class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ब्लॉग वार्ता : विचारशील होने का अहसास

डॉ. अमिता नीरव का यह ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगता है। जीवन की इस आपाधापी में दर्शन की अपनी जगह है। सुनते वक्त इन दर्शनों से जो सत्य का अहसास होता है वो उनके खत्म हो जाने पर अफसोस पैदा नहीं करता। हम फिर से भगदड़ से खुद को बचाने में लग जाते हैं और दार्शनिक की बातें बटुए के साथ छिटक कर भीड़ में गिर जाती हैं, पांवों से कुचलने के लिए।
अस्तित्व ब्लॉग पर जाने के लिए क्लिक करना होगा http://amitaneerav.blogspot.com। इत्तफ़ाक़न जो हंस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं। इस लेख के नीचे उतरते सीढ़ियों पर जो पंक्तियां मिलती हैं उसमें जीवन को समझने की एक और कोशिश नज़र आती है। अमिता लिखती हैं कि ऐसा क्यों होता है कि जमकर उत्सव मनाने के बाद समापन के साथ गाढ़ी-सी उदासी न जाने कहां से चुपके से आ जाती है। करने लगती है चीरफाड़, उस सबकी, जिसे आपने जिया, भोगा और किया। क्या खुद को सामूहिकता में बहा देने, बिखेरने और फैला देने का प्रतिशोध होता है ये अवसाद। क्योंकि अक्सर गहरी एकांतिकता में अनायास आ पहुंचे आनंद के क्षणों को जी लेने के बाद तो ऐसी कोई अवसादिक अनुभूति नहीं होती।
डॉ. अमिता नीरव का ब्लॉग कम शब्दों में अधिक समझे जाने के लिए है। मैं कश्ती हूं मुझी में है समन्दर मेरा। निदा फाज़ली के इस शेर के बहाने कहती हैं कि ऊब के साथ अरूचि का संयोग है, न सूफी पसंद आ रहा है, न ग़ज़लें, न शास्त्रीय, न फिक्शन भा रहा है, न फैक्चुअल। कहां जाना है, क्यों जाना है और पहुंच कर क्या करना है, ऐसे सवाल फिर से उछल रहे हैं। आज की जिंदगी हमें इस लेख की तरह ऐसे मोड़ पर हर दिन ले आती है। पता है सब व्यर्थ है लेकिन माया में अर्थ तलाश रहे हैं। अध्यात्म का अपना संकट है। उसके पास समाधान नहीं है। जब तक वो ईश्वर को नहीं छोड़ेगा तब तक वो अपनी सत्यता का प्रमाण देता रहेगा गहरे आध्यात्मिक क्षणों में भी भक्त पूछ ही लेता है, बताओ ईश्वर कब मिलेंगे। संत कहता है तुम्हारे भीतर है। इतने साल के बाद अपने साथ होने वाले छल को वे बर्दाश्त नहीं कर पाता। अध्यात्म छोड़ देता है या फिर अध्यात्म के साथ छल करने के लिए आश्रम की दुकान खोल लेता है।
डॉ. नीरव अच्छा लिखती हैं। कॉलेज के दिनों की बातें लिख रही हैं। जे.एस. मिल की बात को दोहराती हैं कि असंतुष्ट आदमी से बेहतर है संतुष्ट सुअर होना और संतुष्ट मूर्ख से बेहतर है असंतुष्ट सुकरात होना। कहती हैं कि खुद को खुद के सामने साबित करने की चुनौती हमेशा रहती है। कभी इससे आज़ाद नहीं पाया। अब तक इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके कि आखिर जीने के सिद्धांत क्या होने चाहिए।
मैंने जो संग तराशा वो खुदा हो बैठा। यह शीर्षक है एक लेख का। राशिफल के बारे में लिखती हैं कि हम खुद से ऊपर किसी को चाहते हैं ताकि असफलता, दुख, कमी या अभाव का ठीकरा उसके सिर फोड़ सकें। उसे भाग्य कह लें, ईश्वर कह लें या फिर बहुत वैज्ञानिक होकर परिस्थिति। भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा में कहा गया है कि जिस ईश्वर की हम पूजा करते हैं, उसे हमीं ने बनाया है। ईश्वर की हमें ज़रूरत है इसलिए वह है। हर कीमत और हर हाल में परमानंद ही सत है। फिर वो प्रार्थना से मिले या फिर शराब से लेकिन फिर पाप पुण्य, अरे भई यही तो चित्रलेखा भी नहीं समझ पाई।
अमिता लिखती हैं कि हमारे पास हर चीज़ के लिए शब्द हैं फिर भी सवालों की आग बुझ नहीं पाती है। हम डरते हैं पीड़ा से, असफलता से, तकलीफ से और प्रकारांतर से खुशी से भी। फिर भी कुछ तो है, कोई तो है जो सीमित संसाधनों से असंख्य लोगों की अनगिनत इच्छाओं का सामंजस्य करता है। वह पूरी दुनिया के लिए अर्थशास्त्री की भूमिका का निर्वहन कर रहा है। कह सकते हैं कि अभी इस गुत्थी को हम सुलझा नहीं पाए हैं, इसके लिए ‘उसका’ अस्तित्व है। दर्द के लिए दवा के तौर पर दर्द की तलाश। अमिता लिख रही है कि अक्सर दो चार दिनों के बुखार के बाद अहसास होता है कि पुनर्जन्म हुआ है। पुराना सब कुछ कहीं इन दिनों में बह गया है। कभी-कभी महसूस होता है कि सिर्फ दुर्घटनाएं ही अचानक घटती हैं, बाकी जीवन सामान्य होता है। कभी कभी अपना होना कई सवाल और संदेह पैदा करता है। इस तरह के सवालों में हम सब उलझे हैं इसीलिए इस ब्लॉग को पढ़ कर अच्छा लगा।

ravish@ndtv.com
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:ब्लॉग वार्ता : विचारशील होने का अहसास