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ब्लॉग वार्ता : नक्सलवाद बनाम चिदंबरमवाद

यदि ब्लॉग जगत में नक्सलवाद को लेकर घमासान है। पिछले हफ्ते दंतेवाड़ा की घटना को लेकर ब्लॉगर एक दूसरे के सामने हैं। चिदंबरम से ज्यादा यहां इस्तीफा मांगा और दिया जा रहा है। 

http://www.visfot.com पर गांधीवादी बजरंग मुनि कहते हैं कि नक्सली और सरकार दोनों हमारे लिए संघर्ष कर रहे हैं लेकिन दोनों ही पक्षों ने कभी हम नागरिकों से सहमति लेने की जहमत नहीं उठाई। दोनों का उद्देश्य, लक्ष्य और मार्ग एक ही है। दोनों ही समाज को लंबे समय तक गुलाम बनाये रखना चाहते हैं और इसके लिए दोनों ही जनहित का ढोंग रचते हैं। इन दोनों के बीच चल रहे सत्ता संघर्ष में हम शिकार हो रहे हैं।

बजरंगमुनि कहते हैं कि एक ही समाधान है, स्थानीय स्वायत्तता जिसका संशोधित तरीका है ग्रामसभा का सशक्तिकरण। छत्तीसगढ़ के एक गांव रामचन्द्रपुर ने यह प्रयोग किया है और वहां सफलता दिख रही है। कभी वहां के लोग भी सशस्त्र संघर्ष के लिए तैयार हो रहे थे लेकिन आज वे ग्रामसभा के सशक्तिकरण से अपनी समस्या का समाधान कर रहे हैं। नक्सलवाद के नाम पर हो रहे युद्ध से बचने का यही उपाय है। समस्या यही है। नक्सलवाद से कैसे निपटें इसे लेकर व्यापक जनमत कभी नहीं बना।

इस बहस में प्रभावित इलाकों के आदिवासी नेतृत्व की आवाज सुनाई नहीं दी। एक और ब्लॉग है- प्रत्यक्षा।
http://pratyaksha.blogspot.com पर प्रत्यक्षा लिखती हैं कि 1940 के दशक में वेरियर एल्विन गोंड बस्तर मरिया और मुंडा आदिवासियों के बीच रहे थे और उनके जीवन मूल्यों के बारे में हृदयस्पर्शी विवरण लिखा था। उनकी दृष्टि ने भी राष्ट्रीय चेतना पर प्रभाव नहीं डाला। चाईबासा रिसर्च सेंटर के अनुसंधान कार्यो पर भी ध्यान नहीं दिया गया। राष्ट्र राज्य ने आदिवासियों के खिलाफ एक विरोधात्मक रुख अपना लिया। पूरे देश में आदिवासियों को अपने वनभूमि से बेदखल किया जा रहा है। विकास के नाम पर अपनी जीवन पद्धति से महरूम किया जा रहा है।

प्रत्यक्षा का यह लेख बहुत अच्छा है। लिखती हैं कि पुलिसकर्मी मरते हैं, नक्सल मरते हैं, गांव वाले गरीब मरते हैं। जो पुलिसकर्मी मरे हैं वो भी उतने ही शिकार हैं सरकारी नीतियों के जितने कि अन्य। क्योंकि यहां खेल बहुत बड़ा है। इस खेल की बाह्य भूमिका रचने के लिए ये सब छोटे मोहरे हैं। अहिंसक प्रतिरोध के सब दरवाजे क्यों बन्द किये गए? जब आमजन हिंसा की तरफ अग्रसर होता है तब हर किस्म की हिंसा संभव बनाई जाती है। क्रांतिकारी, आपराधिक, दहशतगर्दी, गुंडागर्दी। इन स्थितियों के लिए जिम्मेदार कौन है?

http://jandunia.blogspot.com ब्लॉग लिखता है कि चिदंबरम ने इस्तीफे की पेशकश कर पीठ दिखा दी। सारा देश उनकी कद्र करता है। यदि वाकई चिदंबरम को सीआरपीएफ के जवानों की मौत का दुख है तो फिर वे उनके हत्यारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं करते, क्यों इस्तीफे की पेशकश कर रहे हैं। कहीं ये जनता से सहानुभूति पाने का इरादा तो नहीं है।

http://left-liberal.blogspot.com पर सत्येंद्र रंजन सवाल करते हैं कि क्या माओवादियों से बातचीत की वकालत करने वाले बुद्धिजीवी या कार्यकर्ता इस बात से नावाकिफ हैं कि खुद माओवादी पार्टी की बातचीत में कोई रुचि नहीं है। इसके लिए बुनियादी शर्त मानने को वह तैयार नहीं हैं। इंकलाब ब्लॉग पर सत्येंद्र लिखते हैं कि यह सवाल पूछने का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि सरकार जब वार्ता की बात करती है तो उसका इरादा ईमानदार होता है।

लेकिन सत्येंद्र सीआरपीएफ के शहीद जवानों पर पीयूडीआर की प्रतिक्रिया से खफा हैं। कहते हैं कि इस घटना के बाद पीयूडीआर ने कहा है कि छह अप्रैल की सुबह दंतेवाड़ा में जवानों की मौत सरकार की ऑपरेशन ग्रीन हंट को आगे बढ़ाने की दुर्भाग्यपूर्ण नीति का परिणाम है। सत्येंद्र पीयूडीआर की खिंचाई करते हुए लिख रहे हैं कि जब यह संगठन जवानों की मौत और माओवादी लड़ाकों की मौत की निंदा नहीं करता तो इसकी साख पर सवाल खड़े होते हैं।

http://ankahibaatein.blogspot.com क्लिक करते ही निखिल श्रीवास्तव का ब्लॉग अनकही खुलता है। निखिल कहते हैं कि मेरी एक जिज्ञासा है। इसके पीछे कोई विचारधारा नहीं। क्या जरूरी है कि आदिवासियों को जबरदस्ती विकास की तरफ धकेला जाए। क्या जरूरत है उन्हें शहरी विकास में धकेलने की। जरूरी तो नहीं कि हर किसी को विकसित होना ही चाहिए। दे दीजिये उन्हें उनके जंगल, उनकी जमीन। हटा लीजिए पुलिस, उन्हें मार काट करने में मजा थोड़े न आता होगा। नक्सलवाद और ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसे जटिल विषय पर अगर कहीं सरलता और गरलता से बहस हो रही है तो वो हिन्दी ब्लॉग जगत है।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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