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नाटकीय होता विवाद

हमारी न्यायपालिका की उपलब्धियां बहुत बड़ी हैं, उसने कई तरह से इतिहास रचा है। लेकिन आजकल न्यायपालिका जिस नए इतिहास को बनाती दिख रही है, वह परेशान करने वाला तो है ही, साथ ही हास्यास्पद भी हो गया है। कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सीएस कर्णन के खिलाफ चल रहा अवमानना का मामला ऐसी जगह पहुंच गया है, जिसमें खुद सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं समझ आ रहा होगा कि इसमें क्या किया जाए? न्यायाधीश कर्णन जब मद्रास हाईकोर्ट में थे, तब वहां एक कनिष्ठ न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति को लेकर कुछ विवाद हुआ था, जिसे लेकर उन्होंने नियुक्ति में शामिल अपने सहयोगी जजों के खिलाफ ही सुनवाई शुरू कर दी थी। विवाद जब बढ़ा, तो उन्होंने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ही मानहानि का मामला चलाने की धमकी दी थी। बाद में जब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से यह सुनवाई रुकवाई गई, तो जस्टिस कर्णन ने भ्रष्टाचार का मुद्दा न सिर्फ सार्वजनिक रूप से उठाया, बल्कि इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी। विवाद यही नहीं रुका और जब यह लगातार बढ़ता गया, तो सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन को न सिर्फ दायित्व से मुक्त कर दिया, बल्कि उनका तबादला भी कोलकाता उच्च न्यायालय में कर दिया। इसके बाद जस्टिस कर्णन ने तबादले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। दूसरी तरफ, मद्रास हाईकोर्ट का आरोप था कि जस्टिस कर्णन के कब्जे में अदालत की कई फाइलें हैं, जिन्हें वह लौटा नहीं रहे। ऐसे ही आरोपों के बीच उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का मामला चलाया गया और फिर देश के इतिहास में पहली बार किसी कार्यरत वरिष्ठ जज के खिलाफ जमानती वारंट जारी करना पड़ा। पश्चिम बंगाल के पुलिस चीफ से कहा गया कि वह खुद जाकर वारंट की तामील करवाएं। इस पर जस्टिस कर्णन ने कहा कि यह सब इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि वह दलित हैं।

शुक्रवार को जब वारंट तामील करने का प्रहसन शुरू हुआ, तो जो दृश्य दिखाई दिया, वह कुछ ज्यादा ही नाटकीय बन गया। वारंट की तामील करवाने के लिए पश्चिम बंगाल के पुलिस चीफ जब जस्टिस कर्णन के निवास पर पहुंचे, तो इस काम के लिए उनके साथ 100 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई। यह अपने आप में न समझ में आने वाली बात थी, क्योंकि जस्टिस कर्णन कोई अपराधी नहीं हैं, जिनके भाग जाने का डर हो। इस कार्रवाई से भड़के जस्टिस कर्णन ने वहीं अपने लॉन में ही अदालत लगाने की घोषणा करते हुए सीबीआई को आदेश दिया कि वह अवमानना मामले की सुनवाई कर रहे सात जजों के खिलाफ जांच करे। साथ ही उन्होंने जजों के खिलाफ मानहानि का मामला चलाने की बात कही और 14 करोड़ रुपये क्षतिपूर्ति की मांग भी की। 

अब इस मामले ने सुप्रीम कोर्ट के सामने भी धर्म-संकट खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट किसी भी हाईकोर्ट के जज को हटा नहीं सकता। किसी भी न्यायाधीश को हटाने का एकमात्र तरीका यही है कि उसके खिलाफ संसद से महाभियोग पारित किया जाए। अभी तक एक ही मौके पर ऐसा हुआ हैै, उसमें भी मामला संसद के एक सदन से दूसरे सदन पहंुचता उसके पहले ही न्यायाधीश महोदय ने खुद ही इस्तीफा दे दिया था। मामला इतना आगे जाए, यह कभी कोई नहीं चाहता। लेकिन यह मामला जिस स्तर तक पहुंच गया है, उससे बेहतर तो शायद महाभियोग ही रहता। कुछ भी हो, इस मामले को जल्द ही किसी अंजाम पर पहुंचाकर खत्म करना होगा, वरना खुद न्यायपालिका की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगेगी। इसका कारण कोई बाहरी तत्व नहीं, बल्कि उसका आंतरिक तंत्र ही होगा। 

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  • Web Title:dramatic dispute