता बढ़ाने को शुरू की गई हैं। लेकिन उनके ठोस परिणाम 18 वर्ष बाद ही सामने आएंगे, जब वयस्क होने पर लड़की के अभिभावक सरकार द्वारा उसके नाम निवेशित पूजी को पाने लगेंगे।

कुल मिलाकर शोध द्वारा किए गंभीर दार्शनिक सोच और जमीनी सचाई के इस सह-मंथन से यह स्पष्ट हो जता है, कि लड़कियों की घटती तादाद को सिर्फ जनगणनात्मक आकड़ों या गरीब, पिछड़े समाजों से जोड़ कर उनका उपचार नहीं किया जा सकेगा। कन्या भ्रूण-हत्या को पुलिसिया छापों और कैश प्रोत्साहन से भी रोका नहीं जा सकता। स्त्रियों के काम की महत्ता, लड़कियों की नैसर्गिक प्रतिभा और परिवारों तथा (विशेषकर) बूढ़े माता-पिता की देखभाल को लेकर उनके सहज अनुराग और जिम्मेदारी की भावना को बड़े पैमाने पर उजगर करना और प्रशंसित बनाना, साथ ही शिशु जन्म की सार्थकता और कन्या शिशु के जन्म की निर्थकता की जो एक विकृत-भोंडी समझ हमारे समाज, मीडिया और सरकारी तंत्र में अक्सर झलक दिखाती रहती है, उसका सक्षम-मुखर प्रतिकार बिना कुंठित हुए लगातार करना जरूरी है।

उच्च शिक्षा स्त्री स्वायत्तता का हथियार जरूर बन सकती है, पर पढ़ी-लिखी स्त्रियों की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए स्त्री-स्वायत्तता के नाम पर बेवजह दागी जा रही चंद नकली बंदूकों पर रोक लगानी होगी, जो इन दिनों मीडिया में मैट्रिमोनियल विज्ञापनों और गोरेपन की क्रीम या रंगीन स्कूटरों की बिक्री बढ़ाने को जारी वृत्तचित्रों में आ रही हैं। कुल मिलाकर कन्या शिशु की सुरक्षा की डगर आसान तो नहीं, पर अरब से ऊपर आबादी वाले लोकतंत्र में सच्चे समाज सुधार की डगर आसान हो भी कैसे सकती है?

 
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