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फैसले से कई विराम

First Published:20-04-2017 12:08:15 AMLast Updated:20-04-2017 12:08:15 AM

आखिर वह रुका हुआ फैसला आ ही गया। शीर्ष अदालत ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती समेत 13 लोगों पर आपराधिक षड्यंत्र का मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया है। यह अलग बात है कि फैसला आने तक मामले से संबद्ध कई लोगों का निधन हो चुका है। अदालत ने माना है कि केस में पहले ही काफी देर हो चुकी है, इसलिए अब रोज सुनवाई करके इसे दो साल के अंदर निपटाना होगा। मामले को रायबरेली से लखनऊ स्पेशल कोर्ट हस्तांतरित कर दिया गया है। शीर्ष अदालत अब तक हुए विलंब पर कितनी गंभीर है, यह इससे भी जाहिर होता है कि सुनवाई पूरी न होने तक इससे जुड़े किसी न्यायाधीश का तबादला न होने और बिना किसी ठोस कारण के सुनवाई न टाले जाने जैसी व्यवस्थाएं भी उसने साथ-साथ दे दी हैं।

फैसले का अपना असर है, अपने निहितार्थ भी। लेकिन मानना होगा कि लंबे विश्राम के बाद न्याय का पहिया फिर से घूमा है। मामले में इतना विलंब हो चुका है कि यह अध्याय आते-आते एक पीढ़ी गुजर चुकी है। विहिप अध्यक्ष अशोक सिंघल सरीखे मामले से सीधे-सीधे जुड़े कई लोग अब जीवित नहीं हैं। फैसला उस वक्त आया है, जब पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में जा चुके आडवाणी और जोशी सरीखे नेता अपनी राजनीतिक पारी की सांध्य बेला में हैं। राष्ट्रपति की उम्मीदवारी से भी ये नाम जुड़ रहे थे। स्वाभाविक है कि फैसले के साथ हुई नई शुरुआत इनकी राजनीतिक संभावनाओं पर विराम लगाने वाली भी साबित होगी। केंद्रीय मंत्री उमा भारती के राजनीतिक भविष्य के लिए भी यह अच्छी खबर नहीं है। अदालत ने तकनीकी आधार पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को उनके राज्यपाल रहने तक मुकदमे से छूट भले दी हो, लेकिन सहज समझा जा सकता है कि विपक्षी आवाज और नैतिकता उनके लिए इसे आसान नहीं रहने देंगे। फैसले ने कानून के उस मूल सिद्धांत की भी फिर से याद दिलाई है कि देर से भले हो, लेकिन अंतत: न्याय होता है। आपराधिक मुकदमा चलाने का आदेश प्रमाण है कि कोर्ट ने मान लिया कि इन शीर्ष नेताओं ने भी छह दिसंबर को संयम नहीं बरता था और एहसास दिलाया है कि लोक-जीवन में सक्रिय नेताओं को वचन-कर्म, दोनों में संयम रखने का सिद्धांत व व्यवहार नहीं भूलना चाहिए। फैसला सीबीआई के कामकाज पर भी एक सवाल है, जिसने इस तथ्य के बावजूद कि लिब्रहान आयोग ने भी इन्हें दोषी माना था, इन नेताओं के खिलाफ जांच बंद करने की सिफारिश की थी। शीर्ष अदालत ने भी आखिर उसे गलत ही माना।

फैसला अदालतों में मामले सालों-साल चलते रहने की भी मिसाल है कि इसमें कितने और कैसे-कैसे उतार-चढ़ाव आते हैं। यह भी कि जो नेता अब तक बरी माने जाने लगे थे, फिर से कठघरे में दिख रहे हैं। यह भी कि कानूनी प्रक्रिया के पेच किसी मामले को कितना लंबा खींच सकते हैं और कई बार फैसले तब आते हैं, जब पक्ष-प्रतिपक्ष उनके नतीजों के स्वीकार-अस्वीकार को आसानी से गले नहीं उतार पाता। फैसला समाज का ताना-बाना व्यापक तौर पर प्रभावित करने वाले मामलों में हमारी अदालतों के लिए त्वरित न्याय देने का भी संदेश देता है। फैसले की राजनीतिक व्याख्याएं भी होंगी ही। राजनीति यूं भी हर चीज में नफा-नुकसान तलाश लेती है। भाजपा के लिए शायद यह कुछ ऐसा ही अवसर हो। संभव है, इसे 2019 के बचे हुए दो साल से जोड़कर देखा जाए, क्योंकि कई बार प्रत्यक्ष तौर पर दिखने वाला विपरीत भी परिणाम में अनुकूल हो जाया करता है।


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