class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सतर्क होने का समय

पांच राज्यों की पुलिस और खुफिया तंत्र की सक्रियता से हमने संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार कर किसी खतरनाक मनसूबे को फेल भले कर दिया हो, लेकिन यह अपनी उपलब्धि पर इतराने का नहीं, बल्कि हालात पर चिंता करने का वक्त है। जिस तरह से मुंबई, लुधियाना के साथ बिहार के नरकटियागंज और यूपी के बिजनौर व मुजफ्फरनगर का नाम इस मामले में आया है, वह चिंता बढ़ाता है। माना जा रहा है कि खुरासान मॉड्यूल के ये आतंकी देश में किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने वाले थे और इसके लिए व्यापक स्तर पर गिरोह तैयार हो रहा था। दो दिन पहले ही पंजाब में इसी माड्यूल के दो आतंकी गिरफ्तार हुए, जिनके तार विदेश से जुड़े होने की बात आई थी। ताजा गिरफ्तारियां आईएस का नाम आने के कारण ज्यादा गंभीर हो गई हैं। ये बता रही हैं कि आईएस देश में जड़ें जमाने की कोशिश में है और अब कोई एक क्षेत्र या प्रांत इसके निशाने पर नहीं है। इसका फैलाव दक्षिण से पूरब तक है। महज एक-दो वर्षों में ही आईएस से जुड़ाव में 75 से अधिक युवा गिरफ्तार हुए हैं, जिसमें केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तराखंड, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल के साथ बिहार और उत्तर प्रदेश भी हैं। आईएस के प्रति भारतीय युवाओं का यह आकर्षण ज्यादा चिंता की बात है। 

ताजा खुलासों के बाद खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की चुनौतियां बढ़ी हैं, तो हमारी चिंता भी। लेकिन क्या यह सब रातोंरात हुआ। सच है कि तीन-चार साल पहले तक हमारी सरकारें आईएस के ऐसे किसी जाल से इनकार करती रहीं, लेकिन पिछले डेढ़-दो साल की ये गिरफ्तारियां खुद अपनी कहानी बयां कर रही हैं। ये बता रही हैं कि किस तरह हमने छोटे-छोटे घाव नजरअंदाज कर नासूर बनने दिए। किस तरह डेढ़ साल पहले दक्षिण की उस कहानी को हमने हवा में उड़ा दिया था, जो बाद में कई डिजिटल प्लेटफॉर्म से गुजरती हुई वापस हमें वहीं ले गई थी, जहां से चली थी और तब हमने माना था कि केरल का मल्लपुरम आईएस की गतिविधियों का एक मजबूत सिरा बन चुका था। बाद में यही सिरा देश के अन्य भागों की ओर बढ़ता दिखाई दिया है।

भारतीय युवाओं में आईएस के प्रति थोड़ा सा भी आकर्षण बढ़ा है, तो हमें चिंता करनी चाहिए, लेकिन यह भी सच है कि ब्रिटिश और अमेरिकी युवकों के ग्राफ की अपेक्षा यह अभी बहुत नीचे है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि अपने गढ़ में बुरी तरह घिरने के बाद आईएस ने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अपनी जड़ें फैलाई हैं और अब भारत उसका निशाना है। हालांकि, यह भी उतना ही साफ है कि भारत में अपनी जड़ें जमाना उसके लिए इराक, सीरिया या अन्य देशों जितना आसान नहीं है। लेकिन खुश होने के लिए यह भी ठीक नहीं। जिस तरह इंटरनेट पर प्रोपेगंडा तकनीक का इसने इस्तेमाल किया और कर रहा है, जिस तरह बार-बार एक्सपोज हुआ और अपने ही घर में घिरा है, ऐसे में उसकी हताशा उससे कुछ भी करवा सकती है। पश्चिम एशिया से बाहर निकलने की इसकी बेचैनी भी इसी की देन है। सिंध के शाहबाज कलंदर की दरगाह पर इसकी हताशा सामने आ ही चुकी है। ऐसे में, भारत में बढ़ रही इसकी हरकतों से हमें चेत जाना चाहिए। इसका मुकाबला सतर्कता और बड़े पैमाने व निचले स्तर तक जागरूकता से ही हो सकता है। वर्ग विशेष को रेखांकित न कर, उस जड़ को तलाशने, मजबूरियों को समझने, उन्हें खत्म करने की जरूरत है, जो हमारे युवाओं को इस ओर धकेल रही है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि समाजों को साथ लेकर और युवाओं का भरोसा जीतकर ही बड़ी जंगें जीती गई हैं। उन्हें अलग-थलग करके हम कोई जंग नहीं जीत सकते। 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: time to be cautious
From around the web