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कर्नाटक में सिद्धारमैया मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया
 
आतंक के खिलाफ
First Published:27-06-12 09:14 PM
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यकीनन, अबू जिंदाल की गिरफ्तारी भारत सरकार व दिल्ली पुलिस की एक बड़ी कामयाबी है। इसके अलावा यह हमारे विदेश मंत्रालय की भी जीत है, क्योंकि अगर सऊदी अरब से हमारे बेहतर रिश्ते नहीं होते, तो शायद अबू जिंदाल को पकड़ना मुमकिन न होता। इससे पहले तक 26/11 का एकमात्र गुनहगार अजमल कसाब हमारे कब्जे में था। इसलिए, हम जो भी सबूत पाकिस्तान को देते थे, वह उसे मानने से इनकार कर देता था। लेकिन अबू जिंदाल की गिरफ्तारी के बाद हम और ठोस सबूत पाकिस्तान को सौंप सकते हैं। हो सकता है कि जिंदाल से पूछताछ के दौरान कई और खुलासे हों। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि हम अपनी मुहिम में वाशिंगटन को साथ लेकर चलें। अगर अमेरिका इस पूरे मामले में पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाता है, तो इस मुल्क को जबर्दस्त धक्का लगेगा। एक बात और है। जिंदाल की गिरफ्तारी इस बात की तस्दीक करती है कि हमारे संबंध अरब मुल्कों से बेहतर हुए हैं। जाहिर है, हमें दूसरे इस्लामी देशों से भी बेहतर संबंध बनाने होंगे, तभी जाकर हम आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई में जीत हासिल कर पाएंगे।
दिनेश पटेल, आनंद विहार कॉलोनी, दिल्ली

सरकार की किरकिरी
यूपीए-दो सरकार की बड़ी फजीहत हो रही है। पहले कॉमनवेल्थ घोटाले में उसके सांसद सुरेश कलमाडी को गिरफ्तार होना पड़ा था। फिर टु-जी स्पैक्ट्रम आबंटन मामले में उसके मंत्री ए राजा की गिरफ्तारी हुई। अब केंद्रीय मंत्रिमंडल से वीरभद्र सिंह को इस्तीफा देना पड़ा है। दरअसल, भ्रष्टाचार के एक मामले में उनके और उनकी पत्नी के खिलाफ शिमला की सतर्कता अदालत ने आरोप दाखिल किए हैं। जाहिर है, इस पूरे मामले से वीरभद्र सिंह का राजनीतिक करियर ढलान पर पहुंच गया है। वहीं यूपीए सरकार को भी करारा झटका लगा है। उधर, अपने अंतर्कलह से परेशान प्रमुख विपक्षी दल भाजपा को केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का एक और मौका मिल गया है। साफ है कि यह पार्टी इस मसले पर कांग्रेस को भी घेरेगी। देखना होगा कि वीरभद्र सिंह मामले में कांग्रेस खुद को कैसे बचाती है।
सपना झा, द्वारका, नई दिल्ली

हिंदी बनाम अंग्रेजी
इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पट्टी के छात्र दाखिले के लिए आ रहे हैं। लगभग हजार किलोमीटर दूर से आना और फिर कॉलेज में दाखिला लेना, कोई आसान काम नहीं है। एक जंग जीतने के बराबर की मेहनत लगती है। परंतु इन छात्रों को तब निराशा हाथ लगती है, जब उन्हें अंग्रेजी परिवेश से गुजरना पड़ता है। दिल्ली विश्वविद्यालय अपने पश्चिमी रंग-ढंग के लिए मशहूर है। ऐसे में, हिंदी पट्टी के छात्र मानसिक तनाव के शिकार हो जाते हैं, क्योंकि वे इस रंग-ढंग में ढल नहीं पाते। यहां तक कि वे पढ़ाई-लिखाई में भी पिछड़ने लगते हैं, क्योंकि सारा पाठ्यक्रम अंग्रेजी में ही होता है। इस तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन को ध्यान देना चाहिए।
सुजीत कुमार, मॉडल टाउन, दिल्ली

आम फिल्मों से अलग
अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ वसेपुर आम फिल्मों से काफी अलग है। इसकी कहानी भले ही आजादी के बाद के घटनाक्रम पर चलती हो, पर इसमें काफी प्रयोग किए गए हैं। तब के बिहार की जो तस्वीर पेश की गई है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। यही वह ट्रीटमेंट है, जो दर्शकों को ढाई घंटे तक सिनेमा हॉल में बैठे रहने को विवश करती है। इस फिल्म को न तो कर्मिशयल फिल्मों की श्रेणी में रखा जा सकता है, न ही आर्ट फिल्मों में। यह फिल्म, उन्हें जरूर पसंद आएगी, जो यथार्थ और इतिहास को समझते हैं।
श्रीश चौबे, कौशांबी, उत्तर प्रदेश

 

 
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