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विज्ञान में आगे
First Published:11-05-12 09:29 PM
अग्नि-5 के सफल प्रक्षेपण के बाद अंतरिक्ष विज्ञान में हमारा पताका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लहरा रहा है। निस्संदेह, हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिक इसके लिए बधाई के पात्र हैं। यदि भारतीय प्रतिभाओं को बिना किसी राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक भेदभाव के मौके दिए जाएं, तो हर क्षेत्र में हमारी तूती बोलेगी। वैसे, मिसाइल परीक्षण की कामयाबी हमारे लिए दोहरी खुशी लेकर आई है। दरअसल, इस मिसाइल योजना को सफल बनाने का श्रेय महिला वैज्ञानिक टेसी थॉमस को जाता है। जाहिर है, महिला सशक्तीकरण की दिशा में हम और आगे बढ़े हैं। कल तक जो महिलाएं बस चूल्हा-चौका संभालने में जुटी रहती थीं, अब वे हर क्षेत्र में अव्वल हैं। इससे बढ़कर भला और क्या खुशी हो सकती है? परंतु एक चिंता मुङो खाए जा रही है, और वह है प्रतिभाओं का पलायन। अक्सर भारतीय छात्र विदेशी मुद्रा व भरपूर संभावनाओं की चाह में विदेश चले जाते हैं और वहीं बस जाते हैं। उनके लिए अग्नि-5 की कामयाबी एक सबक है। अगर वे चाहें, तो देश में रहकर भी तरक्की के नए प्रतिमान गढ़ सकते हैं।
दिनेश गुप्त, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश
तंग नजरिया
पाकिस्तान का जन्म ही नफरत की बुनियाद पर हुआ था, इसलिए वहां के शासकों को हिन्दुस्तान की कामयाबी से जलन होती रही है। जब पिछले दिनों हमने अग्नि-5 मिसाइल का सफल प्रक्षेपण किया, तो पाकिस्तान ने आनन-फानन में हत्फ मिसाइल की टेस्टिंग की। याद करें, जब हमने पोकरण में परमाणु परीक्षण किया था, तब पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण किए थे। कहा जा सकता है कि यह आपसी प्रतिद्वंद्विता है, परंतु हर बार हमारी देखा-देखी हो, तो साफ है कि यह घटिया सोच और ईर्ष्या की निशानी है। वैसे शासक, जिन्होंने भारतीय संस्कृति व सभ्यता को कुचलने की कोशिश की, उन सबके नाम पर पाकिस्तान ने अपनी मिसाइलों के नाम रखे हैं। जैसे, गौरी, गजनी, अब्दाली आदि। आश्चर्य नहीं होगा, जब पाकिस्तान आतंकियों के नाम पर मिसाइलों के नाम रख डाले।
जसवंत सिंह, नई दिल्ली ई-कचरे से सावधान
हमारे देश में प्रति वर्ष चार लाख टन ई-कचरा निकल रहा है। ई-कचरा यानी इलेक्ट्रॉनिक कचरा। हमारे इलेक्ट्रॉनिक सामान जब बेकार हो जाते हैं, तो हम उन्हें यूं ही फेंक देते हैं। दरअसल, यही ई-कचरा है, जो दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। एक विकल्प है कि हम इनकी रीसाइकिलिंग करें और फिर से काम में लाएं। आंकड़ों के मुताबिक, महज कुछेक हजार टन ई-कचरा ही रीसाइकिल हो पाता है। ऐसे में, सवाल यह है कि कचरे के इस ढेर से कैसे निजात मिले? एक तरीका यह हो सकता है कि सरकारी देखरेख में डंपिंग यार्ड तैयार किए जाएं और वहां पर इन कचरों को डाल दिया जाए। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि विभिन्न यंत्र-उपकरण बनाने वाली कंपनियां ही इन ई-कचरों के निपटारे की जिम्मेदारी संभालें। यह कितना तर्कसंगत होगा, इस पर बहस होनी चाहिए। लेकिन सबसे बेहतर तो यह होगा कि हम अपनी जरूरतें कम करें, खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक जरूरतें। इससे हमारी सहूलियतें तो घटेंगी, पर उम्र जरूर बढ़ जाएगी। अत: अब तय हमें ही यह करना है कि कैसे इस ई-कचरे के जंजाल से मुक्ति पाएं।
