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मान-सम्मान का सवाल

उच्च सदन में मनोनीत माननीयों की उपस्थिति के आंकड़े एक बार फिर सामने आए हैं। फिर बहस होगी कि मनोनीत सांसद सदन में उपस्थित क्यों नहीं रहते? देश की पहली संसद के गठन के साथ ही शुरू हुई उच्च सदन में विशिष्ट लोगों के मनोनयन की परिपाटी आज तक इस सदन का मान बढ़ाती आई है। लेकिन इस बार के आंकड़े बता रहे हैं कि अपने नामांकन के बाद के 348 दिनों में सचिन तेंदुलकर महज 23 दिन सदन में उपस्थित रहे, तो फिल्म अभिनेत्री रेखा महज 18 दिन। 

पहली राज्यसभा से शुरू हुई मनोनयन की परंपरा के पीछे कल्पना थी कि कला-संस्कृति, सिनेमा, विज्ञान या किसी भी विधा विशेष से जुड़े विशिष्ट व्यक्ति को अपने बीच पाकर सदन गौरवान्वित महसूस करेगा और इनकी गरिमामय उपस्थिति सदन में होने वाली बहस को नए आयाम देगी। इनके विचार सामान्य सदस्य से अलग सार्थक हस्तक्षेप की भूमिका निभाएंगे। पृथ्वीराज कपूर, नरगिस, के एम पणिक्कर, भगवती चरण वर्मा, हबीब तनवीर, रुक्मिणी देवी अरुंडेल, मृणाल सेन से लेकर अमृता प्रीतम और अब रेखा, जावेद अख्तर, सचिन तेंदुलकर तक हमारी इस परंपरा में तमाम नाम जुड़ते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उच्च सदन के मनोनीत सदस्यों की उपस्थिति, सक्रियता और योगदान पर सवाल उठने लगे हैं। यहां तक कहा गया कि यदि ये सदस्य समय नहीं दे पा रहे, तो इन्हें सदन से इस्तीफा दे देना चाहिए। दुर्भाग्य या सौभाग्य से ये सवाल राजनीति की उस पूर्णकालिक जमात से उठे, जिसकी सक्रियता हमेशा सवालों के घेरे में रही। 

आदर्श स्थिति तो यही होती कि विशिष्ट हों, मनोनीत या चुने हुए सदस्य, सदन के सदस्य हैं, तो उनके होने का लाभ देश को मिलना ही चाहिए। लेकिन जो होना चाहिए और जो हो रहा है की बहस में कई व्यावहारिक पहलू भी हैं। मानना होगा कि जब आप किसी क्षेत्र विशेष के विशिष्ट व्यक्ति को उसके विशिष्ट योगदान के मद्देनजर मनोनीत करते हैं, तो उसका मान करते हैं। यह मान उस सदन विशेष का मान बढ़ाता है और यह परंपरा भारतीय लोकतंत्र की विशिष्टता का बोध कराती है। क्या ऐसे में इस बहस को नई तरह से देखने की जरूरत नहीं है? स्वाभाविक है कि ये विशिष्ट लोग सदन में होंगे, तो सदन लाभान्वित होगा, देश भी। कई बार उस क्षेत्र विशेष को भी लाभ मिलेगा, जिसकी बात आमतौर पर सदन तक सही परिप्रेक्ष्य में नहीं पहुंच पाती। कपिला वात्स्यायन जैसी विदूषी की सदन में उपस्थिति और कला क्षेत्र के लिए उनके द्वारा कराए गए काम उदाहरण हैं। लेकिन यह तस्वीर का एक पहलू है। यह भी सोचना होगा कि इन विशिष्ट सदस्यों की सदन में उपस्थिति को पूर्णकालिक राजनीति में आए सदस्यों की ही तरह बहस का मुद्दा बनाना कितना तर्कसंगत और व्यावहारिक है? देखना होगा कि चुनकर आए सदस्य भी सदन में उपस्थिति के प्रति कितने सजग हैं? नहीं भूलना चाहिए कि काम-काज के लिहाज से संसद के सफलतम सत्रों में भी सदस्यों की उपस्थिति को लेकर नेतृत्व के उच्चतम स्तर तक को शिकायत रही है।

यह हाल में भी दिखा है, अतीत में भी दिखा। इसलिए विशिष्टों की उपस्थिति के आकलन का पैमाना भी विशिष्ट होना चाहिए। ऐसा पैमाना, जो देखे कि इन विशिष्टों को हमने सम्मान दिया था। इस सम्मान में कोई शर्त नहीं थी। हां, यह जरूर देखा जाना चाहिए कि ये विशिष्ट व्यक्ति अपने क्षेत्र विशेष और समाज में क्या कर रहे हैं? यदि सचिन इतना बड़ा कद पाने के बाद भी सड़क पर युवकों को रोककर हेलमेट पहनने के लिए कहते दिख जाते हैं, तो मान लेना चाहिए कि उनके सरोकार अब भी बने हुए हैं। हमें इनके इन सरोकारों का भी सम्मान करना चाहिए।

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  • Web Title:question of honor