रविवार, 19 मई, 2013 | 22:21 | IST
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बैठक पर सवाल
First Published:17-06-12 10:44 PM
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पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान के रक्षा सचिवों की बैठक सियाचिन मसले पर हुई। दुख की बात यह है कि इस दो दिनी बैठक का कोई नतीजा  नहीं निकल सका। दरअसल, पाकिस्तान अपने पुराने रुख को दोहराता है और हम अपनी मांग पर कायम रहे। इसलिए समस्या वहीं की वहीं रह गई। सवाल यह है कि कब तक इस तरह की बातचीत और बैठकें होती रहेंगी, जब महज औपचारिकता ही निभानी है? आजादी के बाद से अब तक भारत और पाकिस्तान के बीच कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं, पर सियाचिन की बर्फ पिघल नहीं रही है। जबकि सियाचिन दुनिया का सबसे ठंडा और सबसे ऊंचा इलाका है, जहां दोनों देशों की सेनाएं तैनात रहती हैं। अगर दोनों देशों की सरकारों को वाकई अपनी-अपनी सेना की चिंता है, तो उन्हें जल्द से जल्द रिश्तों की गरमाहट से सियाचिन की बर्फ को पिघलाना होगा।
मो. इमरान, कोटला, दिल्ली

झुलसाती गरमी
मॉनसून ने दस्तक दे दी है, पर उत्तर भारत में अब भी तेज गरमी पड़ रही है। बीते कुछ दिनों से तो दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में न्यूनतम तापमान भी औसत से तीन-चार डिग्री ऊपर रह रहा है। मौसम विभाग की तरफ से राहत के कोई संकेत नहीं मिल रहे। अगर पारा यूं ही 43-44 डिग्री से. रहा, तो उन बेचारों का क्या होगा, जिनकी जिंदगी सड़क किनारे तपती गरमी में गुजर रही है? मेरी तो इंद्र महाराज से इतनी ही विनती है कि प्रभु मेघों को भेज घर-आंगन, जीवन-जगत को तृप्त करो।
केवल कुमार, फरीदाबाद, हरियाणा

खनन पर खलबली
एक मानवाधिकार संगठन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि खनन उद्योग में मानवाधिकारों और पर्यावरण संबंधी मानकों की जमकर अनदेखी हो रही है। विडंबना यह है कि जिस उद्योग ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है, उसी में खून-पसीने की सही कीमत नहीं आंकी जा रही। यही नहीं, वहां चल रही अवैध गतिविधियों की वजह से राज्य सरकारों को राजस्व और पर्यावरण का नुकसान हो रहा है। जाहिर है, यह सब कुछ खनन कंपनियों और माफियाओं की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। साथ ही इन्हें सरकारी कर्मचारियों का संरक्षण मिला हुआ है। हाल ही में मध्य प्रदेश व कर्नाटक में खनन माफियाओं की गुंडागर्दी दिखी। जाहिर है, जिस तरह से यह उद्योग अवैध कारोबार की शक्ल लेता जा रहा है, उसकी कीमत देश को चुकानी पड़ रही है। कई राज्यों में आप भ्रमण करेंगे, तो पाएंगे कि चोरी-छिपे जंगल और पहाड़ कट रहे हैं। अगर राज्य सरकारें समय रहते सचेत नहीं हुईं, तो खनन विनाश का रूप ले सकता है।
दिनेश गौड़, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश

कोचिंग की परंपरा
पिछले दिनों संपादकीय पन्ने पर ‘ऐसे तो नहीं मिलेगी कोचिंग से मुक्ति’ शीर्षक आलेख पढ़ा। लेखक आनंद कुमार का कहना जायज है कि इंजीनियरिंग की सिंगल प्रवेश परीक्षा की थ्योरी चंद लोगों के दिमाग की उपज है और इसके जरिये कोचिंग व्यवस्था से मुक्ति नहीं मिल सकती। दरअसल, जब तक देश भर के सभी स्कूलों- कॉलेजों में समान व बेहतर शिक्षा की व्यवस्था लागू नहीं की जाती, तब तक कोई भी नई प्रणाली कारगर साबित नहीं होगी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कोचिंग व्यवस्था आम मध्यमवर्गीय परिवार की जरूरत, बल्कि मजबूरी बन चुकी है। इन परिवारों को लगता है कि वे इसी के जरिये अपने बच्चों के भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। अगर कोचिंग की दुकानों को बंद करनी है, तो सबसे पहले स्कूलों-कॉलेजों में बेहतर शिक्षा का प्रबंध करना होगा।
संतोष कुमार, नजफगढ़, दिल्ली

 
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