शांतनु अग्रवाल, मुखर्जी नगर, दिल्ली ऊफ! ये गरमी
गरमी के आते ही लोग-बाग परेशान होने लगे हैं। कोई शरबत पर शरबत पी रहा है, तो कोई एसी कमरे से निकलना ही नहीं चाहता। अगर शाम में मौसम मेहरबान न हो, तो लोगों की हालत और बुरी हो जाती है। अभी तो तपिश कम है, लेकिन कब तक? अच्छा होगा कि हम गरमी से बचने की तैयारियां शुरू कर दें।
रंजना कुमारी, मयूर विहार, दिल्ली
दिनेश गुप्त, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश
पाकिस्तान का जन्म ही नफरत की बुनियाद पर हुआ था, इसलिए वहां के शासकों को हिन्दुस्तान की कामयाबी से जलन होती रही है। जब पिछले दिनों हमने अग्नि-5 मिसाइल का सफल प्रक्षेपण किया, तो पाकिस्तान ने आनन-फानन में हत्फ मिसाइल की टेस्टिंग की। याद करें, जब हमने पोकरण में परमाणु परीक्षण किया था, तब पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण किए थे। कहा जा सकता है कि यह आपसी प्रतिद्वंद्विता है, परंतु हर बार हमारी देखा-देखी हो, तो साफ है कि यह घटिया सोच और ईर्ष्या की निशानी है। वैसे शासक, जिन्होंने भारतीय संस्कृति व सभ्यता को कुचलने की कोशिश की, उन सबके नाम पर पाकिस्तान ने अपनी मिसाइलों के नाम रखे हैं। जैसे, गौरी, गजनी, अब्दाली आदि। आश्चर्य नहीं होगा, जब पाकिस्तान आतंकियों के नाम पर मिसाइलों के नाम रख डाले।
जसवंत सिंह, नई दिल्ली ई-कचरे से सावधान
हमारे देश में प्रति वर्ष चार लाख टन ई-कचरा निकल रहा है। ई-कचरा यानी इलेक्ट्रॉनिक कचरा। हमारे इलेक्ट्रॉनिक सामान जब बेकार हो जाते हैं, तो हम उन्हें यूं ही फेंक देते हैं। दरअसल, यही ई-कचरा है, जो दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। एक विकल्प है कि हम इनकी रीसाइकिलिंग करें और फिर से काम में लाएं। आंकड़ों के मुताबिक, महज कुछेक हजार टन ई-कचरा ही रीसाइकिल हो पाता है। ऐसे में, सवाल यह है कि कचरे के इस ढेर से कैसे निजात मिले? एक तरीका यह हो सकता है कि सरकारी देखरेख में डंपिंग यार्ड तैयार किए जाएं और वहां पर इन कचरों को डाल दिया जाए। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि विभिन्न यंत्र-उपकरण बनाने वाली कंपनियां ही इन ई-कचरों के निपटारे की जिम्मेदारी संभालें। यह कितना तर्कसंगत होगा, इस पर बहस होनी चाहिए। लेकिन सबसे बेहतर तो यह होगा कि हम अपनी जरूरतें कम करें, खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक जरूरतें। इससे हमारी सहूलियतें तो घटेंगी, पर उम्र जरूर बढ़ जाएगी। अत: अब तय हमें ही यह करना है कि कैसे इस ई-कचरे के जंजाल से मुक्ति पाएं।
शांतनु अग्रवाल, मुखर्जी नगर, दिल्ली ऊफ! ये गरमी
गरमी के आते ही लोग-बाग परेशान होने लगे हैं। कोई शरबत पर शरबत पी रहा है, तो कोई एसी कमरे से निकलना ही नहीं चाहता। अगर शाम में मौसम मेहरबान न हो, तो लोगों की हालत और बुरी हो जाती है। अभी तो तपिश कम है, लेकिन कब तक? अच्छा होगा कि हम गरमी से बचने की तैयारियां शुरू कर दें।
रंजना कुमारी, मयूर विहार, दिल्ली
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